बस्ती। जिस सामाजिक सेवा के जरिए रेडक्रास सोसायटी का पूरी दुनिया में नाम हैं, वही रेडक्रास सोसायटी बस्ती में कागजों में ही सिमट कर रह गई है। लगता ही नहीं कि यह सोसायटी लगभग डेढ़ साल पुरानी वाली है। आज जो रेडक्रास सोसायटी का हाल है, अगर इसी तरह रहा तो लोग इसका नाम ही भूल जाएगें, फिर कोई चुनाव ही नहीं लड़ेगा। किसी ने सोचा भी नहीं था, कि रेडक्रास सोसायटी इतना निष्क्रिय भी हो सकती है। इसके नये पदाधिकारियों का सक्रिय न होना इस बात की ओर ईषारा करता है, कि लोगों को काम से नहीं बल्कि पद से प्यार है। इतना उथलपुथल के बाद अगर नई कमेटी बनती है, तो उस कमेटी को यह साबित करना था, कि कमेटी सिर्फ दिखाने के लिए नहीं बल्कि समाज की सेवा करने के लिए बनी है। डाक्टर्स डे जैसे दिवस पर इसकी सक्रियता नहीं दिखाई दी। जिस रक्तदान शिविर के लिए इस सोसायटी को लोग जानते थे, वह भी लगभग निष्क्रिय हो गया। रेडक्रास सोसायटी के सदस्य को समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर इसके पदाधिकारी करना क्या चाहते हैं? कहने को तो इसके लगभग 500 सदस्य हैं, लेकिन कार्यक्रमों में नाममात्र के ही दिखाई देते है। इसका उदाहरण 11 जुलाई 26 को सोसायटी के अध्यक्ष संतोष सिंह के स्कूल में रेडक्रास सोसायटी की ओर से आयोजित जनसंख्या नियंत्रण विचार गोष्ठी में देखनेे को मिला। इसके पोस्टर पर डीएम, सीएमओ, हरीश सिंह जैसे लगभग एक दर्जन फोटो हैं, लेकिन मौके पर मात्र एक सदस्य मौजूद रहे। खासबात यह है, कि जनसंख्या नियंत्रण की जानकारी स्कूल के नाबालिग बच्चे और बच्चियों को दी जा रही थी। सवाल उठ रहा है, कि जब सोसायटी के सदस्य ही बैठक में नहीं रहेगें, तो ऐसा बैठक करने से क्या फायदा? यह गोष्ठी रस्म अदायगी बनकर रह गई। इससे रेडक्रास सोसायटी का नाम नहीं हुआ बल्कि नाम बदनाम हुआ, और इसके लिए सोसायटी के वे पदाधिकारी जिम्मेदार है, जिन्हें कार्यक्रमों से अधिक पद प्यारा है। छोटा परिवार, सुखी परिवार के बारे में अगर बड़ों को समझाते तो कुछ सार्थक भी होता, 10-12 साल के बच्चों को अगर जनसंख्या नियंत्रण के बारे में बताएगें तो उन्हें क्या समझ में आएगा? यह विषय बच्चों का नहीं, बड़ों का है। जब कार्यक्रम से बड़े ही गायब रहेगें तो कार्यक्रम कैसे सफल होगा? इस सवाल का जबाव रेडक्रास सोसायटी के पदाधिकारियों को देना चाहिए। बार-बार कहा जा रहा है, कि अगर रेडक्रास सोसायटी के मकसद को पूरा करना है, तो सभी को साथ में लेकर चलना होगा। अध्यक्ष या कोशाध्यक्ष बन जाना कोई बड़ी बात नहीं हैं, बड़ी बात दायित्वों का निर्वहन करना है। जिस मकसद से नई कमेटी का गठन हुआ, वह मकसद पूरा भी होना चाहिए। रेडक्रास सोसायटी कोई कागजी संगठन नहीं है। जिसे जेब में लेकर घूमा जा सके। प्रमोद चौधरी के हटने के बाद लोगों को नई कमेटी से बहुत उम्मीदें थी, भले ही नई कमेटी ने मानकों को पूरा नहीं किया, लेकिन उम्मीदे तो हैं, ही। नई कमेटी के गठन कर लेने में ही कोई सफलता नहीं हैं, सफलता इसके कार्यक्रमों को सफल बनाने में है।
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