बस्ती। जिस जिले के हर मोहाने पर मौत खड़ी हो, उस जिले के लोग सुरक्षित रहें तो कैसे रहें? सवाल उठ रहा है, कि क्या लाशो के ढ़ेर लगने पर होगी? अगर जिला मौत के मोहाने पर खड़ा है, तो इसका जिम्मेदार कौन? प्रशासन या फिर वह धन्नासेठ जो लोगों की जिंदगियों को मौत के मुंह में ढकेल रहें हैं। एक सवाल बार-बार उठ रहा है, कि आखिर सुरक्षा के मानकों की क्यों अनदेखी प्रतिष्ठान के संचालक कर रहें है? उससे बड़ा सवाल आखिर प्रशासन ऐसा होने क्यों दे रहा है? क्यों नहीं ऐसे लोगों को मानव सुरक्षा के उपाय करने के लिए बाध्य किया जाता? क्यों नहीं ऐसे अमानक प्रतिष्ठानों के संचालकों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती? क्या यह कार्रवाई लाषों की गिनती पर होगी? याद रखिए जो लोग सुरक्षा की अनदेखी कर प्रतिष्ठान पर प्रतिष्ठान खड़ी करते जा रहें हैं, वही लोग सबसे पहले किसी घटना के षिकार होगें। सवाल उठ रहा है, कि जब करोड़ों लगा सकते हैं, तो क्यों नहीं सुरक्षा के इंतजाम कर सकते? सीएफओ के यह कह देने से काम नहीं चलेगा कि उनका काम रिपोर्ट करना है, कार्रवाई करना और न करना प्रषासन का काम है। आज तक सीएफओ और प्रषासन की ओर से प्रतिष्ठानों के खिलाफ अभियान नहीं चलाया गया, उन्हें इस बात की चेतावनी नहीं दी गई, कि अगर सुरक्षा का इंतजाम नहीं किया, तो प्रतिष्ठान सील होगा। अगर प्रषासन एक भी अमानक प्रतिष्ठान को सील किया होता, आज जिले के लोग मौत के मोहाने पर खड़े नहीं होते। कहा भी जाता है, जब भी कहीं भी और किसी भी प्रतिष्ठान में आगजनी की घटना हुई, तो उसमें पहला कारण सुरक्षा का व्यापक इंतजाम न होना पाया गया। बीडीए के आने के बाद लोगों को लगा कि अब तो प्रतिष्ठानों में सुरक्षा का पूरा इंतजाम हो जाएगा। लेकिन जिस तरह पैसे के लालच में बीडीए ने कोचिंग सेंटरों, नर्सिगं होम सरकारी और गैर सरकारी भवनों का अवैध निर्माण होने दिया, उससे लोगों को हर मोहाने पर मौत खड़ी नजर आने लगी। रही सही कसर एडीएम कार्यालय ने पूरा कर दिया, अगर किसी मैरिज हाल, होटल और गेस्टहाउस जैसे स्थानों पर अग्निकांड होता है, तो इसकी सारी जिम्मेदारी एडीएम की होगी। मीडिया बार-बार इस बात की ओर ईशारा कर रही है, कि साहब बहुत गलत हो रहा है, प्रतिष्ठानें सराय एक्ट के तहत पंजीकरण नहीं करा रही है। अब जरा अंदाजा लगाइए कि बड़ेबन ओवर ब्रिज के सर्विस रोड पर लखनउ की ओर जाने वाले रास्ते पर एक ही स्थान पर तीन-तीन मैरिज हाल है। तीनों की बाउड़ी सटी हुई है। तीनों मैरिज हाल में जाने और आने के लिए एक आठ-दस फिट का रास्ता है, अब जरा इस बात का भी अंदाजा लगाइए, एक साथ तीनों मैरिज हाल में बारात की अगुवानी होती है, सड़क मात्र 15 फिट, अगर कोई हादसा होता तो क्या कोई बच पाएगा, पता नहीं क्यों जानकारी में होने के बाद भी प्रशासन कोई कार्रवाई नहीं कर रहा। इनमें एक मैरिल हाल का नाम हरि गंगा, दूसरे का नाम विजय मैरिज हाल और तीसरे का नाम शांति मैरिज हाल है। लगन के दिनों में तीनों फुल रहता है, और तीनों में कम से कम छह सौ लोग एकत्रित रहते है। यानि छह लोगों की मौत का कारण कौन होगा? प्रशासन, बीडीए या मैरिज हाल के संचालक। यह मत भूलिए कि इस हादसे का शिकार हमारा और आपका परिवार भी हो सकता, उसमें बीडीए और फायर बिग्रेड सहित प्रशासन के लोग भी शामिल हो सकते है। यह तो एक बानगी है। वीरसावकर की लाइब्रेरी के संचालक मनीष मिश्र को उस समय असुरक्षित लाइब्रेरी का ख्याल आया, जब लखनउ कांड हो गया। तब इन्होंने लाइब्रेरी को कुछ दिनों के बंद करने का एलान किया। जब वह व्यक्ति जिले के लोगों को बेस से स्पेस तक ले जाने का सपना देखता हो, और उसी व्यक्ति की लाइब्रेरी ही असुरक्षित हो तो ऐसे व्यक्ति के सपने के बारे में आसानी से सोचा जा सकता है। ऐसा लगता है, कि मानो सभी ने इंसानों की जिंदगी के साथ समझौता कर लिया हो। जिस शहर में बेसमेंट में ओझा डायग्नोससिस्ट और भव्या पैलेस का हाल नियम विरुद्व संचालित हो रहा हो, उस जिले के लोग कहां सुरक्षित रह सकते है। हर कोई प्रतिष्ठानों की सुरक्षा और सराय एक्ट के तहत पंजीकरण के नाम पर धन उगाही कर रहा है। फायर बिग्रेड वाले अलग से कर रहे हैं, बीडीए वाले अलग से कर रहे हैं, पर्यटन और प्रदूषण वाले अलग से कर रहे, विधुत वाले अलग से कर रहे हैं, अगर इतने स्थानों पर सुरक्षा के नाम पर धन उगाही हो रही है, तो कहां लोग सुरक्षित रहेगें। बड़े-बड़े माल में भी लोग सुरक्षित नहीं रह गए। सबसे अधिक जनहानि होने का खतरा अमानक मैरिज हाल और होटलों में है।
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