बस्ती। जिले में जीजा और साले का रिश्ता कुछ खास ही होता जा रहा है। इतिहास गवाह है, कि दोनों एक दूसरे के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते है। हालही में जीजा और साले का एक रिश्ता खूब चर्चा में रहा हैं, इस चर्चा के कारण ही लोगों को पता चला कि जीजा कौन और साला कोैन? बहरहाल, आज कल एक और जीजा-साले का रिश्ता चर्चा में है। साले के लिए जीजा ने सारे नियम कानून को तोड़ते हुए उन्हें वरिष्ठ उपाध्यक्ष बना दिया, साले के लिए राष्टीय अध्यक्ष से भी कोई सलाह मशवरा नहीं किया, अब यह नियुक्ति जीजा के गले की हडडी बनती जा रही है, क्यों कि इस पर सवाल खड़े होने लगे और राष्टीय अध्यक्ष से इस मामले में स्पष्ट करने को कहा गया, कि आखिर महामंत्री ने किस अधिकार के तहत साले को वरिष्ठ उपाध्यक्ष बना दिया, यह मामला गरमाता ही जा रहा हैं, इसी लिए कहा जा रहा है, कि ब्राहृमण महासभा की बागडोर अब जीजा और साले के हाथों में है। वैसे भी पहले से ही महामंत्री के कारण इसके राष्टीय अध्यक्ष को अनेकों चुभते सवालों का सामना करना पड़ रहा है। एक तरह से इन्हें अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ रहा है। जो आरोप इन पर 20 सालों में नहीं लगा, वह आरोप अब लग रहे है। अब तो इन्हीं के लोग इन्हें मौनी बाबा तक कहने लगे। एक व्यक्ति के चलते इनका मान और प्रतिष्ठा दांव पर लगा हुआ है। मीडिया फिर महामंत्री को सलाह दे रही है, कि पत्रकारों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने के बजाए समाज को चंदें का हिसाब दीजिए, क्यों कि सारे आरोप और प्रत्यारोप सिर्फ और सिर्फ व्यय का हिसाब न देने के कारण आप और राष्टीय अध्यक्ष पर लग रहे हैं। महामंत्रीजी कम से कम राष्टीय अध्यक्ष के इज्जत का तो ख्याल रखिए। जिस तरह बैठक के बाद आपको बचाने वालों ने आय-व्यय का ब्यौरा प्रत्येक बैठकों मंे देने की खबर प्रकाषित करवाया, उससे यह साबित हो गया कि कुछ लोग ब्राहृमण महासभा को बचाने का नहीं बल्कि महांमत्री को बचाने की साजिश रच रहे है। पदाधिकारी ही सवाल उठा रहे हैं, कि जब बैठक में आय-व्यय का हिसाब किताब दिया ही नहीं तो कैसे यह खबर छपवा दिया कि हर माह आय-व्यय का व्यौरा महामंत्री के द्वारा दिया जाता रहा है। खबर प्रकाशित करवाने वालों की भी छानबीन हो रही है, और पूछा जा रहा है, कि यह खबर किसके कहने पर प्रकाशित करवाई गई, किसने विज्ञप्ति जारी किया?
क्यों संगठनों को बचाने के बजाए उन लोगों को बचाने का प्रयास किया जा रहा है, जिनपर चंदा चोरी जैसे अन्य गंभीर आरोप लग रहे है। कहना गलत नहीं होगा कि राष्टीय अध्यक्ष के 20 सालों की मेहनत को कुछ लालची लोग मिटटी में मिलाना चाहते हैं, इसी लिए राष्टीय अध्यक्ष से बार-बार कहा जा रहा है, कि अगर आज आप ने कोई निर्णय नहीं लिया, और संगठन को बदनाम करने वालों को बाहर नहीं किया तो न तो ब्राहृमण समाज और न इतिहास कभी माफ करेगा। अच्छे और बुरे को पहचानिए और उन लोगों की आवाज सुनिए, जिन्होंने संगठन के लिए बहुत कुछ किया, अगर आज उनकी बातों को गंभीरता से नहीं सुनेंगेें तो पछताने के आलावा और कोई रास्ता नहीं बचेगा, फिर आप भी बदनामी से नहीं बच पाएगें। अब तो कुछ लोगों की नजर 22 बिस्वा जमीन पर टिकी हुई है। कहा भी जा रहा है, कि अगर महांमत्री में जरा सी भी नैतिकता रह गई हो तो खुद इस्तीफा दें