तो ‘क्या’ ‘बोगस’ फर्म गणपति फार्मा ने ‘रची’ ‘साजिश’?
बस्ती। सवाल उठ रहा है, कि जब बीसीडीए के अध्यक्ष और उनकी पत्नी की फर्म सहित अन्य फर्मो ने तथा कथित फर्म गणपति फार्मा को लाखों शीशी कोडीनयुक्त सीरप बिल से बेचा और गणपति ने भुगतान भी फर्मो के खाते में किया, तो फिर दोषी कौन? बेचने वाला या फिर खरीदने वाला? कोडीन बेचने वाली फर्मो का कहना है, कि जो भी गड़बड़ी हुई, वह गणपति फार्मा की ओर से हुई। पुलिस को जिस दिन गणपति फार्मा के मालिक मिल जाएगें, उस दिन सच सामने आ जाएगा। यह भी कहते हैं, कि गणपति फार्मा वाले जो भी सीरप ले जाते थे, वे होलसेल के दुकानों से ही ले जाते थे, एक भी शीशी की डिलीवरी होलसेल के द्वारा गणपति फार्मा को टांसपोर्ट के माध्यम से नहीं की गई। यह भी एक साजिष का हिस्सा हो सकता है। होलसेलर्स यह कहकर पल्ला झाड़ ले रहे हैं, कि हमने माल बेचा और हम्हें एकाउंट के जरिए गणपति फार्मा ने भुगतान किया, अब सीरप कहां गया कौन ले गया, यह हम लोगों को नहीं मालूम, और न हम लोग जानना ही चाहते है। यह भी कहते हैं, कि गणपति को लाइसेंस किसने दिया और कैसे मिला यह भी उन लोगों को नहीं मालूम, यह विषय डीएलए और डीआई का है। डीआई ने बिना मौका मुआयना किए लाइसेंस कैसे दे दिया? यह डीएलए और डीआई ही बता पाएगें, हम लोगों को इतना मालूम हैं, कि हम लोगों ने सीरप गणपति फार्मा को बेचा, और गणपति फार्मा ने हम लोगों को आन एकाउंट भुगतान किया, एक रुपये का भुगतान नकद नहीं लिया गया। कहा कि आजमगढ़ भी जो बेचा गया, उसका भी भुगतान फर्म ने एकाउंट के जरिए किया, कहते हैं, कि खरीद फरोख्त से संबधित जो भी कागजात थे, उसे एसआईटी को उपलब्ध करा दिया गया। इन लोगों की माने तो गलती गणपति फार्मा और विभाग की है। यह भी कहते हैं, कि अगर सौ शीशी भी टांसपोर्ट से जाता तो गणपति फर्म के होने या न होने का पता चल जाता है। चूंकि सारा माल गणपति फर्म वाले दुकान से लेकर गए, इस लिए फर्म के बोगस होने की जानकारी उन्हें नहीं हो सकी। जब इन लोगों से यह पूछा गया कि जब आप लोगों की ओर से कोई गलती नहीं तो आप लोगों का लाइसेंस निरस्त क्यों हुआ? कहने लगे कि औषधि विभाग वाले जल्दबाजी में अपने को बचाने के लिए हम लोगों के खिलाफ आनन-फानन में नियम विरुद्व कार्रवाई कर दिया, यह भी कहते हैं, कि हम लोग लाइसेंस की बहाली के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाएगें। यह लोग जोर देकर कहते है, कि कोई भी कारोबार कागजों में नहीं बल्कि माल टांसपोर्ट के जरिए विभिन्न फमों को आया, जिसका उन लोगों के पास रिकार्ड भी है। बार-बार यह सवाल उठ रहा है, कि क्या गणपति इतने बड़े खेल में अकेला है, या फिर और कोई भी हैं? एसआईटी को उपलब्ध कराए गए दस्तावेज से तो यही पता चलता है, कि सारी गड़बड़ी गणपति फर्म के पंकज ने किया। सबसे बड़ा सवाल तो डीएलए और डीआई पर उठ रहा है, कि यह कारोबार पिछले दो सालों से बस्ती में हो रहा है, और इन्हें पता ही नहीं चला, पता तब चला जब लखनऊ वालों ने कार्रवाई को कहा। अगर लखनऊ वाले नहीं कहते तो नशे का यह कारोबार न जाने कितने महीनों और सालों तक चलता रहता, और न जाने कितने परिवार बर्बाद होते रहते। बहरहाल, अभी भी कई सवालों के जबाव आना बाकी है। अभी तो इसके सरगना का चेहरा सामने आना है। लाइसेंस का निरस्त होना, कहीं न कहीं किसी ओर ईषारा करता है, अगर डीएलए और डीआई ने अपने बचने के लिए गलत कार्रवाई किया, तो विभाग को हाईकोर्ट में इसका जबाव देना पड़ेगा। यह भी साफ हो गया कि अब लाइसेंस की बहाली हाईकोर्ट के जरिए ही होगी। अभी तो पूरे विभाग की किरकीरी समाज में ही हो रही है, लेकिन जैसे ही यह मामला हाईकोर्ट पहुंचेगा, वैसे ही न जाने इसकी चपेट में कितने अधिकारी आएगें।
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