बस्ती। आज के दौर में जहां पर हाईकोर्ट के जज के घर में से करोड़ों रुपया जला हुआ निकलता है, अगर वहीं पर अगर जज खाना बनाते हो, बर्तन धोते हो, कपड़ा धोते हो, और कोर्ट पैदल जाते होें तो ऐसे जज साहब से अन्य जजों को प्रेरणा लेनी चाहिए। ऐसे जज को सभी लोग प्यार करते हैं, और कहते हैं, जज होतो यह मध्य प्रदेश के खंडवा के अपर सत्र न्यायाधीश अक्षय कुमार द्विवेदी जैसा। जज साहब ने आलीशान सरकारी बंगला, वीआईपी कार और अन्य सरकारी सुविधाएं लेने से इंकार कर दिया है। वे एक छोटे से कमरे में रहते हैं, अपना खाना खुद बनाते हैं और रोजाना पैदल ही कोर्ट जाते हैं। इतना ही नहीं इन्होंने अपनली सैलरी को आधा करने की मांग भी है।
निजी संपत्ति के नाम पर इनके पास सिर्फ अपनी मां का दिया एक मोबाइल फोन है। इन्होंने आजीवन अविवाहित रहने का फैसला इस लिए लिया ताकि मोह माया से दूर सकें। इन्होंने सरकार से कहा कि वह अपनी सेवा देने के लिए देश के किसी भी न्यायालय में जा सकते है। विदेश भी जाने को यह तैयार है। इनका कहना है, कि बचपन में वह अपनी मां को संपत्ति विवाद के दौरान अदालत के चक्कर लगाते देखकर उन्होंने जज बनने का निर्णय लिया था। इसी कारण वे अपनी अदालत में आने वाले मुकदमों, खासकर जमीन-जायदाद से जुड़े मामलों का निपटारा बेहद तेजी से करते हैं ताकि आम लोगों को जल्द से जल्द न्याय मिल सके। कहते हैं, कि इनके न्यायालय से आज तक किसी के साथ अन्याय नहीं हुआ। हर जायदाद से जुड़े मुकदमें में यह पैराकार में अपनी मां नजर आती है। हालत यह है, कि इनकी कोर्ट में हर कोई अपना मुकदमा तबादला कराना चाहता है, ताकि उसे शिघ्र न्याय मिल सकें। इनके न्यायालय में धूस लेना और देना दोनों वर्जित है, पेशकार भी तारीख पर भेंट नहीं ले सकते, हर पेशकार और टाइप बाबू इनके न्यायालय में सेवा देने से घबड़ाता है। वाकई इनके न्यायालय में रामराज्य है। मोवक्किल तो मोवक्किल अधिवक्तागण भी इनके न्यायालय में पैरवी करना पसंद करते है। अगर श्री द्विवेदी जैसा न्यायाधीष हर जिले में एक ही हो जाए तो न्यायालय की गरिमा तो बनी रहेगी, न्याय की उम्मीद भी बढ़ जाएगी। जब तक भेंट के पैसे से भोजन करना बंद नहीं होता, तब तक द्विवेदी जैसे न्यायाधीश जन्म नहीं लेगें।
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