बस्ती। बीडीए ही पहला ऐसा विभाग होगा जहां पर हजारों और लाखों का नहीं, बल्कि करोड़ों का खेल होता है। जाहिर सी बात हैं, जिस विभाग में करोड़ों का खेल होता है, उस विभाग के अधिकारी और कर्मचारियों की गिनती भी करोड़पतियों में होती है। यह लोगों से 10-20 हजार की नहीं बल्कि लाख-दो लाख की डिमांड करते हैं, अगर कहीं बड़ा आसामी मिल गया तो यह रकम 10-20 लाख तक पहुंच जाती हेै। इस विभाग में वित्तीय घोटाले के नाम पर उतना खेल नहीं होता, जितना गैरवित्तीय के मामले में होता है। इस कार्यालय में इस बात की रणनीति नहीं बनती कि किस तरह भवन स्वामियों को उनके भवन निर्माण में मदद पहुंचाई जाए, और किस तरह विकास किया जाए, बल्कि इस बात की योजना बनती है, कि किसे बकरा बनाया जाए, और विकास के नाम पर अधिक से अधिक धन लूटा जाए। इसके लिए इस विभाग के अधिकारी और कर्मचारी उस पूर्व कैबिनेट मंत्री राजकिशोर सिंह को तहे दिल से पिछले पांच सालों से शुक्रिया अदा कर रहे हैं, जिनकी बदौलत आज यह लोग राज कर रहे है। इस कार्यालय में लाखों रुपये का विकास शुल्क देने वाले भवन स्वामियों की नहीं बल्कि उन अवैध निर्माण करने वाले लोगों का दिल खोलकर स्वागत किया जाता है, जो मोटा लिफाफा लेकर आते है। ऐसे लोगों को चाय-काफी पूछी जाती है, और अन्य को पानी तक नहीं पूछा जाता, कुर्सी पर बैठने को कहने की तो दूर की बात है। वैसे बीडीए के भ्रष्टाचार का मुद्वा सपा के प्रेसवार्ता में भी उठा, और मीडिया ने इसके लिए सपा के सांसद और विधायकों को जिम्मेदार माना।
आज हम आपको उस लगभग 100 नोटिस के खेल के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्हें अवैध निर्माण करने वाले भवन स्वामियों को भेजा ही नहीं गया, बल्कि नोटिस का डर दिखाकर करोड़ों की वसूली की गई। नियमानुसार जब जेई किसी के अवैध निर्माण के मामले में का चालान काटता है, तो विभाग उसे इस बात का नोटिस भेजता हैं, कि क्यों न आप के निर्मित्त भवन या प्रतिष्ठान को ध्वस्त कर दिया जाए। चूंकि सभी अवैध निर्माण करने वालों की परिधि में आते हैं, इस लिए ध्वस्तीकरण का नाम सुनते ही परेषान हो जाता है। खेल यहां से शुरू होता है, नोटिस को दिखाने के कागजों में भेल दी जाती है, लेकिन उसे भेजी नहीं जाती, बल्कि जिसके नाम नोटिस जारी होना है, उसके पास बीडीए को कोई व्यक्ति जाता है, और कहता है, कि आपके नाम ध्वस्तीकरण की नोटिस जारी हुई है। उसके बाद उसे कार्यालय बुलाया जाता है, मामले को रफादफा करने के लिए लेन-देन का मामला मौके पर ही हो जाता, बस कितना लेना है, यह कार्यालय के साहब लोग तय करते है। आप लोगों को जानकर हैरानी होगी कि बीडीए ने आज भी नोटिस को नहीं भेजा, बल्कि उसके नाम पर सौदेबाजी अवष्य कर ली। अगर नोटिस भेज दी जाती तो राजस्व के रुप में बीडीए को करोड़ों का लाभ होता, जो लाभ बीडीए को होना चाहिए था, उसे साहबों और मेटों ने मिलकर बंदरबांट कर लिया। हालांकि षासन में इसकी षिकायत की गई, दावा किया जा रहा है, कि अगर इसकी जांच ईमानदारी से हो जाए तो कम से दो सचिव, दो-तीन एक्सईएन, जेई और एई सहित कई मेट फंस सकते है।
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