दे। क्यों कि यह संगठन किसी एक व्यक्ति या एक परिवार या रिष्तेदारी का नहीं हैं, बल्कि यह पूरे ब्राहृमण समाज का संगठन है। प्रष्न, महामंत्री या किसी ऐसे व्यक्ति नहीं बल्कि पूरे राष्टीय ब्राहमण महासभा की प्रतिष्ठा और मान सम्मान का है। संगठन की गरिमा, पारदर्षिता, विष्वनीयता एवं समाज के विष्वास को बनाए रखने का है। कहा भी जाता है, कि जब पत्रकार इस संगठन को लेकर इतना चिंतित हो सकते हैं, और इसके लिए मुकदमा तक झेलने को तैयार है, तो आप लोग क्यों नहीं? अब तो खुले आम इसकी समिति से जांच कराने की मांग उठने लगी है, और यह मांग और कोई नहीं बल्कि इसके राष्टीय उपाध्यक्ष ई. राधेष्याम पांडेय ने अध्यक्षजी से की है। कहा कि समाज ने हम पर विष्वास करके सहयोग दिया, इस लिए समाज के प्रति हमारी भी जबावदेही बनती है। हम ऐसा कोई भी अवसर नहीं आने देना चाहते, जिससे संगठन पर कोई अगुंली उठा सके। कहा कि जांच 2002 से लेकर 2026 तक की समस्त आय एवं व्यय की होनी चाहिए, सदस्यता शुल्क, दान की धनराशि, मूर्तिकारों से मिलने वाली धनराशि, किराया और अन्य सभी की होनी चाहिए। अभिलेख, रसीदों एवं बिल बाउचर की जांच समिति से करानी चाहिए, और समिति को इसके लिए एक माह का समय देना चाहिए। कहा गया कि महामंत्री के द्वारा किए गए पदाधिकारियों के मनोनयन एवं नियुक्ति की भी जांच होनी चाहिए। इस बात की भी जांच होनी चाहिए कि क्यों नियुक्ति में परिवारवाद एवं रिष्तेदारी को प्राथमिकता दी गई, पदाधिकारियों का चयन योग्यता, सक्रियता, समर्पण एवं संगठनहित के अधार पर करना चाहिए, न कि रिष्तेदारी के आधार पर। कहा कि वर्तमान में ब्राहृमण समाज, संगठन के पदाधिकारियों एवं कार्यकर्त्ताओं के बीच यह सवाल निरंतर उठ रहे हैं, कि अगर 2002 से 2026 तक के आय और व्यय का हिसाब-किताब उपलब्ध है, तो फिर उसे क्यों नहीं सार्वजनिक किया जा रहा है? क्यों झूठ बोला जा रहा है, कि महांमत्री हर माह आय और व्यय का ब्यौरा बैठक में प्रस्तुत कर रहे है? क्यों झूठे बयानों से समाज और संगठन के पदाधिकारियों को गुमराह कर रहे है? समाज ने इस लिए करोड़ से अधिक चंदा दिया कि उसका उपयोग संगठन एवं समाजहित में हो। अगर समाज ने हम पर विष्वास करके चंदा दिया तो उस विष्वास की रक्षा करना संगठन के प्रत्येक लोगों का दायित्व है। अगर हम पर से समाज का विष्वास उठ गया तो संगठन रह कर भी क्या होगा? कहा जा रहा है, कि जब सारे फैसले जीजा और साले को ही लेना है, तो फिर राष्टीय अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारियों का क्या काम? सवाल तो राष्टीय संगठन मंत्री डा. वीरेंद्र त्रिपाठी के उस इस्तीफे पर भी उठ रहे हैं, जिस पर विचार करने के लिए आपात बैठक बुलाई गई? सवाल उठ रहा है, कि जब डाक्टर साहब के लिए आपात बैठक बुलाई जा सकती है, तो क्यों नहीं प्रदेष अध्यक्ष प्रशांत पांडेय के इस्तीफा देने पर बुलाई गई? आखिर इस संगठन में दोहरी नीति क्यों? खासबात यह है, कि दोनों का इस्तीफा मंजूर हुआ कि नहीं इसकी भी लिखित जानकारी नहीं दी गई, सवाल उठ रहा है, कि जब प्रशांत पांडेय का इस्तीफा स्वतः स्वीकार मान लिया गया तो डा, बीरेंद्र त्रिपाठी के इस्तीफे को स्वतः क्यों नहीं स्वीकार माना गया। जिस संगठन में इस तरह की उहापोह की स्थित हो उस संगठन पर तो सवाल उठेंगें ही?
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