तो ‘टूट’ जाता ब्याज ‘माफियाओं’ का ‘नेक्सस’!

बस्ती। कहना गलत नहीं होगा कि पुलिस ने ब्याज माफियाओं के नेक्सस को तोड़ने का मौंका गवां दिया/चूक गई। मौका था, बड़ेबन रोड स्थित पेटोल पंप के मालिक सरदार पंपी सिंह की हत्या/आत्महत्या का। जिले का बच्चा-बच्चा जानता था, कि पंपी सिंह ने क्यों आत्महत्या/हत्या हुई। जिस तरह इस मामले में महरीपुर और बेलाड़ी के बाबू साहबों/ब्याज माफियाओं का नाम सामने आ रहा था, उससे लगने लगा था, पुलिस अब तो ब्याज माफियाओं का नेक्सस तोड़ कर ही रहेगी। घटना स्थल पर पुलिस के अधिकारियों ने कहा भी था, कि वह इस मामले में सभी पहलूओं पर जांच करेगेें। ब्याज माफियाओं के एगंल पर भी काम करने को कहा गया था। जिस तरह ब्याज माफियाओं ने पेटोल भरवाकर पैसा नहीं दे रहे थे, उससे घाटा इतना अधिक बढ़ गया कि पंपी को आत्महत्या जैसा कदम उठाना पड़ा, या फिर हत्या को अंजाम दिया गया। चूंकि ऐसे मामलों में पुलिस को अंजाम तक पहुंचना आसान नहीं होता। हत्या/आत्महत्या को भी साबित करना कठिन होता। एक समय ऐसा आ गया था, कि पंपी के पास कंपनी से पेटोल खरीदने को पैसा नहीं था, क्यों कि बाबू साहबों ने कर्ज अधिक कर रखा था, मांगने पर कर्ज अदा नहीं करते। वैसे भी ब्याज माफियाओं के खिलाफ पुलिस के पास कोई कर्जदार शिकायत करने नहीं जाता, इन लोगों पर ब्याज माफियाओं का इतना डर रहता है, कि कोई इनके खिलाफ षिकायत करने को कौन कहें, मुंह खोलने को तैयार नहीं। कहा जाता है, कि घटना के बाद और पुलिस की छानबीन से बाबू साहब लोग काफी घबड़ा गए थे, जेल जाने का खतरा सताने लगा था। इसके साथ ही अन्य ब्याज माफियाओं में भी खलबली मच गई, लेकिन ऐसा न जाने क्या हुआ कि खलबली और घबड़ाहत दोनों समाप्त हो गया? पुलिस पहली बार ब्याज माफियाओं के नेक्सेस का बहुत खुलासा करने से चूक गई। पुलिस की यह पहली और बड़ी उपलब्धि होती। उसके बाद बहुत कुछ बदल जाता। कम से कम ऐसे लोगों की कमर तो टूट ही जाती, जो कारोबार तो कुछ नहीं करते, लेकिन कर्ज करोड़ों में बांटते है। पुलिस बड़े से बड़ा खुलासा कर चुकी है, न जाने कितने को जेल भेज चुकी, लेकिन अभी तक एक भी ब्याज माफिया जेल की हवा नहीं खा सके। अब तो यह ब्याज माफिया आर्थिक रुप से इतने मजबूत हो गए हैं, कि चुनाव लड़ने का एलान कर चुके। ऐसे लोगों को कौन समझाने जाए कि जिन लोगों ने हजारों घरों को बर्बाद किया, आत्महत्या तक करने को मजबूर किया, उन्हें कौन वोट देगा? कौन नहीं जानता कि इनके पास इतना धन आया कहां से? कथित नेताजी लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए, कि यह जिला पंचायत अध्यक्ष या क्षेत्र पंचायत अध्यक्ष का चुनाव नहीं जो पैसे से जिला पंचायत सदस्य और क्षेत्र पंचायत सदस्य को खरीदकर कुर्सी पर बैठा जा सके। यह सीधा चुनाव हैं, यहां पर वोट खरीदकर नहीं बल्कि अपनी अच्छी छवि के बदौलत जीता जाता है। चूंकि आजकल धन्ना सेठों को विधायक बनने का जूनून सवार है, जिसने एक दिन भी क्षेत्र की जनता तो समय नहीं दिया, और न कभी उनके दुख सुख में ही षामिल हुए, वह विधायक बनने का सपना देख रहें/देख रहीं है। विदेश से पैसा कमाकर विधायक बनने वालों की भी कमी नहीं है। अगर पैसे के बल पर विधायक बना जा सकता तो उमाशंकर पटवा कब का विधायक बन गए होते। ऐसे लोग मीडिया और चापलूसों के पंसद हो सकते है, लेकिन मतदाताओं के नहीं। सवाल उठ रहा है, कि अगर कोई ब्याज माफिया विधायक बन जाएगा, तो उसका प्रभाव समाज और क्षेत्र की जनता पर क्या पड़ेगा? यह देखने लायक होगा।