बस्ती। कोई बैनामाशुदा जमीन पर कब्जा नहीं कर पा रहा है, तो कोई सरकारी जमीनों पर झंडा गाड़ रहा है। बैनामाशुदा जमीन के लिए लड़ने वाले तो बहुत मिल जा रहें है। लेकिन भूमाफियों के खिलाफ लड़ने वाला एक भी नेता सामने नहीं आतें। भूमाफियों का बस चलता, तो जिले भर की जमीनों को हड़प लें। जब यह भूमाफिया सरकारी तालाबों और सरकारी जमीनों पर एसडीएम, तहसीलदार, नायब तहसीलदार, कानूनगो और लेखपालों की मदद से हथिया सकते हैं, तो यह लोग ‘सहारा’ के करोड़ों की जमीन को कैसे छोड़ देगें? सहारा की जमीनों पर भूमाफियों की पहले से ही रही। तहसील वाले ही इस तरह की जमीनों की जानकारी भूमाफियों को देते हैं, और इसके एवज में मोटी रकम लेते है। ऐसी जमीनों वरना किसी भूमाफिया को कैसे पता होता है, कि सहारा की जमीन कहां हैं, और जो विदेश में रहते हैं, और जिनका कोई वारिश नहीं है, की जानकारी कैसे हो जाती है? इन्हें तो कोई सपना आता नहीं। कहने का मतलब तहसील के साहबों और लेखपालों ने भूमाफियों को जन्म देने का काम बखूबी किया, सिर्फ जन्म ही नहीं दिया, बल्कि उन्हें पाला-पोसा भी। जिले वालों को क्या सहारा वालों तक को मालूम नहीं होगा, कि मूड़घाट में उनके नाम का दो एकड़ कीमती जमीन भी है। यह मामला तब सामने आया, जब कोई कथित फर्जी पावर आफ एटार्नी लेकर अपने वकील साहब के साथ न्यायिक तसीलदार विनय प्रभाकर के पास पहुंचते हैं, और उन्हें जमीनों का खारिज दाखिल हो गए, जमीनों के खारिज दाखिल को निरस्त का एक अच्छाखासा आफर देते है। चूंकि जमीन करोड़ों की और शहर से सटे हैं, इस लिए सौदा भी जमीन के हिसाब से हुआ। सौदा हो जाने के बाद तहसीलदार के आंख बंदकरके छह साल पहले हुए खारिज दाखिल को निरस्त कर दिया, तहसीलदार ने क्रेताओं की एक न सुनी बहस भी नहीं किया, दाखिल किए गए आपत्ति को कूड़ेदान में डाल दिया। चुपके से निरस्त कर दिया। इसे कहते हैं, गांधी के नोटों का कमाल। तहसीलदार ने एक मामूली पावर आफ एटार्नी जिसका पंजीयन भी नहीं, के आधार पर खारिज दाखिल को निरस्त कर दिया। निरस्त करने से पहले पावर आफ एटार्नी लेकर आने वाले सुधीर कुमार के पते तक का न तो सत्यापन कराया, और न पावर आफ एटार्नी के सही और गलत होने की जांच ही किया। बाद में जब पीड़ितों ने पावर आफ एटार्नी पर दिए गए पते की छानबीन की तो पता चला कि इस नाम का कोई भी व्यक्ति इस पते पर नहीं रहता। बकौल, पीड़ित व्यक्ति भी फर्जी और पावर आफ एटार्नी भी फर्जी, कहते हैं, कि आज तक हम लोगों ने कभी भी किसी भी तारीख पर सुधीर कुमार नामक व्यक्ति को नहीं देखा, इन्हें सिर्फ तहसीलदार ने देखा, वह भी इस लिए देखा क्यों कि इनसे डील जो करनी थी। पावर आफ एटार्नी को इस लिए पीड़ित फर्जी बता रहे हैं, कि क्यों कि जिसके नाम पावर आफ एटार्नी हैं, उसका नाम खतौनी में ही दर्ज नहीं हैं, जबकि पीड़ितों को जमीन बेचने वाले सहारा के राजेश प्रताप सिंह का नाम खतौनी में दर्ज हैं, और इन्होंने ने ही 21 लोगों के नाम जमीन बैनामा किया, और जमीन की कीमत भी सविता रियल्टी एंड डवलपमेंट प्राइवेट लिमिटेड 340/42 सैमुअल स्टीट मुंबई के राजेश प्रताप सिंह को खाते और चेक के जरिए दिया गया। अब सवाल उठ रहा है, कि सहारा