बस्ती। अपना दल के नेता और पीडब्लूडी के ठेकेदार संजय सिंह पगार ने विभाग के अधिकारियों और टेंडर बाबूओं को एक संदेश देने का प्रयास किया है, कि जो भी हमसे टकराएगा, वह चूर-चूर हो जाएगा। यह भी बताने और जताने का प्रयास किया है, कि दबदबा था, दबदबा हैं और दबदबा रहेगा। इन्होंने अपने राजनैतिक रसूख और विभाग के भ्रष्ट टेंडर बाबूओं का इस्तेमाल करके अधीक्षण अभियंता के प्रशासनिक अधिकारी प्रेमचंद्र के खिलाफ जिस तरह मोर्चा खोला, उससे यह साबित होता है, कि वाकई नेता किसी के नहीं होते, उसी के होते हैं, जो इन्हें लाभ पहुंचाता है, नुकसान करने वालों को यह लोग मिटटी में मिला देना चाहते है। पटटू, संतोष कुमार और बृजेश श्रीवास्तव जैसे टेंडर बाबूओं को यह कभी नहीं भूलना चाहिए, अगर आज प्रेमचंद्र की बारी तो कल को हमारी भी हो सकती, जिस दिन टेंडर बाबूओं का अहम टकराएगा और जमीर जागेगा, उस दिन न जाने कितने संजय पगार जैसे नेताओं के कहर का सामना करना पड़ेगा, इस लिए याद रखिए, अपनों का साथ दीजिए, गैरों का नहीं, अपने कम से कम धोखा तो नहीं देगें। अपने तो अपने ही होते हैं, इसे कभी न भूलिए।

प्रेमचंद्र को अपना निषाना बनाकर संजय सिंह पगार ने यह एहसास कराने का प्रयास किया है, कि जो भी उनके हित के रास्ते में आएगा, उसका हाल प्रेमचंद्र जैसा होगा। इनकी और इनके द्वारा सांसद, मंत्री और विधायक से कराए गए, शिकायत कर असर दिखने लगा है। प्रेमचंद्र को बस्ती डीवीजन से बाहर तो जाना ही पड़ेगा, जांच और विभागीय कार्रवाई का सामना अलग से करना पड़ेगा, इन्हें यह साबित करना होगा, कि इनके पास इतनी दौलत आई कहां से और इनके आय के क्या-क्या स्रोत हैें। यह सबकुछ झेलना किसी के लिए भी आसान नहीं होता। इसी डर का एहसास संजय सिंह पगार कराना चाहते थे, जिसमें वे सफल भी रहे। अब विभाग में वही होगा, जो संजय सिंह पगार चाहेगें। फिलहाल प्रेमचंद्र के बोरिया बिस्तर बंाधने का समय आ गया, विभाग यह मंथन कर रहा है, कि इनका तबादला कहां किया जाए, लखनऊ किया जाए या फिर अन्य किसी डीवीजन में। बहरहाल, इन्हें बस्ती से कम से कम 200 किमी. दूर जाना पड़ सकता है। क्यों कि विभाग कभी नहीं चाहता कि किसी एक विवादित एओ के चलते विभाग पर कोई आंच आए। कहने का मतलब संजय सिंह पगार और पटटू जैसे अन्य लोग जो चाहते थे, वह होने वाला है। ठेकेदार और बाबूओं के रास्ते का रोड़ा हटने वाला है। अब जो ठेकेदार और टेंडर बाबू चाहेगें वही होगा। संजय सिंह पगार अगर वाकई विभाग के हीरो बनना चाहते हैं, तो उन्हें पटटू, संतोष कुमार और बृजेष श्रीवास्तव तीनों मृतक आश्रित को भी प्रेमचंद्र की तरह उनके भ्रष्टाचार को उजागर करना होगा। तब इन्हें माना जाएगा, कि इन्होंने प्रेमचंद्र की शिकायत अपने हित के लिए नहीं बल्कि विभाग से टेडर बाबूओं के आंतक को समाप्त करने के लिए किया था। मीडिया के लोगों को भी किसी ऐसे ठेकेदार/नेता का साथ नहीं देना चाहिए, जो अपने हित के लिए शिकायत करता और करवा रहा हो। अनेक ठेकेदारो का मानना है, कि कोई भी नेता भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए लड़ाई नहीं लड़ता, बल्कि अपने हित के लिए लड़ता। कहते हैं, कि अगर संजय सिंह पगार इतने ही ईमानदार होते तो अन्य भ्रष्ट अधिकारियों और बाबूओं की षिकायत करते। भले ही चाहें संजय सिंह पगार, प्रेमचंद्र के मामले में सफल रहे हो, लेकिन यह पटटू, संतोष कुमार और बृजेष श्रीवास्तव के मामले में असफल रहें। ऐसे नेता पटटू, संतोष कुमार, बृजेष श्रीवास्तव और अजीत कुमार जैसे भ्रष्ट लोगों के हीरो हो सकते हैं, लेकिन ठेकेदार, विभाग और जनता का नहीं। इसी लिए कहा जा रहा है, कि संजय सिंह पगार जीतकर भी हार गए।