बस्ती। जो व्यक्ति कभी मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह के कार्यक्रम में मंच पर उनके बगल बैठता था, उसी व्यक्ति को मुख्यमंत्री योगीजी के मंच पर कुर्सी तक नहीं मिली। एक नेता का इससे बड़ा अपमान और नहीं हो सकता, इस नेता का नाम राजकिशोर सिंह है। जिन्हें हर्रैया विधानसभा से भाजपा प्रत्याषी का प्रबल दावेदारों में से एक माना जा रहा है। वैसे जिलाध्यक्ष की ओर से जो मंच, स्वागत और प्रस्थान के समय मौजूद रहने वालों की सूची जारी की गई उनमें गलतियां ही गलतियां है। तभी तो इसे लेकर और विधायक अजय सिंह और जिलाध्यक्ष की सूची पर प्रषासन को हस्तक्षेप करना पड़ा। नौबत बायकाट करने तक की आ गई थी। सीएम के प्रस्थान के समय मौजूद रहने वालों में एक ऐसे व्यक्ति का नाम हैं, जो सरकारी टीचर है, और बीआरसी पर अटैच है। इस टीचर का नाम गिरजेश बहादुर सिंह है, और इन पर गांव वाले कथित फर्जी प्रमाण-पत्र के आधार पर नौकरी करने का आरोप लगाकर जांच करवा रहे है। सवाल उठ रहा है, कि क्या एक प्राइमरी स्कूल का टीचर मुख्यमंत्री के कार्यक्रम का हिस्सा हो सकता है। कैसे ऐसे व्यक्ति का नाम सूची में षामिल कर दिया गया, जो सरकारी टीचर है। सवाल उठ रहा है, यह टीचर है, कि भाजपा नेता। इतना ही नहीं हेलीपैड पर स्वागत करने वालों में राना दिनेश प्रताप सिंह को अध्यक्ष नगर पंचायत नगर बताया गया, और उनकी पत्नी नीलम सिंह को भी अध्यक्ष नगर पंचायत नगर के रुप में शामिल किया गया। अब जिलाध्यक्षजी को कौन समझाने जाए कि एक नगर पंचायत में दो-दो अध्यक्ष नहीं होते। पूर्व विधायक सीपी शुक्ल को तो पूर्व बताया गया, लेकिन उनके साथ में हारने वाले संजय जायसवाल, दयाराम चौधरी और रवि सोनकर को निर्वतमान विधायक बताकर मंच पर स्थान दिया गया। अब आप समझ सकते हैं, कि सूची बनाने वाले को अगर पूर्व और निवर्तमान का मायने नहीं मालूम तो उससे गलती होगी ही। इतना ही नहीं हेलीपैड पर स्वागत करने वाले भानुप्रताप सिंह को जिलाध्यक्षजी ने जिला पंचायत अध्यक्ष बना दिया। मंच पर अगर पूर्व सांसद और पूर्व विधायक का नाम है, तो स्वागत करने वालों में पूर्व विधायकों के साथ पूर्व सांसद का नाम क्यों नहीं? सूची को लेकर उस समय विवाद हो गया, जिसके चलते वाकआउट करने तक की नौबत आ गई, जब जिलाध्यक्ष और विधायक अजय सिंह की सूची में टकराहट होने लगी। मंच और हेलीपैड पर स्वागत करने वालों की दो सूची बनी, एक जिलाध्यक्ष और दूसरा विधायक की ओर से बनी। मंच पर जो लोग थे, उन्हें स्वागत में नहीं रखा गया, पता चला कि इसी के चलते भाजपा नेता अनिल सिंह नाराज हो गए, क्यों कि उन्हें स्वागत करने से रोक दिया गया। नाराज होकर चले भी गए। सवाल उठ रहा है, कि अगर सूची में तालमेल नहीं हैं, और सूची को लेकर यह शंका बनी रहे कि कहीं मेरे लोगों का नाम तो काट नहीं दिया गया, तो आप समझ सकते हैं, कि संगठन में क्या चल रहा है। जो जिसका काम हैं, अगर वही करे तो कोई बवाल ही न हो, तो सूची पारदर्शी हो ही नहीं सकता। जब किसी के काम में कोई अनर्गल हस्तक्षेप करने लगता है, तो भ्रातियां उत्पन्न होती है। अगर मंच, स्वागत और बिदाई देने वालों की सूची को लेकर कोई विवाद उत्पन्न होता तो बदनामी पार्टी की होती है। इसी लिए प्रशासन को इस तरह के मामलों में हस्तक्षेप करना पड़ता है। यह पहली बार नहीं हैं, जब सूची को लेकर विवाद हुआ। इससे पहले महेष षुक्ल और राजेंद्रनाथ तिवारी का नाम सूची में होने के बाद भी दोनों को मुख्यमंत्री से मिलने नहीं जाने दिया गया, दोनों को कार्यक्रम से वापस आना पड़ा। वैसे भी सूची को देखकर नहीं लगता कि इस पर होमवर्क किया गया हो। बार-बार सवाल उठ रहा है, कि क्यों नहीं मंच पर किसी कार्यकर्त्ता को सम्मान दिया जाता, कहने को तो राष्टीय अध्यक्ष इन्हें तुल्य कहते हैं, लेकिन जब सम्मान देने की बारी आती है, तो न जाने तुल्य कहां चले जाते है।
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