बस्ती। रेडक्रास सोसायटी के आजीवन सदस्य बनाने के लिए जिन लोगों ने अपने संबधों के आधार पर 221 लोगों से एक-एक हजार शुल्क के रुप में लिया, क्या यह लोग कभी आजीवन सदस्यता ग्रहण कर पाएगें? यह सवाल इस लिए उठ रहा है, क्योंकि सदस्यता शुल्क जमा किए लगभग सात माह हो गए, लेकिन अभी तक इन्हें सदस्य बनने की कोई जानकारी नहीं दी गई। सवाल उन लोगों पर भी उठ रहा हैं, जिन लोगों ने एक-एक हजार के रुप में दो लाख 21 लाख लिया, वे लोग भी नहीं बता पा रहे हैं, और न यह लोग उस तरह प्रयास कर रहे हैं, जिस तरह सदस्यता अभियान में सदस्य बनाते वक्त किया था। कहा जाता है, कि जब तक जमा किए धनराशि का 30 फीसद अंश राज्य प्रबंधक को नहीं जाएगा, तब तक सदस्य नहीं बन सकते है। देखा जाए तो गलती सदस्य बनने वालों की नहीं बल्कि बनाने वाली की है। आखिर यह क्यों नहीं अंश भेजवाने के लिए प्रयास करते। सबसे बड़ी बिडबंना यह है, कि रेडक्रास सोसायटी के कोशाध्यक्ष राजेश ओझा को यह तक नहीं मालूम कि नये सदस्यता का पैसा जमा है, कि नहीं। इन्हें इतनी भी फुर्सत नहीं कि यह बैंक जाकर पैसा जमा होने की जानकारी लें, और राज्य प्रबंधक को अंष भेजे। जब कि सीएमओ यह लिखित में निर्देश दे चुके हैं, कि राज्य प्रबंधक को अंश भेजे, बावजूद अंश नहीं भेजा जा रहा है, क्यों नहीं भेजा रहा है, यह सवाल हर वह व्यक्ति कर रहा हैं, जिसने एक हजार जमा किया। यह भी नहीं कि कोशाध्यक्ष को अपनी जेब से अंश भेजना है। यह पैसा उस दिन ही भेज देना चाहिए था, जिस दिन बैंक में पैसा जमा किया गया। बताया जा रहा है, कि अंश इस लिए नहीं भेजा जा रहा है, ताकि दूसरे पक्ष की ताकत मजबूत न हो। जाहिर सी बात हैं, कि अगर अंश चला गया, और आजीवन सदस्य बन गए, तो कार्यकारिणी के चुनाव में अधिक सदस्य बनाने वाले का पलड़ा भारी रहेगा, और जब उसके सदस्य चुने जाएगें तो बहुमत के आधार पर सभापति भी उन्हीं का होगा। मीडिया बार-बार यह कहती आ रही है, कि जब से चुनाव हुआ, तभी से काम कम और राजनीति अधिक हो रही है। पद के लिए जितना लालायित देखा गया, अगर उतना सोसायटी की बेहतरी के लिए लालायित रहते तो आज रेडक्रास सोसायटी की इतनी बड़ी बदनामी न होती। जाहिर सी बात कि जब निष्ठाएं बदल जाएगी तो आपसी भाईचारा, प्यार मोहब्बत सभी खतरे में पड़ जाएगा। सबसे अधिक वोटों से जीतने वाला और नया सदस्य बनाने वाला अगर किनारे हो जाएगा तो सवाल उठेंगें ही। रही सही कसर कथित नियम विरुद्व सभापति का चुनाव करके पूरा हो गया। अब तो कोई एक दूसरे का हालचाल पूछना और बात तक करना पसंद नहीं करता। इतनी कटुता आ जाएगी, यह किसी ने सोचा भी नहीं होगा। अब तो लोग अपने फोन से नंबर भी डिलीट तक करने लगें। जब सोशल मीडिया के जरिए कोषाध्यक्ष ने यह लिखा कि मैं केवल कोषाध्यक्ष हूं, पैसा मेरे पास जमा नहीं हुआ। इस पर राजेश पांडेय ने कमेंट किया जो दर्जनों रसीदें हैं, क्या वे गलत है। इस पर कुलवेंद्र सिंह मजहबी ने लिखा कि कोशाध्यक्ष होने के बाद भी अगर आप को पैसा जमा होने की जानकारी नहीं हैं, तो इस्तीफा दे दीजिए।
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