बस्ती। किसी विधायक को पहली बार लाइव पर आकर उन लोगों को चेतावनी देते हुए सुना और देखा गया, जो राजनैतिक भविष्य बर्बाद करने की साजिष रच रहे है। विधायक अजय सिंह ने स्पष्ट रुप से उन लोगों को चेतावनी देते हुए कहा कि जो लोग मेरा राजनैतिक कैरियर बर्बाद करने की साजिश रच रहे हैं, वे लोग कभी भी अपने मकसद में कामयाब नहीं होनेे पाएगें, क्यों कि उनके साथ प्रभुजी है, और जिसके साथ प्रभुजी रहते हैं, उनका कोई अहित कर ही नहीं कर सकता। नाम तो उन्होंने किसी का नहीं लिया, लेकिन ईशारा जिसकी ओर था, उसे सभी जानते है। सवाल उठ रहा है, कि क्या राजनीति इतनी गंदी हो गई, हैं, कि लोग अपने कैरियर की चिंता कम और दूसरे के कैरियर को बर्बाद करने की अधिक करने लगें है। वैसे विधायकजी को लाइव पर आने का शोक है। जितनी बार यह लाइव पर और मीडिया के सामने आ चुके हैं, उतनी बार शायद ही कोई नेता आया हो। अभी तक लोगों को किसी को किसी से जान का खतरा रहता था, लेकिन अब तो कैरियर का भी खतरा होने लगा। किसी समय बस्ती के नेताओं को आपसी भाईचारा का आईडिएल माना जाता था, और यह माना और कहा जाता था, कि हमारी राजनैतिक मनमुटाव हो सकते हैं, लेकिन इतना भी नहीं हो सकता, कि किसी को बर्बाद करने की सोचे। अजय सिंह जैसा विधायक अगर कुछ कहता है, तो उसके पीछे अवष्य कोई न कोई मतलब रहता है। इधर के दिनों में बस्ती के नेताओं में जिस तरह कमेंट करने का चलन शुरु हुआ, उससे वैमस्यता बढ़ी है। कहा भी जाता है, कि अगर पत्रकार और नेता हर बात पर कमेंट करने लगें तो वह अपना काम नहीं कर पाएगें, फिर वह उसी में उलझकर रह जाएगें, जो लोग कमेंट का जबाव कमेंट से देते हैं, इसका मतलब यह हुआ कि वह उन लोग उन लोगों का मकसद हल करना चाहते हैं, जो कमेंट करने वाला चाहता है। कमेंट करने के बजाए अगर समय का इंतजार करे तो वह अव्छा होता है, और तब निषाना कभी नहीं चूकता। एक पत्रकार को एक बड़े नेता ने सोशल मीडिया पर बहुत ही गंदा कमेंट किया था, पत्रकार चाहता तो उस कमेंट पर मुकदमा दर्ज करवा सकता था, लेकिन उसने न तो कमेंट का जबाव कमेंट से दिया और न मुकदमा ही दर्ज करवाया, पत्रकार समय का इंतजार करता रहा, पत्रकार को ढ़ाई साल बाद मौका मिला, तब नेताजी की ओर से मिठाई का डिब्बा भी आया और सारी का पत्र भी आया। कमेंट करने के बजाए लोगों को अपने काम पर ध्यान देना चाहिए। छोटा जिला है, और इस छोटे से जिले में ऐसा कोई नेता और पत्रकार नहीं जिसके वर्तमान और पूर्व को लोग न जानते हों। कोई पत्रकार और नेता लाख चाहें कि उसकी बात छिप जाए, नहीं छिपती। बुद्विजीवी लोग बार-बार उन नेताओं और पत्रकारों को यह एहसास कराते आ रहे हैं, कि अपने सीमा में रहकर बातचीत और व्यवहार करे, जो अपनी सीमा के बाहर जाते हैं, उन्हें एक न एक दिन उसका खामियाजा भुगतना ही पड़ता है। नेता और पत्रकार जिस दिन अपनी वाणी पर नियंत्रण कर लेगें, उनसे अच्छा न तो कोई नेता हो सकता औेर पत्रकार ही। पता नहीं क्यों लोगों को इतनी सी बात समझ में नहीं आती कि इंसान के चाहने से न तो कोई बर्बाद हो सकता है, और न कोई दुनिया छोड़ सकता है। आज कल हर नेता आर्थिक और राजनैतिक रुप से मजबूत होता जा रहा, इस लिए कोई सामने वाले को अंडरइस्टीमेट करने की भूल न करें, जिसने किया, समझो वह गच्चा खाया।
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