बस्ती। सवाल उठ रहा है, कि क्या इस बार भी भाजपा जिले की सबसे अधिक हाट सीट माने जाने वाली हर्रैया विधानसभा में दलबदुलुओं पर ही दांव लगाएगी? यहां के लोग सवाल उठा रहे हैं, कि क्यों बार-बार यहां पर दलबदलुओं को ही टिकट दिया जाता? क्या हर्रैया के लोगों की किस्मत में दलबदलू ही लिखे? जगदंबा सिंह को अगर छोड़ दिया तो आज तक पार्टी ने एक भी संगठन के लोगों को टिकट नहीं दिया, क्यों नहीं दिया, यह हर्रैया के लोगों के लिए एक बड़ा सवाल बना हुआ है। हर्रैया में जिस तरह वर्तमान में चल रहा है, उसे देखकर हर्रैया के लोगों को लगने लगा है, कि इस बार भी उनकी किस्मत में दलबदलू ही लिखा। लखनउ यात्रा के दौरान पार्टी के राष्टीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने कहा कि संगठन के लोग मेहनत करें, सवाल उठ रहा है, कि आखिर कब तक संगठन के लोग मेहनत करेंगें, जब भी मेहनत का फल देने की बारी आती है, तो धनबली और बाहुबलि को मौका दे दिया जाता, संगठन के लोगों का कहना है, कि अगर पार्टी के लोगों ने इसमें सुधार नहीं लाए तो भाजपा की सुध लेने वाला कोई नहीं मिलेगा। संगठन के लोग निराश और उदास होकर अपने लिए सुरक्षित जगह तलाश करने में लगें है। हालात यह हो गई कि जिला पंचायत सदस्य का भी टिकट अधिकांश बाहरी लोगों को दे दिया जाता है। हर्रैया में टिकट कटवाने का सिलसिला पुराना है। राजकिशोर सिंह के बाद हर्रैया से जब पहली बार भाजपा जीती थी, तो उस समय दयाशंकर मिश्र का टिकट कटवा दिया गया था। वही खेल आज भी हो रहा है। सवाल उठ रहे हैं, कि क्या हर्रैया में संगठन के लोगों का अकाल पड़ गया, जो बार-बार पार्टी बाहरी लोगों को टिकट दे रही है। भाजपा जो बार-बार अपने लोगों की उपेक्षा कर रही हैं, उससे खाटी कार्यकर्त्ताओं में रोश व्याप्त है, जो कार्यकर्त्ता कभी जीजान से चुनाव में लग जाता था, आज उन्हें तलाशना पड़ रहा है। प्रत्याशियों को भी अब कार्यकर्त्ता नहीं चाहिए, इसके लिए वे पहले ही ठेकेदार टाइप के लोग पाल रखे है। चूंकि नेताओं के पास पैसा इतना अधिक हो गया है, कि वह सोचते हैं, कि अगर कार्यकर्त्ता नहीं मिला तो भी कोई बात नहीं, वह पैसे से कार्यकर्त्ता खरीद लेगें, ऐसे लोगों को षायद यह नहीं मालूम कि पैसे से मजदूर मिलते हैं, कार्यकर्त्ता नहीं। मजदूर तो पैसे के हिसाब से काम करेगा, लेकिन कार्यकर्त्ता अपना समझकर रात दिन लगा रहेगा। कहना गलत नहीं होगा, कि हार का सबसे बड़ा कारण कार्यकर्त्ताओं का साथ न देना रहा। विधायक भी कार्यकर्त्ताओं को सहेजकर नहीं रख पा रहे है, उनके जिविकोपार्जन का ख्याल नहीं रखते। चुनाव में मेहनत तो कार्यकर्त्ता करता है, लेकिन जब कुछ करने की बारी आती है, तो उन ठेकेदारों को काम दे दिया जाता है, जो उन्हें अधिक से अधिक कमाकर दे सकें, जाहिर सी बात कि कार्यकर्त्ता ठेकेदार तो बन नहीं सकता, कहना गलत नहीं होगा कि आज के विधायकों को कार्यकर्त्त्ता नहीं बल्कि कमाउपूत ठेकेदार चाहिए।