बस्ती। 10 साल तक कृषि मंत्री रहने के बाद भी अगर किसान खाद के लिए तरसे तो उस मंत्री को नैतिकता के नाम पर किसानों से माफी मांगते हुए त्वरित इस्तीफा दे देना चाहिए। जो मंत्री इतने सालों बाद भी अपने गृह जनपद को भ्रष्टाचारमुक्त न बना पाया हो, वह मंत्री बनने के लायक नहीं है। किसानों की माने तो पिछले लगभग दस सालों में सूर्य प्रताप शाही के कार्यकाल में भ्रष्टाचार का रिकार्ड बना। अगर कृषि मंत्री इतने सालों में भी किसानों को निर्धारित दर और समय से खाद न उपलब्ध करवा पाए, तो ऐसे मंत्री के होने और न होने का क्या मतलब? जो मंत्री आन कैमरा पत्रकार के सवाल से तंग आकर यह कहे, कि कुछ खर्चा पानी ले लों, ऐसे मंत्री को कैसे ईमानदार कहा जा सकता है? योगीजी को ऐसे मंत्री को यह तो बर्खास्त कर देना चाहिए, या फिर इनका विभाग बदल देना चाहिए। सवाल उठ रहा है, कि क्या भाजपा ऐसे मंत्रियों के रिपोर्ट कार्ड के साथ 27 में चुनाव के मैदान में उतरेगी?
यह जिले वालों का दुभार्ग्य हैं, उसे जितने भी प्रभारी मंत्री मिले, उनमें कोई ऐसा ईमानदार नहीं मिला, जिस पर पार्टी और जनता नाज करे। एक से एक भ्रष्ट मंत्रियों का सामना जिले के लोगों को अब तक करना पड़ा। किसी ने जिले के बेहतरी के काम नहीं किया और न कोई नया उधोग ही लगाया, यहां तक बंद पड़ी चीनी मिल तक को नहीं चलवाया। तो फिर ऐसे लोगों के जिला प्रभारी बनने से क्या फायदा? भ्रष्ट प्रभारी मंत्री को देख उनका विभाग और अन्य अधिकारी भी भ्रष्ट हो जाते है। जिस विभाग के मंत्री पर समूह ग के तबादले में घोटाला करने का आरोप उन्हीं विभाग के कर्मचारी लगाए तो समझ लेना चाहिए, कर्मचारियों की नजर में विभागीय मंत्री की क्या अहमियत? विभाग के अधिकारी अपने भ्रष्ट को देख बहुत खुष होते है। यही कारण है, कि कृषि विभाग के अधिकारी खुले आम कभी खाद तो कभी अनुदान तो कभी मृद्वा परीक्षण तो कभी मेढ़बंदी और समतलीकरण के नाम पर लूट रहे है। योगीजी को कृषि मंत्री से यह पूछना चाहिए, कि आपके पिछले 10 साल की क्या-क्या उपलब्धि रही, यकीन मानिए इन्हें जीरो नंबर मिलेगा। चूंकि योगीजी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसके मंत्री क्या कर रहे हैं? किसानों और आम जनता की माने तो अभी से ही भाजपा के हाथ से 27 निकल गया, और अगर कहीं भाजपा की तीसरी बार सरकार नहीं बनती हैं, तो इसके लिए सूर्य प्रताप षाही, राठौर, ओमप्रकाश राजभर, आशीष पटेल जैसे भ्रष्ट मंत्री ही जिम्मेदार होगें। जिस भाजपा राज्य में मंत्रियों को लूटने की खुली आजादी हो, उस राज्य में जनता और किसान कैसे खुश रह सकते है। रही सही कसर स्थानीय स्तर पर गुटबाजी समाप्त कर देगी। जिस प्रदश में प्रदेश के अध्यक्ष को अपनी पसंद की टीम बनाने का अधिकार न हो, उस प्रदेश के सत्ता पक्ष का अध्यक्ष कैसे मजबूत होगा? षाहीजी ने जिस मकसद से डीओ कार्यालय के बाबूओं का सफाया किया, उस मकसद के सफल होने की संभावना दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही है। बताते हैं, कि जो बाबू बाहर से आ रहे हैं, उन्हें पहले वाले से भी भ्रष्ट बताया जा रहा है। कहने का मतलब जिस विभाग का मंत्री ही भ्रष्ट ाहेगा उस विभाग का अधिकारी और बाबू कहां से ईमानदार होगें। यह पहला ऐसा विभाग होगा, लहां पर बेईमानों का दिल खोलकर स्वागत होता और ईमानदारों को जबरिया वीआरएस दे दिया जाता।
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