बस्ती। जिस तरह दलों के कार्यकर्त्ताओं की उपेक्षा की जा रही है, उससे दलों को खतरा हो गया हैं, इसी लिए कहा जा रहा है, कि अगर दल बचाना है, तो कार्यकर्त्ताओं को गले लगाने होगा। अब कार्यकर्त्ता न तो किसी नेता का दरबारी रह गया और न पार्टी का वफादार ही रह गया। इसके लिए कार्यकर्त्ताओं को नहीं बल्कि उन दलों के नेताओं को जिम्मेदार माना जा रहा है, जो कार्यकर्त्ताओं को ही समाप्त करती जा रही है। कागजों में भले ही हजारों कार्यकर्त्ता हैं, लेकिन मौके पर सौ दो सौ भी नहीं दिखाई देते है। इसी लिए आज कल नेताओं की रैलियों और स्वागत में कार्यकर्त्ता कम और किराए की महिलाएं और मजदूर किस्म के लोग अधिक दिखते है। नेता भीड़ जुटाने के लिए लाखों तो खर्च कर देते हैं, लेकिन कार्यकर्त्ताओं की छोटीमोटी जरुरतों को पूरा नहीं करते। इसी लिए कार्यकर्त्ता दल और नेता से अलग होते जा रहे हैं। अब सवाल ये नहीं रहा कि कौन सा दल है? कौन सी सत्ता है? कौन सी विचारधारा है? सवाल यह है कि कौन हितैषी है और कौन दुश्मन? दुश्मन बाहर का है, या अंदर की कुर्सी पर ही बैठा है? कहा जा रहा है, कि जब तक कार्यकर्ता की निष्ठा को सीढ़ी बनाया जाएगा और शीर्ष की कुर्सी के लिए उसी कार्यकर्ता की पीठ में छुरा भोंका जाएगा, तब तक दल नहीं बचेगा, केवल दरबार बचेगा। दल बचाना है, तो कार्यकर्त्ताओं को गले लगाना होगा। ’यह लड़ाई विचारधारा की नहीं, कुर्सी के वर्चस्व की हो गई है। नीचे वाला कार्यकर्ता सच बोल दे तो विपक्ष को मिटा दे, ऊपर वाला ही अपनों को निपटाने में लगा है’ राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है। नीचले स्तर का कार्यकर्ता जब मुंह खोलता है, तो वह इतनी साफगोई से सच बोलता है कि सामने वाले विपक्षी दल की पूरी दुकान ही बंद हो जाए। उसके पास खोने को कुछ नहीं, पाने को विचारधारा है। वह जमीन पर लाठियां खाता है, पसीना बहाता है, संगठन को खड़ा करता है। दूसरी ओर शीर्ष पर बैठे कुछ लोग, जो खुद शीर्ष पर पहुंच गए हैं, वे अब साथ में बैठे दूसरे शीर्ष को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। मुख्य गद्दी के अगल-बगल की गद्दी पर कौन बैठेगा, यही उनका सबसे बड़ा चिंतन है। मतलब-साथ में ही विरोधी सक्रिय है। के साथ की अपोजिट लॉबी। सत्ता से संगठन तक यही खेल चल रहा है।