काश, ‘अरविंद पाल’ जैसा दिल ‘केके दूबे’ के ‘पास’ भी ‘होता’

बस्ती। जिले में अनेक ऐसे नकली प्रमुख और चेयरमैन है, जिन्होंने असली के नाम पर पैसा और सम्मान दोनों कमाया, लेकिन इन्होंने जिसके नाम पर पैसा और नाम कमाया, उसके लिए कुछ नहीं किया, वहीं पर ऐसे भी हैं, जिन्हें यह एहसास रहा कि उन्हें भी उनके लिए कुछ करना चाहिए, जिनकी बदौलत नाम और पैसा मिला। इसी में से एक हैं, नगर पंचायत बनकटी के अरविंद पाल, प्रदेश के शायद यह पहले ऐसे भाजपा नेता होगें, जिन्होंने नगर पंचायत बनकटी की महिला चेयरमैन के लिए लखनउ जैसे मंहगे शहर में नया मकान बनवा दिया। इन्होंने महिला चेयरमैन का पूरा मान और सम्मान का ख्याल रखा। वहीं पर बहादुरपुर के असली प्रमुख रामकुमार के नाम पर केके दूबे जैसे दो और लोग लूटकर तिजोरी भर लिया, लेकिन असली प्रमुख के मान और सम्मान का जरा भी ख्याल नहीं रखा। कहते हैं, कि आज भी असली प्रमुख, नकली प्रमुख के घर में चाकरी कर रहे हैं, पक्का मकान कौन कहे, झोपड़ी तक बनवा कर नहीं दिया। तीनों नकली प्रमुखों ने करोड़ों की संपत्ति बना लिया, लेकिन असली प्रमुख के लिए एक अदद कमरा तक नहीं बनवा सके, वहीं पर नगर पंचायत बनकटी की चेयरमैन के नाम अरविंद पाल ने लखनऊ जैसे बड़े शहर में मकान बनवा दिया। पैसा और नाम तो दोनों ने असली के नाम पर ही कमाया, लेकिन जिम्मेदारी अरविंद पाल ने निभाया। यही जिम्मेदारी अगर अन्य नकली प्रमुख और नगर पंचायत चेयरमैन उठा लेते तो कम से कम असली लोगों को सम्मान जनक तरीके से जीवन बिताने का मौका तो मिल जाता। इस मामले में अरविंद पाल की जितनी भी प्रसंशा की जाए कम हैं, बहुत कम ऐसे लोग होते हैं, जो अरविंद पाल जैसा सोच रखते है। वैसे भी यह भाजपा के ‘सबका साथ और सबका विकास’ के नारे के साथ चलते है। बाबू साहब और पंडितजी में षायद यही फर्क है। अरविंद पाल और केके दूबे दोनों को पूर्व सांसद का करीबी माना जाता है, पंडितजी ने पैसा कमाकर पूर्व सांसद का न सिर्फ नाम खराब किया, बल्कि उन्हें हरवाया भी। दूसरे ने विकास करके पूर्व सांसद के नाम को रोशन किया। अगर ऐसा नहीं होता तो दो दिन पहले बनकटी के एक कार्यक्रम में पूर्व सांसद हरीश द्विवेदी अरविंद पाल को बनकटी का विकास पुत्र नहीं कहते। बहुत कम ऐसे हैं, जो अरविंद पाल की तरह सोच रखते हैं, वरना अधिकांश तो गला काटने में भी परहेज नहीं करते। क्षेत्र की जनता अरविंद पाल को बहुत आगे देखना चाहती है। जिस नेता का काम दिखे उसे ही जनता नेता मानती है। जो मान-सम्मान अरविंद पाल को मिला, वह बहुत कम लोगों को मिला। हर क्षेत्र में इनका बढ़चढ़कर हिस्सा लेना और उसे व्यापक बनाना अगर किसी को सीखना हो तो उसे अरविंद पाल से सीखना चाहिए। अब जरा अंदाजा लगाइए कि असली प्रमुख होने के बाद भी अगर कोई एक कमरे के लिए तरसे और दूसरा नकली होने के बाद भी तिजोरी भरे, तो क्या जनता ऐसे लोगों को मान-सम्मान देगी?