बस्ती। आज हम आप लोगों को बताते हैं, कि क्यों नहीं कोई एडीएम बस्ती से जल्दी जाना चाहता? क्यों वह अपना तबादला रोकवाने के लिए पानी की तरह पैसा बहाने को तैयार रहतें है? और क्यों वह इसके लिए नेताओं की दरबारी करते है? आप में से बहुत कम लोगों को मालूम होगा, कि बस्ती मंडल मुख्यालय का जिला प्रदेश का पहला ऐसा जिला हैं, जहां पर एक ही एडीएम का पद है। अधिकांश मंडल के मुख्यालय वाले जिले में कम से एक एडीएम एफआर और एक एडीएम प्रशासन का पद है। यहां तक कि हाल ही में बनाए गए विध्याचंल और देवीपाटन मंडल के मुख्यालय के जनपदों में दो-दो एडीएम की तैनाती है। कानपुर, लखनऊ, प्रयागराज और आगरा जैसे मंडल मुख्यालयों के जनपदों में चार से लेकर आठ एडीएम की तैनाती है। कहने का मतलब जितना अधिक एडीएम साहब लोग होगें, उतना कम हिस्सेदारी होगी। मान लीजिए कि अगर बस्ती में एडीएम का एक पद एफआर और एक पद एडीएम प्रशासन का होता तो विभागों का प्रभार आधा-आधा हो जाता, और जब विभाग आधा हो जाएगा, तो कमाई भी आधी हो जाती। यह समस्या बस्ती मंडल मुख्यालय को छोड़कर प्रदेश के अन्य 17 मंडल के मुख्यालयों के जनपदों में नहीं है। अब आप लोग समझ गए होगें कि क्यों लोग बस्ती का एडीएम बनना चाहता? और क्यों वह बस्ती से जल्दी जाना नहीं चाहते? तभी तो जिले से जाते हुए एक एडीएम यह कह गए थे, कि उन्होंने बस्ती से जितना पैसा कमाया, उतना पूरी नौकरी में नहींे कमाया। ऐसा है, हम लोगों का बस्ती जिला। जिले में आधा दर्जन से अधिक ऐसे मलाईदार विभाग हैं, जिसका प्रभार एडीएम के पास होता है। इनमें सबसे अधिक मलाईदार विभाग स्थानीय निकाय का है। इसके आलावा बीडीए, डूडा, खनन, बाढ़, आपदा, पीडब्लूडी, मंडी समिति कलेक्टेट का प्रभार एडीएम एफआर के पास होता है। इनमें कोई ऐसा विभाग नहीं जिस पर भ्रष्टाचार का आरोप न लगा हो, अगर एडीएम की बातों को सही माना जाए तो एक एडीएम एफआर के हिस्से में साल में कम से कम पांच से छह करोड़ आता है। मान लीजिए की सभी स्थानीय निकाय और नगर पालिका को मिलाकर सालाना बजट 200 करोड़ से अधिक आता है, और जो हिस्सेदारी की परम्परा चली आ रही है, वह दो फीसद की है। इस तरह सिर्फ स्थानीय निकाय से ही सालाना चार करोड़ की हिस्सेदारी हो गई, और अगर कहीं कीर्ति सिंह जैसी कोई ईओ हो तो दो से बढ़कर चार-पांच फीसद हो जाता है। यह हिस्सेदारी ऐसी है, कि जिसे मिलना ही मिलना होता है। चाहें कोई ईमानदार एडीएम हो या चाहें कोई ईमानदार न हो। बाढ़ विभाग के बारे में कौन नहीं जानता कि यहां पर बाढ़ के समय क्या-क्या होता है, सभी को मालूम, बाढ़ विभाग वाले अब तक सरजू नदी में इतना बोल्डर गिरा चुके हैं, कि उससे पूरी नदी ही पट जाती। यही वह विभाग हैं, जहां का ठेकेदार पांच लाख लगाकर एक करोड़ कमाता है, भले ही चाहें भुगतान के लिए