बस्ती। बाबूओं के चाहने भर की देर, भ्रष्ट साहबों को एक कप चाय भी नशीब नहीं होगा। बार-बार सवाल उठ रहा है, कि बाबू ही क्यों बार-बार सूली पर चढ़ता? अधिकारी क्यों नहीं? लखनऊ वाले कांड के बाद यह सवाल उठ रहा है, कि उस अधिकारी पर क्यों नहीं कार्रवाई की गई? जो कांड का असली गुनहगार है? क्यों उसके खिलाफ की गई, जो जिम्मेदार ही नहीं था? सरकार ने भी उन्हीं लोगों को जिम्मेदार मानकर कार्रवाई कर दी , जो जिम्मेदार ही नहीं थे, इसे लेकर प्रदेश भर में इसका विरोध हो रहा है। इस घटना के बाद की कार्रवाई को लेकर नीचे वाला कर्मी अपने आपको असुरक्षित महसूस कर रहा है। अनेक सवाल उठ रहे है। कहा जा रहा है, सरकार भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ क्यों नहीं कार्रवाई करती, और अपनी नाकामी को छिपाने के लिए अधीनस्थों पर कार्रवाई कर देती। इसकी सबसे अधिक प्रतिक्रिया बस्ती के जिला कृषि अधिकारी कार्यालय में हो रही है। चूंकि इस कार्यालय में भी वही हुआ जो लखनउ में हुआ। कृषि मंत्री ने यह कहते हुए कार्यालय के चार भ्रष्ट बाबूओं का तबादला कर दिया, कि यह लोग किसानों का हक मार रहे थे, लेकिन इस कार्यालय के मुखिया यानि जिला कृषि अधिकारी को क्लीन चिट दे दिया, जब कि साहब ही असली भ्रष्टाचार का जड़ है। इसे देखते हुए पहली बार बाबूओं ने मंत्री की कार्यशैली पर सवाल उठाएं। कहा भी जाता है, कि अगर बाबम अपना हाथ खंीच ले तो साहबों के घरों में सब्जी जाना मुस्किल हो जाए, आज जितने भी भ्रष्ट अधिकारियों के पास आय से अधिक संपत्ति हैं, वह बाबूओं की बदौलत है। अगर कृषि विभाग में जिला कृषि अधिकारी कार्यालय के सभी बाबूओं पर सूली पर चढ़ा दिया, और भ्रष्टाचार के सरगना यानि जिला कृषि अधिकारी को छुआ तक नहीं गया, तो इसके लिए भी बाबूओं को ही जिम्मेदार माना जा रहा हैं। बाबूओं को यह तब याद आता है, जब उनके उपर पड़ती है, वरना, तो बाबू और साहब मिलकर जो करना चाहते हैं, वे करते है। मंत्री तक को मालूम हैं, अगर किसी कार्यालय में भ्रष्टाचार हो रहा है, तो वह उस कार्यालय के साहब के नाते हो रहा, लेकिन जब कार्रवाई की बारी आती है, तो गाज साहब पर नहीं बल्कि बाबूओं पर गिरा दी जाती है। इस घटना के बाद कम से कम कृषि विभाग के बाबूओं को तो अब सचेत हो जाना चाहिए, बाबूओं को यह निर्णय करना होगा, कि वह अपने साहबों को कमवाकर नहीं देगें, जो भी कमाएगें, अपने के लिए कमाएगें, अब वह साहबों के अवैध कमाई का जरिया और मोहरा नहीं बनेगें। यकीन मानिए जिस दिन बाबूओं ने यह निर्णय ले लिया, उस दिन साहब के चेंबर में चाय समोसा जाना बंद हो जाएगा। सुबह से षाम हो जाएगा कोई एक कप चाय पिलाने वाला नहीं मिलेगा, साहब भले ही दिन भर चाय पहीं पिएगें, लेकिन जेब हल्का नहीं करेगें, क्यों कि इसकी उन्हें आदत ही नहीं हैं, और इस आदत को बाबूओं ने खराब किया। चूंकि अभी तक इस विभाग के बाबूओं को कोई झटका नहीं लगा था, और वह जो चाह रहे थे, वह हो रहा था, लेकिन इस बार इन्हें लग गया कि असली दोषी वह नहीं बल्कि उनका साहब है। साहबों की जेबें भरना बंद करिए, बल्कि उनके अवैध कमाई पर कुठाराघात करिए, फिर देंखिए उल्टी गंगा कैसे बहती है। जो बाबू कभी साहब की जीहूजूरी करता था, उसकी जीहूजूरी साहब करने लगेंगे, क्यों कि यह सभी को मालूम हैं, कि बाबू अवैध कमाई को तो ठुकरा सकता है, लेकिन साहब नहीं। यही बाबूओं को अपने साहबों को एहसास भी कराना है। साहबों की इसी कमजोरी का फायदा बाबूओं को उठाना होगा, और उन्हें एहसास करा होगा, कि मेरा भी कोई वजूद है। अगर साहबों को कमजोर करना है, तो बाबूओं को एक दूसरे कि खिलाफ शिकायत करवाना बंद करना होगा। बल्कि एक दूसरे को सपोर्ट करना होगा। समिति के सचिवों की तरह दिखा देना होगा, कि दबदबा था, दबदबा हैं, और दबदबा रहेगा।