के जिस राजेश प्रताप सिंह नामक व्यक्ति ने अगर जमीन बेचा तो कौन सा गलत किया, उससे बड़ा सवाल उठ रहा है, कि जमीन खरीदने और जमीन का खारिज दाखिल कराने वाले लोगों ने क्या गलत किया? गलत तो तहसीलदार साहब ने मोटा लिफॉफा के लालच में बिना समझे बुझे और पीड़ितों का पक्ष सुने खारिज दाखिल को निरस्त करके किया। जिस आधार पर निरस्त किया वह प्रथम दृष्टया वह आधार ही आधारहीन है। निरस्त नियम विरुद्व और दबाव एवं लालच में आकर किया गया। बिडंबना देखिए कि खारिज दाखिल को निरस्त भी करते हैं, और सुनवाई के लिए तारीख भी देते है। सहारा के नाम मूड़घाट में कुल लगभग दो एकड़ जमीन है। 21 लोगों को बेचने के बाद भी अभी काफी जमीन बची हुई, इस बचे हुए जमीन को लेकर कथित सुधीर कुमार नामक व्यक्ति कोई प्रयास नहीं कर रहे है। तत्कालीन तहसीलदार पवन जायसवाल बहस सुनकर खारिज दाखिल करते हैं, और वर्तमान तहसीलदार विनय प्रभाकर पैसा लेकर दाखिल खारिज को निरस्त करते है। यह जमीन 2003 में सहारा ने जरिए सविता रियल्टी एंड डवलपमेंट प्राइवेट लिमिटेड 340/42 सैमुअल स्टीट मुंबई के सविता रियल्टी एंड डवलपमेंट प्राइवेट लिमिटेड 340/42 सैमुअल स्टीट मुंबई के जरिए निवेश के लिए खरीदा।

सबसे अधिक हैरान करने वाली बात यह है, कि गाटा संख्या 251स में कुल पांच विक्रेताओं के खारिज दाखिल को निरस्त करने के लिए कथित सुधीर कुमार की ओर से आवेदन किया गया, जिसमें सुमन पांडेय, दिनेश चंद्र पांडेय, संगीता पांडेय, अनीता देवी, चंद्रशीला पत्नी फूलचंद्र एवं सावित्री देवी पत्नी लालचंद्र का नाम शामिल है। अब जरा तहसीलदार की मनमानी तो देखिए इन्होंने केवल चंद्रशीला पत्नी फूलचंद्र एवं सावित्री देवी पत्नी लालचंद्र सभी बनाम सविता रियल्टी एंड डवलपमेंट मुंबई के खारिज दाखिल को निरस्त किया और अवशेश के पत्रावलियों का बंडल बनाकर आलमारी में डाल दिया। सवाल उठ रहा है, कि जब पांच लोगों के खारिज दाखिल को निरस्त करने के लिए आवेदन किया गया तो फिर क्यों दो ही निरस्त किया? इसका सीधा सा मतलब यह है, कि जिसने मोटा लिफाफा दिया, उसका निरस्त नहीं किया और जिसने नहीं दिया उसका निरस्त कर दिया, ऐसे में यह लोग कहां जाए जो लाखों रुपया देकर जमीन खरीदे और मकान का निर्माण करवाने के लिए बाउंडीवाल करवाया, अब यह लोग नौकरी छोड़कर तहसील का चक्कर लगा रहे है। बतातें हैं, सहारा की करोड़ों की जमीन को हथियाने की जो लोग साजिष कर रहे हैं, उनमें आधा दर्जन बस्ती और गोरखपुर के बदनाम और नामचीन व्यक्तियों का नाम षामिल है। इस पूरे मामले में सबसे अधिक संदिग्ध भूमिका न्यायिक तहसीलदार विनय प्रभाकर की सामने आ रही है। वैसे इनकी भी कोई गलती नहीं, जब पूरा सदर तहसील ही भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, तो अगर प्रभाकरजी ने भ्रष्टाचार की बहती गंगा में डुबकी लगा दिया तो कौन सा गुनाह कर दिया, यह उस तहसील का सच हैं, जहां पर एंटी करप्षन की टीम ने कानूनगो अशर्फीलाल को दस हजार घूस लेते पकड़ा, और यही वही तहसील हैं, जिसके लेखपाल और कानूनगो सहित तहसील कर्मियों ने घूसखोर कानूनगो को एंटी करप्षन टीम के चंगुल से छुड़ाने के लिए टीम पर ही जान लेवा हमला बोल दिया था।