उसे एक साल तक इंतजार ही क्यों न करना पड़े? बस्ती में एक एडीएम राकेश शुक्लजी रहे, उनपर बाढ़ विभाग का फर्जी लगभग 20 लाख का भुगतान करने का दबाव बनाया गया, उस समय राजकिशोर सिंह मंत्री थे, उनका भी दबाव रहा, क्यों कि ठेकेदार उनका करीबी रहा। एडीएम साहब ने भुगतान करने से साफ मना कर दिया, यहां तक कह दिया कि चाहें आप मेरा तबादला करवा दीजिए, लेकिन फर्जी भुगतान पर हस्ताक्षर नहीं करुंगा, तत्कालीन डीएम ने भी एडीएम पर भुगतान करने का दबाव बनाया, क्यों कि डीएम साहब भी मंत्रीजी के करीबी रहे। फिर भी उन्होंने भुगतान नहीं किया, अलबत्ता उन्होंने डीएम साहब को यह सुझाव दिया कि मैं 15 दिन के अवकाश पर चला जाता हूं, आप किसी अन्य को एडीएम का प्रभार देकर उससे भुगतान करवा लीजिए, हुआ भी वही, एडीएम साहब अवकाश पर चले गए, और तत्कालीन सीआरओ सोबरन सिंह को एडीएम का प्रभार दिया गया, प्रभार मिलते ही उन्होंने भुगतान कर दिया। आज भी जब भी बाढ़ विभाग के फर्जीवाड़े की बात आती है, तो उसमें तत्कालीन एडीएम शुक्लाजी का जिर्क अवष्य होता है। सवाल उठ रहा है, कि क्यों नहीं आज के एडीएम शुक्लाजी जैसा बनते? क्यों सोबरन सिंह जैसा बनना चाहते? बीडीए का प्रभार अधिकतर एडीएम के पास ही रहा। कौन नहीं इस विभाग और इसके प्रभारी के बारे में नहीं जानता। कहना गलत नहीं होगा, कि आज अगर बीडीए में भ्रष्टाचार व्याप्त हैं, तो इसके लिए सचिवों के भ्रष्ट आचरण कों ही जिम्मेदार माना जा रहा है। मीणा साहब के बाद ऐसा कोई भी बीडीए का सचिव नहीं आया, जिसने भ्रष्टाचार को बढ़ावा नहीं दिया। खनन विभाग का नाम आते ही बालू का अवैध खनन और कारोबार करने वालें माफिया का नाम उभर कर आ जाता है। पीडब्लूडी और आपदा के बारे कुछ कहना सूरज के सामने रोशनी दिखाने जैसा होगा। रही बात डूडा की तो भ्रष्टाचार के मामले में इस विभाग और इसे पीओ का कोई जबाव नहीं। अब आप समझ गए होगें कि जिस एडीएम के पास इतने सारे मलाईदार विभागों का प्रभार हो, वह एडीएम कितना पावरफुल और आर्थिक रुप से कितना मजबूत होगा। साल भर भी एडीएम साहब लोग अगर कार्यालय में बैठकर हस्ताक्षर ही करते रहे तो उनके हिस्से में हर साल पांच से छह करोड़ आ जाता है। आज तक एक भी एडीएम ने न तो किसी ईओ और न ही किसी एक्सईएन के खिलाफ कोई कार्रवाई किया। जबकि साक्ष्य के साथ शिकायतें होती रही। इसी लिए मीडिया बार-बार मेैडम के उस कार्रवाई को सही बताती आ रही है, जो उन्होंने हाल ही एडीएम को लेकर किया। इस तरह की कार्रवाई जब भी किसी अधिकारी के द्वारा की जाती है, आम जनता उस कार्रवाई का स्वागत करती है। मैडम से इसी तरह की अन्य कार्रवाई की भी अपेक्षा की जा रही है। इसकी एक विस्तृत शिकायत सीएम से करते हुए जांच कराने की मांग की गई।
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