बस्ती। जब डीएम, सीडीओ, सीटीओ और सीएमओ को अच्छी तरह मालूम हैं, कि बजट एक करोड़ का आया, तो फिर क्यों नहीं टेंडर करवाते? क्यों कोटेशन के नाम पर दस लाख से एक रुपया कम का अनुमोदन और भुगतान टुकड़ों में चहेतें फर्म को कर दे रहे हैं? यही खेल वित्तीय साल 2025-26 में खेला गया और यही खेल 2026-27 के वित्तीय साल में हो रहा है। अगर जिले के टाप क्लास के अधिकारियों को इतना भी नहीं मालूम कि अगर बजट एक करोड़ हैं, तो टेंडर भी एक करोड़ का होना चाहिए, तो फिर क्यों कोटेशन का खेल हो रहा है? यह एक ऐसा भ्रष्टाचार हैं, जो अनजाने में नहीं बल्कि सोचसमझ कर किया जा रहा है, क्यों किया जा रहा है, यह लिखने की नहीं बल्कि जनता को समझने की आवष्यकता है। ई-आफिस के जरिए इस खेल की शुरुआत एनएचआरएम के आरसीएच डा. बृजेष षुक्ल और चर्चित बाबू संदीप राय से होती है। मान लीजिए कि अगर डीएम और सीडीओ को नियम कानून की जानकारी नहीं हैं, तो सीएमओ और सीटीओ को तो होनी ही चाहिए, अगर है, तो फिर क्यों सबसे पहले दस लाख से कम के कोटेशन पर पोर्टल पर सीएमओ अनुमोदन देते हैं? और क्यों सीटीओ भुगतान करते हैं? जब कि उनके पास बजट की कापी रहती है। सबसे बड़ा सवाल डीएम और सीडीओ पर उठ रहे हैं, कि क्यों वह दस-दस लाख से कम को अनुमोदन ई-आफिस के जरिए दे रहे है? सीटीओ को अच्छी तरह मालूम हैं, कि अगर बजट एक करोड़ का तो एक करोड़ का टेंडर भी होना चाहिए, तो फिर क्यों टुकड़ों-टुकड़ों में दस लाख से कम के कोटेशन की आपूर्ति पर भुगतान पर भुगतान किए जा रहे है। यह भी मान लिया जाए कि सारे अधिकारी गलत कर रहे हैं, तो सीटीओ क्यों गलत भुगतान कर रहे हैं? सारी जिम्मेदारी तो इन्हीं पर आकर बनती है? इसका मतलब यह हुआ कि यह आर्थिक अपराध, संगठित होकर किया जा रहा है। सीएमओ की देखा देखी जिला अस्पताल, महिला अस्पताल, 100 बेड एमसीएच हर्रैया और टीबी अस्पताल के एसआईसी और सीएमएस भी कर रहे है। यह सभी लोग अपने-अपने चहेते ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने और लाभ लेने के लिए सारे नियम कानून तोड़ रहे है। जानकारों का कहना है, कि अगर एक करोड़ का टेंडर हो जाता तो कम से कम रेट में कंपटीशन होता, सरकार के राजस्व का लाभ होता, और क्वानटिटी और क्वालिटी भी सही होती। अब जरा अंदाजा लगाइए कि बजट का सही इस्तेमाल करने के लिए सरकार की ओर से डीएम, सीडीओ, सीएमओ और सीटीओ को जिम्मेदारी दी गई, अगर यही लोग अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाएगें तो उन भ्रष्टाचारी ठेकेदार और अधिकारियों की क्या गलती? टेंडर न होने से एक रुपये के सामान को दस रुपये में खरीदा जा रहा है, सामानों की मात्रा भी कम और घटिया आपूर्ति की जाती है। यह सबकुछ इस लिए हो रहा है, क्यों कि अधिकारियों ने नीजि लाभ के लिए अपने चहेते ठेकेदार को सामान की आपूर्ति का ठेका जो दे दिया। यह भी सही है, कि कुछ भ्रष्टाचार ऐसे होते हैं, जिसे साबित करना कठिन होता है, लेकिन कुछ ऐसे भी भ्रष्टाचार होते हैं, जैसा कि दस लाख से कम का कोटेशन का, इसे साबित करना बहुत आसान होता है। बार-बार मीडिया लिख रहा है, कि सीएमओ, सीटीओ, एसआईसी, आरसीएच और जितने भी सीएमएस हैं, यह लोग इस लिए भ्रष्टाचार करने में सफल हो जातें हैं, क्यों कि उस पर डीएम और सीडीओ का मोहर लगा होता है। षिकायतें होती रहती है, बैठकों में सवाल उठते रहते हैं, लेकिन जांच और कार्रवाई इस लिए नहीं होती क्यों उसमें डीएम और सीडीओ की चिढ़िया बैठी रहती है। कहा भी जाता है, कि जिस डीएम, सीडीओ, सीटीओ, सीएमओ अपनी जिम्मेदारी को निभा देगें उस दिन सबकी कमाई बंद हो जाएगी। इस पूरे मामले में कमिष्नर साहब की भी महत्वपूर्ण भूमिका होने से इंकार नहीं किया जा सकता, अगर कमिष्नर साहब इसे संज्ञान में लेकर टेंडर कराने का आदेश जारी कर दे तो सबकी कमाई पर हथौड़ा पड़ सकता है। हर साल कुल मिलाकर पांच करोड़ से अधिक का गलत भुगतान और अनुमोदन होता है। कमीषन को देखते हुए हर साल लगभग ढ़ाई करोड़ बेईमान अफसरों और ठेकेदारों की जेबों में जाता है। कहा भी जाता है, कि जब तक भ्रष्ट अधिकारी जिले में रहेगें तब तक चहेतें ठेकेदारों की चांदी रहेगी। इस पूरे रोल में जो भूमिका अधिकारियों की होनी चाहिए, वह नहीं निभाई जा रही है। जिसके चलते गोरखपुर के बाबा इंटरप्राइजेज, शुभम अग्रवाल और पिकूं श्रीवास्तव जैसे अन्य चेहेते ठेकेदार सरकारी धन को चूना लगाते आ रहे है।
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