‘झूठी’ गवाही ‘देने’ पर ‘जाना’ पड़ेगा ‘जेल’

बस्ती। विरोधी से मिलकर झूठी गवाही देने और झूठा मुकदमा दर्ज कराने की खैर नहीं। जो लोग झूठी गवाही और फर्जी मुकदमा दर्ज कराकर दूसरों को जेल भेजवाते थे, अब उन्हें खुद जेल जाना पड़ेगा। यह हम नहीं बल्कि हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में कहा है। डीजीपी को इस तरह के दोनों मामलों में 60 दिन के भीतर कार्रवाई करते कोर्ट को गुमराह करने वालों के खिलाफ एफआईआर कराने की कार्रवाही की जाए। कोर्ट के इस आदेश से उन लोगों को राहत मिलेगी, जिन्हें फर्जी फंसाने का प्रयास किया जाएगा। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने झूठी एफआईआर दर्ज कराने की प्रवृत्ति पर कड़ा रुख अपनाते हुए एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि झूठी एफआईआर दर्ज कराने वालों और उनके गवाहों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जाए। हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि किसी मामले में फाइनल या क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की जाती है, तो विवेचना अधिकारी को शिकायतकर्ता और गवाहों के लिए कड़े कमेंट लिखने होंगे। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि झूठी गवाही पर मुकदमा चलाना अनिवार्य होगा।

कोर्ट ने कहा कि लापरवाही बरतने पर पुलिस के अफसरों और मजिस्ट्रेट पर भी अवमानना और विभागीय कार्रवाई संभव है। अदालत ने यह टिप्पणी करते हुए कहा कि कानून प्रक्रिया का दुरुपयोग किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है। इस मामले में हाई कोर्ट ने डीजीपी को निर्देश दिया है कि ऐसे अधिकारियों के खिलाफ आदेश जारी किए जाएं जो झूठी एफआईआर दर्ज कराते हैं या जांच में लापरवाही करते हैं। कोर्ट ने कहा कि विवेचना अधिकारी यदि जांच में पाता है कि कोई अपराध नहीं बनता है, तो वह केवल अंतिम रिपोर्ट देकर मुक्त नहीं हो सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस रेगुलेशन के अनुसार विवेचना अधिकारी को भारतीय दंड संहिता की धारा 212 और 217 (अब समकक्ष धाराएं) तथा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 177 और 182 के तहत गलत सूचना देने वालों के खिलाफ कार्रवाई करनी होगी। इसके अतिरिक्त बीएनएसएस की धारा 195(1)(ए) और 215(1)(ए) के तहत भी मुकदमा चलाया जा सकता है। न्यायालय ने कहा कि यदि शिकायतकर्ता द्वारा गवाहों के साथ मिलकर झूठी शिकायत की जाती है, तो पूरी केस डायरी प्राप्त कर आरोपियों के खिलाफ अलग से केस दर्ज किया जाए। साथ ही न्यायिक अधिकारियों को भी निर्देश दिया गया कि वे ऐसे मामलों में पूरी केस डायरी और दस्तावेजों का अवलोकन करने के बाद ही आदेश पारित करें। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि क्लोजर रिपोर्ट के समय शिकायतकर्ता विरोध याचिका (प्रोटेस्ट) दाखिल करता है और सुनवाई के बाद यह पाया जाता है कि अपराध किया गया है, तो न्यायालय धारा 190(1)(ए) या 190(1)(बी) के तहत संज्ञान ले सकता है। हाई कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि पुलिस महानिदेशक, पुलिस आयुक्त, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, पुलिस अधीक्षक, विवेचना अधिकारी और थाना प्रभारी यह सुनिश्चित करें कि झूठी एफआईआर या झूठी गवाही के मामलों में सख्त कार्रवाई हो। सभी संबंधित अधिकारियों को आदेश की तारीख से 60 दिनों के भीतर कार्रवाई पूरी करने के निर्देश दिए गए हैं।