बस्ती। संजय चौधरी अब तक के पहले ऐसे जिला पंचायत अध्यक्ष हैं, जिन्होंने पैसा भी कमाया और खुद को अमर भी कर गए। भले ही चाहें कमीशन लिया, भ्रष्टाचार किया, सदस्यों को खरीदा, ब्लैक मेल हुए और ब्लॅैक मेल किया, जनता के दिलों में भले ही जगह न बना पाए, लेकिन जगह-जगह नाम का पत्थर लगवाकर यह अपने को अमर कर गए। आने वाली पीढ़ियां यह नहीं देखेगी कि संजय चौधरी कितने बड़े भ्रष्टाचारी रहे और कितना कमीशन लिया, सब भूल जाएगीं, उन्हें तो इनके द्वारा बनवाए गए आलीशान सरकारी आवास, दुकाने, कार्यालय और गेट याद रहेगा। कम से कम चार दषक तक आने वाली पीढ़िया इनके के द्वारा कराए गए निर्माण कार्यो को याद रखेगी। भले ही चाहें इन्होंने निर्माण कार्यो के बहाने जनता के पैसों को लूटा। यह अध्यक्ष रहें या न रहें, लेकिन आने वाले अध्यक्षों को कमाई करने का रास्ता नहीं खोजना पड़ेगा। खासबात यह है, कि संजय चौधरी का स्थाई काम दिखाई दे रहा है, अन्य अध्यक्षों का तो वह भी नहीं दिखाई दे रहा है। दयाराम चौधरी के लोहिया मार्केट को छोड़ कर अन्य अध्यक्षों का न तो काम और न उनका पत्थर ही दिखाई दे रहा है। एक अध्यक्ष ने तो जिला पंचायत के दो गेस्ट हाउस को नियम विरुद्व अपने चहेतों को ही किराए पर एलाट कर दिया। संजय चौधरी ने भ्रष्टाचार भी किया और काम भी किया, यह अलग बात है, कि उन्हीं कार्यो में भ्रष्टाचार किया, जो इन्होंने किया। पैसा कैसे कमाया जाता और कैसे अमर हुआ जाता, अगर किसी को सीखना हो तो वह संजय चौधरी से सीख सकता है। भ्रष्टाचार और कमीशन तो सभी जिला पंचायत अध्यक्षों ने किया, लेकिन भ्रष्टाचार के साथ जो स्थाई काम संजय चौधरी ने किया, वह किसी ने भी नहीं किया। इनका नाम गांव से लेकर कचहरी तक कहीं न कहीं पत्थरों में दिखाई दे जाएगा। वहीं पर मंत्रीजी की माता, उनके पुत्र और विधायक दूधराम की पत्नी लता देवी का पत्थर तलाशने पर भी नहीं मिलेगा। एक तरह से संजय चौधरी ने अन्य अध्यक्षों को यह एहसास करा दिया कि जिला पंचायत अध्यक्ष होता क्या? इन्होंने महामहीम तक को एहसास करा दिया, कि उन्हें लोग यूंही नहीं संजय चौधरी कहते है। जिससे पूरा जिला कांपता हैं, उसे इन्होंने पटकनी दी। भले ही मंच पर कुर्सी न मिलने का दर्द झेलना पड़ा, लेकिन यह कभी कमजोर नहीं हुए। कमजोर तो यह उन लोगों के सामने भी नहीं हुए, जिन्होंने इन्हें कुर्सी पर बैठाया। वरना पांच हजार बैलेंस रखने वाला व्यक्ति जिला पंचायत अध्यक्ष नहीं बनता, और पांच करोड़ खर्च करने वाला व्यक्ति हाथ न मलता रहता। जिला पंचायत को तो सभी अध्यक्षों ने अपने-अपने तरीके से लूटा, लेकिन संजय चौधरी ने काम करके लूटा। किसी अध्यक्ष का कार्य भले ही आने वाली पीढ़ियों को न दिखाई दे, लेकिन संजय चौधरी का काम आने वाली पीढ़ियों को कम से कम चार पांच दशकों तक तो दिखाई ही देगा। यह पहले ऐसे अध्यक्ष होगें जो स्कूटी से भी चलते, पैदल भी चलते और फारचूनर से भी चलते।

वर्तमान में किसी भी राजनेता को ईमानदार नहीं कहा जा सकता, क्यों कि जब यह लोग राजनीति में पहली बार प्रवेष करते हैं, तो इनकी आर्थिक स्थित किसी बीपीएल से कम नहीं होती, लेकिन जब यही लोग पद पर आसीन हो जाते हैं, तो अचानक बीपीएल से एपीएल की श्रेणी में आ जाते है। यह अमीरी कोई इनके वेतन से नहीं होती, बल्कि कमीषन से होती है। अब कोई पूर्व विधायक राजमणि पांडेय की तरह नहीं बनना चाहता, जिन्हें गांव से कचहरी आने के लिए टैंपों या फिर गांव के किसी के मोटर साइकिल पर बैठकर आना पड़ता। आज के बाद इन्हें किसी मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में मंच पर बैठने का शायद मौका न मिले। जाते-जाते आज तक लोगों को एक बात समझ में नहीं आई, कि जो महामहीम इन्हें झुका नहीं सके, वह कैसे गिल्लम चौधरी एंड टीम के आगे नतमस्तक हो गया। यह एक बार हरीष द्विवेदी को भूल सकते लेकिन गिल्लम चौधरी को षायद कभी न भूल पाए।