बस्ती। जिला विकास समन्यवक एवं निगरानी समिति यानि दिशा की बैठक में फिर इसके अध्यक्ष सांसद रामप्रसाद चौधरी की गाड़ी आठ मिनट लेट पहुंची, जब कि अन्य सभी विधायकों और अधिकारियों की गाड़ी समय से पहुंच गई थी। टाइमिगं के मामले में अगर किसी नेता को सीखना हो तो वह पूर्व सांसद हरीष द्विवेदी से सीख सकते है। पहली बार सत्ता और विपक्ष के पांचों विधायकों को एक साथ बिजली विभाग सहित अन्य विभागों पर हमला बोलते देखा गया। सबसे पहला हमला विधायक अजय सिंह ने बिजली विभाग के अधिकारियों पर बोलते हुए कहा कि आप लोग तीन साल से झूठ बोलते आ रहे हैं, मखौढ़ा में अभी तक टांसफारमर नहीं लगा। वहां की जनता हाहाकर मचा रही है, धरने पर बैठ रही है, और आप लोग झूठ पर झूठ बोलते जा रहे है। उन्होंने एसई से पूछा कि क्यों नहीं अभी तक ठेकेदार के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाया गया। कहा कि कोई नियम कानून हैं, कि नहीं है। जो लोग राजनीति से प्रेरित होकर काम नहीं होने दे रहे हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई करिए, लेकिन सबसे बड़े सदन में इस तरह झूठ मत बोलिए। इस पर विधायक अतुल चौधरी ने भी हमला बोलते हुए कहा कि एसई साहब बिजली उपभोक्ताओं को बिजली का सपना मत दिखाइए, उन्हें बिजली दीजिए। क्षमता वृद्वि का सपना मत दीखाइए। वैसे भी डीजल, पेटोल और गैस सिजेंडर नहीं मिल रहा है, उपर से आप लोग बिजली भी नहीं दे रहे है। विधायक राजेंद्र चौधरी ने भी कहा कि एसई साहब झूठ बोलना बंद करिए। संसारपुर में अभी तक आपने क्षमता वृद्वि वाला टांसफारमर नहीं लगाया। विधायक महेंद्र नाथ यादव ने हमला बोजते हुए कहा कि बताइए, कहां लगाया टांसफारमर, कब लगाएगें, कहा कि दो बच्ची मर गई, फिर भी नगंा तार नहीं बदला गया। कहा कि मनरेगा में 60-40 का रेसियो का पालन नहीं हो रहा है, और मनमाने तरीके से पक्केे काम को एलाट किया जा रहा है, जबकि जिसने कच्चा काम किया, उसे भी पक्का काम मिलना चाहिए। यह सवाल पिछले वाली बैठक में महेंद्र यादव ने उठाया था, लेकिन पालन ही नहीं किया। विधायक दूधराम तक ने हमला बोलते हुए कहा कि जब जेई फोन ही नहीं उठाएगें तो बिजली के बारे पता कैसे चलेगा, कहा कि जनता बिजली से दुखी हैं, मर रही है, और जेई फोन ही नहीं उठाते। एक विधायक करे तो क्या करे, जब जेई फोन नहीं उठाएगें। एमएलसी प्रतिनिधि हरीश सिंह ने भी हमला बोलते हुए कहा कि उपभोक्ता को बिजली नहीं मिल रही हैं, लेकिन उसे बिल देना पड़ रहा है, मीटर सेक्षन काम नहीं कर रहा, एक्सईएन और मीटर विभाग में कोई तालमेल ही नहीं, उपभोक्ता रीडिगं को ठीक कराने के लिए महीनों चक्कर लगाता है, फिर भी उसकी रीडिगं ठीक नहीं होती। मामला फिर आशा संगिनियों के परिणाम को लेकर उठा तो सीडीओ ने कहा कि उन्होंने चयन प्रक्रिया को निरस्त करने का आदेश दिया, इसे हरीश सिंह की बड़ी जीत मानी जा रही है। सबसे जोरदार