बस्ती। आज एक खबर ने उन लोगों के चेहरे बेनकाब कर दिए, जो समाज में अपने आपको बहुत बड़ा समाजसेवी बताते नहीं थकते। खबर में किसी का भी नाम नहीं हैं, फिर भी इन्हें लगा कि वह तो नंगा हो गए। जिस तरह कमेंट करने वालों की नजर में मानो पत्रकार बहुत बड़ा चोर और बेईमान होता है, और यह लोग ईमानदार होते है। एक तरह से इन लोगों ने पत्रकार के मकसद को पूरा कर दिया, कहा भी जाता है, कि अगर किसी खबर की चर्चा न हो तो वह खबर नहीं होता। एक अच्छा नेता और कारोबारी वही होता है, जो कमेंट नहीं करता। कमेंट करने का मतलब चोर की दाढ़ी में तिनका जैसा माना जाता है। तत्कालीन डीएम अशोक कुमार सिंह से जब पत्रकारों ने पूछा कि हम लोग रोज आप की व्यवस्था के खिलाफ खबर लिखते हैं, लेकिन आप कभी कमेंट नहीं करते, कहनें लगे कि जिस दिन हमने कमेंट कर दिया, उस दिन तुम्हारा मकसद हल हो जाएगा। लेकिन यहां पर तो पत्रकार को ऐसा लगा कि मानो उसने खबर लिखकर बहुत बड़ा गुनाह कर दिया। खबर न लिखो तो कहन लगतेे हैं, कि कुछ मिल गया होगा तो नहीं लिखा होगा, और खबर लिखो तो कहते हैं, कि पैसे के लिए लिखा होगा। आखिर एक पत्रकार करें तो क्या करे? आप लोगों को जानकर हैरानी होगी कि ऐसे लोगों ने पत्रकार को दलाल, चोर और बेईमान लिखा, जिनसे पत्रकार का कभी वास्ता ही नहीं पड़ा, और न कभी उनसे मिला भी। कहा भी जाता है, कि अगर किसी को किसी खबर से कोई दिक्कत हो तो वह पहले नोटिस दे सकता है, और उसके बाद भी अगर उसे संतुष्टि नहीं मिलती तो न्यायिक का सहारा ले सकता है। लेकिन किसी को चोर बेईमान और दलाल न तो कहा जा सकता है, और न ही लिखा ही जा सकता है। ध्यान रहे, जितना अधिकार दलाल लिखने वाले को हैं, उतना अधिकार पत्रकार को भी है। कानून सबके लिए बराबर हैं, इस लिए ध्यान दीजिए, कुछ भी लिखने से पहले हजार बार सोच लीजिए कि क्या लिख रहें, और क्या उन्हें गंदा कमेंट करने का अधिकार है? पत्रकारों की ओर से सवाल उठ रहा है, कि एक पत्रकार ने किसको लूट लिया, किसके घर डांका डाला और किसकी जेब काटी, लेकिन लिखने और कहने वाले अधिकांश लोगों ने तो सरकार का धन लूटा, आम जनता को बेवकूफ बनाया, निधि का करोड़ों हजम किया। कुछ भी लिखने और पढ़ने से पहले भी हजार बार सोच लीजिए कि पत्रकार के खबर लिखने के पीेछे मंशा क्या है? यह मत भूलिए कि एक पत्रकार की आवष्यकता सबको पड़ती है। ऐसे-ऐसे लोगों ने पत्रकार को चोर और बेईमान बनाया, जिन्होंने न जाने कितने का करोड़ों रुपया हजम कर लिया। सबसे बड़ा सवाल यह है, कि जनता को क्या चाहिए, ईमानदारी से लिखने वाला पत्रकार या फिर सरकार और आम लोगों को लूटने वाला लुटेरा। पत्रकार ने तो न तो खबर में और न बाहर किसी को गाली दिया, और न चोर बेईमान ही कहा, तो फिर किस अधिकार के साथ पत्रकार को दलाल, चोर बेईमान कह दिया, अगर यही बात आप लोगों को कही जाए तो कैसा लगेगा? पत्रकार भी समाज के बीच का ही होता है, और वह समाज के लिए लड़ता है, लेकिन जरा सोचिए बेईमान नेता किसके लिए लड़ते है।

अब जरा जीडी मिश्र के बारे जानिए, इनसे आज तक पत्रकार नहीं मिला और न कभी बातचीत ही किया, फिर भी इन्होंने लिखा कि इसकी मानसिक दशा बिल्कुल खराब है। बस यह दलाली मक्कारी के चक्कर में परेशान रहता है, बाकी कुछ नहीं भैया, यह पत्रकार कम और दलाल ज्यादा हैं, बस यह किसी लायक नहीं है, चंद सिक्कों पर नाचने वाला व्यक्ति हैं, अगूंर न मिले तो खटटे हैं, यह कहावत सबको पता है। जीडी साहब लिखे गए शब्दों और खबर को फिर से पढ़ लीजिए, और सोचिए कि कहीं यही शब्द आपके बारे में इस्तेमाल करता तो आप क्या करतें? इनका समर्थन दिव्यांशु खरे जैसे व्यक्ति ने किया। अवनीष सिंह ने भी बिना सोचे समझे लिख डाला, लिखा कि पत्रकार की लेखनी से इनकी दूषित मानसिकता को उजागर करता है। लिखते हैं, तुम तो अपना चार परिवार लेकर चल नहीं सकते, और समाज को लेकर चलने वाले पर टिपणी करते हो, कभी दलाली से समय मिले तो उन लोगों के पास चले जाना जिनको पेड़ा और झोला बनाने का अवसर मिला। खुद की लेखनी पर शर्म आएगी। इनसे भी पत्रकार आज तक नहीं मिला और न बातचीत किया, लेकिन इनकी लेखनी से लगता है, कि यह पत्रकार को बहुत अच्छे तरीके से जानते है। मैं फिर उन लोगों से अपील करता हू, पहले दो बार खबर को पढ़े और फिर अपनी राय कायम करें, यकीन मानिए, हमको शर्म नहीं आएगी। मैं उन लोगों से एक बात कहना चहता हूं, कि जिस दिन एपिस्टीन फाइल की तरह लड़की सप्लाई करने वाला ‘लोकांटो’ वेबसाइड की फाइल, एफआईआर और चार्जशीट को खोल दिया तो भागते नजर आएगें। इस लिए काफी सोच समझ कर अपनी राय बनाइएगा। रही बात मौत की, तो वह आप लोगों के हाथ में नहीं हैं, जिस दिन और जिसके हाथ मरना होगा, वह मर जाएगा। पत्रकार के द्वारा खबर को पूरी तरह कानूनी पहलू को नजर में रखकर लिखी और आगे भी लिखी जाएगी।