बस्ती। मीडिया, जिला पंचायत अध्यक्ष संजय चौधरी को याद दिलाना चाहती है, कि जब आपने एथेनाल बनाने वाली कंपनी से मानचित्र स्वीकृति करवाई 14 लाख विकास शुल्क के रुप में ले लिया तो क्यों आप फैक्टी लगने का विरोध कर रहे है? कम से कम इस मामले में तो ईमानदारी दिखाए होते। जो लोग संजय चौधरी की अगुवाई में फैक्टी लगने का विरोध कर रहे हैं, उनमें शायद ही किसी को यह मालूम होगा, कि फैक्टी का मानचित्र खुद जिला पंचायत अध्यक्ष की सहमति से स्वीकृति हुआ, और इसके लिए कंपनी ने 14 लाख का भुगतान किया, यह वह भुगतान जिसकी रसीद दी गई, उस भुगतान के बारे में पता नहीं चला, जो बीडीए की तर्ज पर कार्यालय वाले अतिरिक्त के रुप में लेते है। अगर इसका विरोध कोई और करता तो बात समझ में आती, लेकिन वह व्यक्ति कर रहा है, जिसकी सहमति से मानचित्र स्वीकृति हुआ। जिला पंचायत खुद फैक्टी लगाने का परमिशन देता है, और इसके अध्यक्ष विरोध करते है, इसे आप क्या कहेगें और क्या समझेगें? इसी लिए, विरोध का उतना समर्थन नहीं मिल रहा है, जितना मिलना चाहिए, क्यों कि सभी को मालूम हैं, कि इस विरोध के पीछे विरोध करने वालों की क्या मंशा छिपी हुई? इसे लेकर तो खुद संजय चौधरी सवालों के कटघरे में है। जिस तरह विरोध करने के बारे में सोशल मीडिया पर कमेंट किए जा रहे हैं, उससे विरोध करने वालों की मंशा का पता चलता है। सभी को मालूम हैं, कि फैक्टी का निर्माण बंद नहीं हो सकता, फिर भी कुछ नेता फैक्टी के चालू होने का विरोध कर रहे हैं, अगर संजय चौधरी का विरोध इतना ही जायज होता तो अब तक इस विरोध में न जाने कितने भाजपाई शमिल हो गए होते, और फैक्टी शायद बंद भी हो गई होती। जिस नेता को अपने ही पार्टी का समर्थन न मिले, समझ लेना चाहिए, कि विरोध गलत है। फिर सवाल उठ रहा है, कि जब यह फैक्टी जिला पंचायत अध्यक्ष के गांव के करीब लग रही हैं, तो क्यों नहीं अब तक विरोध किया? अब क्यों कर रहे हैं, जब फैक्टी बनकर तैयार हो गई? क्यों इन्होंने फैक्टी का मानचित्र स्वीकृति होने दिया? यही कारण रहा है, कि पिछले पांच साल में संजय चौधरी, ठेकेदार शिवकुमार चौधरी को छोड़कर किसी अन्य का विष्वास नहीं जीत पाए हो। एक भाजपा नेता है, जो भ्रष्टाचार के खिलाफ धरने पर भी बैठ चुके हैं, आज वह साढ़े छह लाख पाने के लिए पिछले पांच साल से संजय चौधरी से सिफारिश कर रहे है। नेताजी का दिल जीतने के लिए शुरुआत के दौर में संजय चौधरी ने इन्हें कार्यालय के नवीनीकरण करने का ठेका दिया, चूंकि नेताजी का तो कोई पंजीकरण था, नहीं इस लिए इनसे कहा गया कि शिवकुमार चौधरी के फर्म पर काम करिए। नेताजी ने किसी तरह उधार करके लगभग नौ लाख का काम किया, जब भुगतान करने की बारी आई तो पता चला कि ठेकेदार ने तो सारा भुगतान ले लिया, लेकिन नेताजी को एक रुपया भी नहीं दिया। जब अधिक दबाव पड़ा तो शायद टुकड़ों में लगभग ढ़ाई लाख का भुगतान कर दिया, षेष साढ़े छह लाख का भुगतान आज तक नहीं किया, कभी चुनाव का बहाना बनाया, तो कभी होटल को गिरवी से छुड़ाने का बहाना बनाया, लेकिन भुगतान आज तक नहीं किया, अब तो नेताजी का फोन उठाना ही बंद कर दिया। हाल ही में नेताजी ने सोशल मीडिया के जरिए अपना दर्द बयां किया था, जिसे लेकर लोगों ने संजय चौधरी को खूब टोल किया। बहरहाल, नेताजी जैसे न जाने कितने और नेता और ठेकेदार होगें, जो न रो पा रहें होगें, और न हंस ही पा रहें होगें, क्यों कि दोनों में उन्हीं की बदनामी। बहरहाल, इन चार दिनों में संजय चौधरी चाहें जो कर लें, कार्यालय का उदघाटन करवा ले, त्रिपाठी सिनेमा रोड की दुकानों से पैसा कमा ले, फिर उसके बाद षायद इन्हें कुछ करने को मौका न मिले, और अगर कहीं इन्हें भाजपा वालों ने 2027 में झटका दे दिया तो इनका विधायक बनने का सपना अधूरा रह जाएगा।
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