हमला किसान नेता दीवान चंद्र चौधरी ने दमदारी से उठाया, असल में इस बैठक के हीरो दीवान चंद्र चौधरी ही रहे। इन्होने जिस तरह खाद की कालाबाजारी को लेकर एआर और जिला कृषि अधिकारी पर हमला बोला, उसे देखते हुए सीडीओ को बचाव में आना पड़ा। जोर देकर कहा कि 400 रुपया में किसानों को प्राइवेट की दुकानों से खरीदना पड़ता है, सहकारी समिति के सचिव पास मशीन लेकर ही भाग जाते हैं, और रात में चोरी छिपे चार सौ खाद बेचते हैं, बताया कि इसका वीडियो भी दिया था, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई, सवाल किया कि आखिर एआर और जिला कृषि अधिकारी क्या रहें है, जब उनसे पूछा गया कि कितने लोगों के खिलाफ कार्रवाई की गई, तो बगले झांकने लगें। अगर पांचों विधायकों ने एक साथ बिजली विभाग पर हमला बोला तो दीवान चंद्र चौधरी ने अकेले हमला बोला। सीडीओ को गलत बयानी भी करनी पड़ी। सवाल उठ रहा है, कि जब भ्रष्ट अधिकारियों पर विकास के मुखिया पर्दा डालेगें तो सुधार होगा कैसे? और किसानों को उचित दर पर खाद मिलेगा तो कैसे मिलेगा? कहा कि प्रषासन उन आधा दर्जन होलसेलर्स पर शिकंजा नहीं का पा रही है, जिनके चलते प्राइवेट को महंगी खाद बेचनी पड़ रही है, कहा कि जब प्राइवेट को होलसेलर्स महंगा खाद देंगा तो रिटेलर्स कहां से सस्ता में देखा। दीवान चंद्र चौधरी ने एक तरह से विभाग और प्रशासन को धोकर रख दिया। लोगों का कहना और मानना है, कि अगर जिले के सबसे बड़ी सदन में भ्रष्टाचार पर हमला हो सकता है, तो जिले में क्या हो रहा होंगा, इसे आसानी से समझा जा सकता है। इसका मतलब कोई अपना काम ईमानदारी से नहीं कर रहा है, जिस सीडीओ पर किसानों को सबसे अधिक भरोसा था, वही सीडीओ भ्रष्टाचारियों का बचाव कर रहे है।
बाक्स में
‘हरीश द्विवेदी’ वाली गलती ‘सीडीओ’ ने भी ‘की’
सीडीओ ने जैसे ही पत्रकारों से कहा कि आप बाहर चले जाइए तो एमएलसी प्रतिनिधि हरीश सिंह ने इसका विरोध करते हुए कहा कि सीडीओ साहब विवाद मत पैदा कीजिए, क्यों पत्रकार बाहर जाएगें, जब उन्हें कवरेज के लिए बुलाया जाता है, तो क्यों उनसे बाहर जाने को कहा जा रहा। सवाल उठ रहा है, कि प्रशासन आखिर क्यों पत्रकारों से इतना डरता है। डरते वही हैं, जो गलत करते है। इससे पहले इसी बैठक में पूर्व सांसद हरीश द्विवेदी ने पत्रकारों को बाहर जाने को कहा था, पत्रकार बाहर तो चले गए, लेकिन उसके बाद पूर्व सांसद को पत्रकारों से माफी मांगनी पड़ी। इससे पहले विकास भवन के सभागार के बैठक में तत्कालीन सीडीओ ने पत्रकारों से बैठक से बाहर जाने को कहा था, बाद में उन्हें भी अपनी गलती पर अफसोस हुआ। सवाल बार-बार उठ रहा है, कि जब बैठक में भ्रष्टाचार का मुद्वा उठ रहा है, उसे तो अधिकारी रोक नहीं पा रहे हैं, पत्रकारों को अवष्य रोक रहे हैं। कूबत है, तो भ्रष्टाचार पर लगाम लगाइए, पत्रकारों पर नहीं।
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