बस्ती। अपने आपको दुनिया की सबसे बड़ी और अनुशासित पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा, कम से कम बस्ती में यही नहीं तय कर पा रही है, कि विधायक बड़ा होता कि संगठन? किसी भी राजनैतिक दल के विधायकों/सांसदों को यह गलत फहमी नहीं पालनी चाहिए, कि वह संगठन को कमजोर करके खुद को मजबूत कर पाएगें? पद पर आसीन लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि उनका रुतबा और पहचान उनकी बदौलत नहीं बल्कि संगठन की बदौलत है। लेकिन बस्ती में भाजपा के लोग क्या कर रहें, यह किसी से छिपा हुआ नहीं रह गया। कार्यकर्त्ताओं को यह समझ में ही नहीं आ रहा है, कि आखिर बस्ती में हो क्या रहा है? क्यों इतनी गुटबाजी हो रही है? और इस गुटबाजी से किसको लाभ और किसको नुकसान हो रहा है? ऐसा लगता है, कि बस्ती के संगठन में गुटबाजी की बीमारी लग गई, यह बीमारी कैंसर से अधिक घातक है। अगर इस बीमारी का इलाज नहीं हुआ तो इसका भी वही हाल होगा, जो एक कैंसर के रोगी के अंितम समय में होता है। हालात यह हो गई कि अब तो लोग पूछने लगे हैं, कि भाई बताओ बस्ती में कितने गुट है। किसी भी जिलाध्यक्ष को इतना भी कमजोर नहीं होना चाहिए, कि कोई भरत सिंह नामक व्यक्ति यह कहे, कि सूची को जिलाध्यक्ष के पिछवाड़े में डाल दो। जो चीजें संगठन कार्यालय के बंद कमरे में होनी चाहिए, वह कैसे सार्वजनिक हो जा रही है। कहा भी जा रहा है, कि अगर जिलाध्यक्ष की सूची वायरल नहीं होती तो मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में जिलाध्यक्ष और विधायक की सूची को लेकर विवाद न होता। इसे देखते हुए भाजपा के उस दावे को खोखला माना जा रहा, जिसमें सरकार से बड़ा संगठन को बताया जाता। पार्टी, अगर संगठन को वाकई मजबूत करना चाहती है, तो उन लोगों के खिलाफ अनुषासनिक कार्रवाई करनी चाहिए, जिन लोगों ने अनुशासन को तोड़ा। नहीं तो संगठन और भी कमजोर होता जाएगा। माननीयों को भी इस बात का एहसास होना चाहिए कि विधायक/सांसद बड़ा नहीं होता, बल्कि जिले के संगठन का मुखिया बड़ा होता। इतने बड़े कार्यक्रम में जहां पर सूबे का मुखिया आ रहा हो, अगर उसमें मंच पर बैठने वालों और हेलीपैड पर स्वागत करने करने वालों की दो सूची जारी होती है, तो इसका मतलब विधायक को अपने अधिकारों और कर्त्तव्यों का ज्ञान नहीं। विधायकजी का समानान्तर सूची जारी करना, एक तरह से जिलाध्यक्ष के अधिकारों पर सीधा हमला करना माना जा रहा है। विधायक अजय सिंह को यह भी नहीं भूलना चाहिए, कि यह उनका व्यक्तिगत कार्यक्रम नहीं था, बल्कि संगठन का था, और संगठन में जिले का मुखिया जिलाध्यक्ष होता है। यह वही संगठन हैं, जिसने, कार्यकर्त्ता धमेंद्र जायसवाल के खिलाफ इस लिए कार्रवाई कर दिया, कि उसने खाद जैसे जनहित के मुद्वे को लेकर आवाज उठाया था। देखना है, कि पार्टी की गाइड लाइन के अनुसार जिलाध्यक्ष, विधायकजी को इस मामले में नोटिस भेज पातें हैं, या नहीं? जिलाध्यक्ष को इस बात की भी छानबीन करनी चाहिए, कि बंद कमरे वाली सूची लीक कैसे हुई और किसने किया? इससे यह भी पता चलता है, कार्यालय में कोई भी चीज गोपनीय नहीं रह गई। वैसे जब भी योगीजी का बस्ती दौरा हुआ, आने के पहले और जाने के बाद कुछ न कुछ विवाद अवष्य हुआ। अगर करोड़ों खर्च करने के बाद गुटबाजी बढ़ती है, तो योगीजी को बस्ती का दौरा नहीं करना चाहिए।
आखिर ‘भाजपा’ क्यों ‘महिलाओं’ को ‘अपमानित’ कर ‘रही’?
महिलाओं का सम्मान करने का दावा करने वाली भाजपा कितना सम्मान करती, यह मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में देखा जा चुका, जहां पर भाजपा महिला प्रकोष्ठ को इतना अपमानित होना पड़ा कि वह रोते हुए कार्यक्रम से निकली। जब भाजपा अपने ही महिला मोर्चा की जिलाध्यक्ष को सम्मान नहीं दे पा रही है, तो दूसरी महिलाओं को कितना सम्मान देगी, इसे आसानी से सोचा और समझा जा सकता है, भाजपा का नारी षस्तीकरण रोली सिंह के सामने खोखला साबित हो गया। महिला आरक्षण बिल पर रोना रोने वाली भाजपा का असली चाल चरित्र और महिला सम्मान दिख रहा है। वैसे भी इस पार्टी में महिलाओं नेताओं का ही सबसे अधिक षोषण पार्टी के लोगों ने किया। तभी तो एक महिला ने कहा कि नेता बनने का रास्ता नेताओं के बिस्तर से होकर जाता है। भाजपा का महिलाओं के बारे में दोहरा चरित्र दिखाई पड़ गया। सवाल उठ रहा है, कि जब रोली सिंह का नाम हैलीपैड पर स्वागत करने वालों में षामिल था, तो क्यों नहीं उन्हें जाने दिया गया, और किसके कहने पर उनका नाम काटा गया। इस बात की भी जांच होनी चाहिए।
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