बस्ती। जब पूर्व सांसद हरीश द्विवेदी के साथ गांजा तस्कर का सरगना एवं मनोनीत सभासद रवि गुप्त उर्फ शनि कुमार और जिलाध्यक्ष विवेकानंद मिश्र के साथ स्मैक तस्कर का सरगना मनोनीत सभासद दीपक चौहान के साथ रहेगें, तो सवाल तो उठेगा ही। सवाल यह भी उठ रहा हैं, कि स्कूली बच्चों और नवयुवकों को नशे का लत लगाने वाले और समाज के दुष्मन दोनों तस्करों को भाजपा के जिम्मेदारों ने कैसे सभासद मनोनीत कर दिया? आखिर इन दोनों को मनोनीत करने के पीछे क्या कारण रहा, फंडिगं या फिर इनके तस्करी की योग्यता? सबसे बड़ा सवाल क्या भाजपा 2027 के विधानसभा चुनाव में हर्रैया में इन्हीें दोनों की उपलब्धि लेकर वोट मांगने जाएगी? और क्या क्षेत्र की जनता भाजपा को वोट देगी? वैसे ही इस क्षेत्र में भाजपा के भीतर दो व्यक्तियों को लेकर पहले से ही खींचातानी चल रही है, उपर से गांजा और स्मैक तस्करों को मनोनीत करना, आग में घी डालने जैसा माना जा रहा है।

भाजपा वाले अपनी करनी से हर्रैया सीट को विपक्ष के लिए आसान करते जा रहे है। कहीं ऐसा न हो कि दोनों तस्कर भाजपा के हार का कारण बन जाए।

इन दोनों तस्करों को मनोनीत करने से यह पता चलता है, कि भाजपा को अपने खाटी कार्यकर्त्ताओं की कोई चिंता नहीं। अगर कोई दूसरा जिलाध्यक्ष होता तो इन दोनों को अइब तक बाहर का रास्ता दिखाकर अपनी गलती को सुधार लेता, और अपने दामन पर लगे दाग को धो लेता। ऐसा लगता है, कि मानो भाजपा वाले अपनी गलतियों से कोई सबक नहीं लेते, और न गलतियों को सुधारने में ही विष्वास करते है। लगभग पांच माह पहले भाजपा के लोगों पर इन दोनों को मनोनीत करने का जो दाग लगा था, अगर पार्टी चाहती तो उस दाग को धो सकती थी, अगर धो देती तो फिर वही दाग पांच माह बाद न लगता। मनोनीत सदस्य रवि गुप्त उर्फ शनि कुमार को जिस तरह हर्रैया की पुलिस ने एक दिन पहले 10 किलो गांजे के साथ उसके महाकाल टी सेंटर से पकड कर जेल भेजा, उससे पता चलता है, कि मनोनीत होने के बाद भी रवि गुप्त अपने काले धंधे को छोड़ने को तैयार नहीं, और न भाजपा के लोगों ने ही इसे कोई चेतावनी ही दिया होगा। बताते हैं, कि मनोनीत होने के बाद से इसके गांजा के कारोबार में खूब बढ़ोत्तरी हुई। ऐसा लगता है, कि मनोनीत को यह अवैध कारोबार का लाइसेंस बना लिया हो। गांजा बरामदगी की मात्रा को लेकर अनेक सवाल उठ रहा है, कोई कह रहा हैं, कि 50 किलो बरामद हुआ तो कोई कह रहा है, केस को कमजोर करने के लिए सही बरामदगी को नहीं दिखाया गया, कोई कह रहा है, कि इसे लेकर डील हुई है। बहरहाल, गांजा बरामद तो हुआ। गांजा का अवैध कारोबार के मुख्य सरागना को हुड़वा कुंवर के बाबू साहब को माना जा रहा है, और यह भी कहा जा रहा है, दोनों के मनोनयन में बाबू साहब की महत्वपूर्ण भूमिका रही, फंडिगं भी इन्हीें के द्वारा कराए जाने की बाते कही जा रही है। रवि गुप्त के पास से गांजा पकड़वाने में इन बाबू साहब की मुखबरी की चर्चा हो रही है, इसके पीछे कहा जा रहा है, कि पहले रवि गुप्त, बाबू साहब के साथ में काम करता था, लेकिन जब श्रीगुप्त ने देखा कि इस कारोबार में पैॅसा बहुत हैं, तो उसने स्वंतत्र होकर कारोबार करने की ठानी, यही बात बाबू साहब को नागवार लगा। बाबू साहब के संबध भाजपा नेताओं के साथ करीबी का रहा हैं। रवि गुप्त ने न सिर्फ गांजें के कारोबार में पैसा कमाया/बनाया, बल्कि इसे क्षेत्र के कई लोगों का सांसद निधि का काम देने के नाम पर लाखों भी ठगा, इसी ठगी का षिकार संतोश मेडिकल वाले भी हो चुके हैं, लगभग पांच लाख रुपया इनका पिछले चार साल से फंसा हुआ है। जिस गांजा और स्मैक के कारोबार को लेकर लगभग पांच माह पहले मीडिया ने रवि गुप्त और दीपक चौहान के बारे में लिखा था, आज वह सच साबित हुआ। सवाल उठ रहा है, कि अगर फंडिगं के चलते सत्ता पक्ष वाले आवाज नहीं उठा रहे हेैं, तो विपक्ष क्यों चुप है? क्या विपक्ष के लोग भी फंडिगं पा रहें? हर्रैया क्षेत्र में एक से एक सत्ता पक्ष और विपक्ष के लोग हैं, बाते भी बड़ी-बड़ी करते हैं, लेकिन गलत काम के खिलाफ आवाज नहीं उठाते, रही बात मीडिया की तो अगर हर्रैया के पत्रकार इतने ही मजबूत होते तो रवि गुप्त और दीपक चौहान का अवैध कारोबार न फलता फूलता। ऐसा लगता है, कि इन लोगों की भी फंडिगं हो रही है। क्षेत्र की जनता इसके लिए सबसे अधिक मीडिया को ही दोशी मानती है। किसी समय हर्रैया क्षेत्र के पत्रकारों को जिले के सबसे अधिक निर्भीक एंव साहसी माना जाता था, लेकिन आज इन लोगों ने अपनी पहचान तक खो दिया। पत्रकार से कारोबारी हो गए, अगर ऐसा नहीं होता तो कोई नेता किसी पत्रकार को न तो अखबार से निकलवा पाता और न अखबार की प्रतियां ही जलवा पाता, और न किसी पत्रकार को यह कह पाता कि जिंदगीभर जेल में सड़वा दूंगा।