बस्ती। कोई भी दिन ऐसा नहीं जाता, जिस दिन न्यायालय के आदेश पर बलात्कार और छेड़खानी के आरोप में पुलिस मुकदमा दर्ज न करती हो। कभी-कभी तो आधे से अधिक मुकदमा न्यायालय के आदेश पर दर्ज होता है, इसका मतलब यह हुआ कि जब पुलिस ने पीड़िता की नहीं सुनी तभी वह न्यायालय में गई, और न्यायालय ने सुनी। अब सवाल उठ रहा है, आखिर क्यों पुलिस का काम न्यायालय को करना पड़ रहा है? क्यों नहीं न्यायालय उन एसओ के खिलाफ कार्रवाई करती जो अपना काम ईमानदारी से नहीं करते? जिस दिन मुकदमा दर्ज न करने वाले एसओ के खिलाफ कार्रवाई होनी षुरु हो गई, उस दिन न्यायालय खाली रहेगा। कहना गलत नहीं होगा, कि पुलिस के चलते न्यायालय पर काम का बोझ बढ़ रहा है, और पीड़िता को अनेकों परेशानियों से गुजरना पड़ता है। जज साहब भी जानते हैं, कि किसी बलात्कार के आरोपी के खिलाफ न्यायालय से मुकदमा दर्ज करवाना कितना खर्चीला और पीड़ादायक होता है। ऐसा लगता है, कि मानो एसओ साहब का काम जज साहब कर रहे है। बार-बार यह सवाल उठ रहा है, कि आखिर एसओ क्यों नहीं बलात्कार, अपहरण, छेड़खानी, लूट और डकैती का मुकदमा दर्ज करते? क्यों एसओ न्यायालय के आदेष पर ही दर्ज करतें? कौन नहीं जानता कि न्यायालय से मुकदमा दर्ज करवाने में एक बलात्कार की पीड़िता और उसके परिवार को किन-किन हालातों से गुजरना पड़ता, पीड़िता को रोज मरना पड़ता, किस तरह एक गरीब परिवार अपनी बहु-बेटी की इज्जत लूटने वाले दरिंदों से लड़ना पड़ता, यह वही पुलिस वाला जान सकता है, जिसके परिवार में ऐसी घटना घटी हो। जिस रेपिस्ट को जेल में होना चाहिए, वह बाहर घूम कर फिर उसी लड़की या महिला के साथ रेप करता है। आखिर एक लाचार बेटी और बहु का परिवार कैसे दरिंदों से बचाए, यह अहम सवाल बना हुआ। पुलिस अगर मुकदमा दर्ज कर कार्रवाई कर देती तो कम से कम दुबारा बलात्कार का शिकार तो नहीं होना पड़ता। एक लड़की और एक बहु की इज्जत एसओ की निगाह में कुछ भी नहीं होता, अगर होता तो वह मुकदमा भी दर्ज करती और रेपिस्ट को जेल भी भेजती। आखिर रेपिस्ट को जेल भेजने के लिए पीड़ित परिवार कहां से पैसा लाए? कैसे वह एसओ को संतुष्ट करे कि मुकदमा दर्ज हो जाए? रेपिस्ट के डर के नाते कौन पीड़िता और उसके परिवार की मदद करेगा? बलात्कार की शिकार का परिवार पुलिस से कोई धन दौलत तो मांगने थाने पर जाता नहीं, वह तो इस लिए जाता है, कि पुलिस उसके दर्द को महसूस करेगी, और मुकदमा दर्ज कर रेपिस्ट के खिलाफ कार्रवाई करेगी, ताकि वह फिर किसी को अपना शिकार न बना सके। अगर पुलिस यह भी नहीं कर सकती तो उसे वर्दी पहनने को कोई हक नहीं। छह अप्रैल 26 को विभिन्न थानों में आधा दर्जन मुकदमा दर्ज हुआ, जिसमें तीन मुकदमा तो न्यायालय के आदेश पर पुलिस ने दर्ज किया, इनमें बलात्कार के दो और छेड़खानी का एक मुकदमा है। अब आप इसी से अंदाजा लगा सकते हैं, कि पुलिस अपनी जिम्मेदारी को कहां तक और किस हद तक निभा रही है। सबसे बड़ा और अहम सवाल यह है, कि जब तक मुकदमा दर्ज नहीं होगा, चाहें वह एसओ खुद दर्ज करे, या फिर न्यायालय के आदेश पर दर्ज करें। मुकदमा दर्ज होने के बाद आगे की कार्रवाई बढ़ती है, यह बात पुलिस अच्छी तरह जानती है, फिर भी दर्ज नहीं करती, क्यों नहीं दर्ज करती यह कहने और लिखने की आवष्यकता नहीं हैं। यकीन मानिए जिस दिन मुकदमा दर्ज हो जाता है, पीड़िता और पीड़िता के परिवार वालों की आधी परेषानी समाप्त हो जाती हैं, क्यों कि मूुकदमा दर्ज होने के बाद उसे यह गम नहीं रहेगा कि रेपिस्ट दुबारा उसकी बेटी या बहु के साथ बलात्कार करेगा? जाहिर सी बात हैं, बलात्कार करने वाला व्यक्ति कोई साधारण परिवार का तो होता नहीं होगा, इस लिए वह बचने के लिए दौलत को लुटाने से नहीं चूकता, यही पर पुलिस कमजोर हो जाती है। इसी लिए उसके नजर में पीड़िता की इज्जत कोई मायने नहीं रखता और बलात्कारी का रखता है, क्यों कि बलात्कारी बचने के लिए सबसे पहले पुलिस को अपना दोस्त बनाती है। बहरहाल, जिस दिन बलात्कार या छेड़खानी के मामले में संवेदनशील हो जाएगी, उस दिन जनता पुलिस की जयजयकार करेगी। पहला बलात्कार का मुकदमा गौर थाने में आयुष कुमार पुत्र चंद्रशेखर, राकेश पुत्र राम तहेश, दिनेश पुत्र राम महेश, अनीता देवी पत्नी राकेश। दूसरा मुकदमा छेड़खानी का परसरामपुर में दुर्गा प्रसाद पुत्र रामजनक, सोनपता पत्नी दुर्गा प्रसाद, आकाश पुत्र दुर्गा प्रसाद एवं शिवा पुत्र दुर्गा प्रसाद साकिनान मेढईया शुक्ल के खिलाफ दर्ज हुआ।
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- Last Update 08 Apr, 02:10 AM
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