बस्ती। सुनने और पढ़ने में अजीब लग रहा होगा, लेकिन यह सच हैं, कि जो हर साल दवा, उपकरण सहित अन्य मद में एनएचएम के करोड़ों रुपया का बंदरबांट हो रहा है, उसके लिए ‘सीएमओ’, ‘आरसीच’, ‘चीफ फार्मासिस्ट’ और एनएचएम के बाबू नहीं बल्कि ‘डीएम’ और ‘सीडीओ’ को जिम्मेदार माना जा रहा है। देखा जाए तो हर साल मरीजों के नाम पर लगभग 20 से 25 करोड़ के दवा, उपकरण और सामानों की खरीदफरोख्त होती है, यह खरीद फरोख्त तब होती है, जब सीएमओ के द्वारा प्रस्तुत पत्रावली पर एनएचएम के अध्यक्ष और सचिव के रुप में डीएम और सीडीओ अनुमति देते है। नियमानुसार अनुमति मिलने के बाद अगर दस लाख से अधिक का बजट एक साथ मिलता है, तो सीएमओ की ओर से टेंडर कराना अनिवार्य हैं, लेकिन अगर बजट अगर दस लाख से कम का हैं, तो कोटेशन के जरिए खरीद करनी होती है। ध्यान देने वाली बात यह है, कि डीएम और सीडीओ सिर्फ कार्य करने की अनुमति देते हैं, यह दोनों पत्रावली पर यह नहीं लिखते कि टेंडर कराया जाए, जब कि डीएम और सीडीओ को अच्छी तरह मालूम हैं, कि बजट दस लाख का नहीं बल्कि करोड़ों का है। अगर डीएम और सीडीओ पत्रावली पर टेंडर कराने को लिख दे तो किसी सीएमओ की इतनी हिम्मत नहीं पड़ेगी कि वह बिना टेंडर कराए करोड़ों रुपये के सामान की खरीद फरोख्त कर सके। इतना ही नहीं डीएम और सीडीओ हर माह होने वाले डीएचसी की बैठक में इस बात की समीक्षा तक नहीं करते कि दस लाख से अधिक कार्य वाले का टेंडर कराया गया कि नहीं? जबकि कमिश्नर, डीएम और सीडीओ के पास निरंतर ठेकेदारों और नेताओं की ओर से बिना टेंडर कराए करोड़ों की खरीद फरोख्त कर लेने की शिकायतें आती रहीं, रही हैं, और हर बार कमिश्नर और डीएम की ओर से सीडीओ को जांच अधिकारी बना दिया जाता है, अब जरा अंदाजा लगाइए कि जिस अधिकारी के चलते करोड़ों का घोंटाला हुआ, अगर उसी अधिकारी को जांच अधिकारी बना दिया जाए, तो जांच का क्या होगा? इसे आसानी से समझा जा सकता है। यही कारण है, कि इस मामले में आज तक एक भी सीडीओ ने जांच को पूरा इस लिए नहीं किया, क्यों कि इसमें वह और डीएम फंसे रहते है। यहां तक कि जब भी शासन स्तर से कोई अधिकारी जांच करने आता तो पत्रावली पर डीएम और सीडीओ की अनुमति देखकर लीपापोती कर देता, कोई आईएएस अधिकारी यह नहीं चाहेगा, कि उसके समकक्ष अधिकारी के खिलाफ कोई कार्रवाई हो।
सीएमओ डा. राजीव निगम, आरसीएच डा. बृजेश शुक्ल, चीफ फार्मासिस्ट अजय मिश्र और एनएचएम के बाबू संदीप राय अच्छी तरह जानते हैं, कि जिस पत्रावली पर डीएम और सीडीओ की अनुमति होती है, उसमें उन लोगों का कुछ नहीं होगा, भले ही चाहे जितना लूटपाट करो, क्यों कि अगर कुछ होगा तो सबसे पहले डीएम और सीडीओ का होगा, उसके बाद हम लोगों का नंबर आएगा, रही बात डीएम और सीडीओ के खिलाफ कार्रवाई होने की तो होगी नहीं। यह मामला मीडिया की ओर से जिले के प्रभारी रहें मंत्री राजेंद्र सिंह उर्फ मोती सिंह के सामने उठाया गया, और कहा गया कि जब भी एनएचएम के घोटाले की जांच होती है, तो कोई बड़ा अधिकारी इस लिए जांच पूरा नहीं करता क्यों कि उस पत्रावली पर डीएम और सीडीओ की अनुमति होती हैं, इस पर मंत्रीजी ने डीएम का बचाव करते हुए कहा कि डीएम को हर चीज की जानकारी नहीं होती, और इसी का नाजायज फायदा सीएमओ सहित अन्य विभाग के अधिकारी उठाते है। शिकायतों के बाद भी डीएचसी की बैठक में डीएम और सीडीओ की ओर से सीएमओ से कोई जबाव सवाल न करना चर्चा का विषय बना रहता है। रही बात विधायक और सांसद की तो इनपर कोई फर्क नहीं पड़ता कि जिले को अधिकारी लूट रहे है। सवाल जबाव और लिखा पढ़ी करने के बजाए यह लोग सीएमओ से अपने खास को ठेका पटटी दिलाने की सिफारिश करते है। हाल ही में जय कांस्टक्षन के मामले में जिस तरह बाबूजी ने सीएमओ पर अनियमित रुप से अनुबंध करने का दबाव बनाया, और जिसके चलते सीएमओ डा. राजीव निगम की नौकरी पर आ गई, उससे पता चलता है, कि अधिकारी नेताओं के दबाव में कितना रहते हैं, और वही अधिकारी दबाव में रहता है, जो खुद भ्रष्ट होता है। यह मामला हाईकोर्ट में चला गया, आज नहीं तो कल निर्णय आना ही है। तब सीएमओ को पता चलेगा कि बाबूजी का दबाव उनके लिए कितना मंहगा पड़ा। इसी लिए मीडिया बार-बार अधिकारियों को यह सलाह देती आ रही है, कि कभी भी नेताओं के दबाव में आकर अनियमित कार्य मत करिए, नहीं तो नौकरी तो जाएगी ही जेल जाने का भी खतरा रहेगा। जिस भी अधिकारी ने नेताओं के दबाव में आकर गलत काम किया उसे उसका खामियाजा भुगतना ही पड़ा। जय कांस्टक्षन के मामले में भी मीडिया ने सीएमओ को सतर्क किया था, लेकिन सर्तक नहीं हुए। ऐसा भी नहीं कि नेताओं के मामले में अधिकारियों को गलत काम करने के लिए मोटी रकम मिलती हो, डर के मारे अधिकारी गलत काम भी करता है, और जो काम कराने का उसे अन्य से पैसा मिलता उससे भी हाथ धोना पड़ता है। कोई अधिकारी कभी यह न सोचे कि नेता उसे बचा लेगें, जब भी बचाने का मामला सामने आता है, नेता अपनी छवि बचाने के लिए किनारा कस लेते है।
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