बस्ती। अब तो यह सवाल उठने लगा कि क्या कभी आडिट हो भी पाएगी और क्या कभी आय और व्यय का हिसाब किताब मिल भी पाएगा, कि नहीं? कम कम से बार तारीख बदलने से तो यही प्रतीत हो रहा है, कि कुछ भी नहीं होगा। जिसको जितना चिल्लाना और आवाज उठाना था, उठा लिया, जितना सोशल मीडिया पर लिखना था, लिख दिया, जितना एक दूसरे पर भड़ास निकालना था, निकाल लिया, जितना महामंत्री और कोशाध्यक्ष को चोर और बेईमान कहना और लिखना था, लिख दिया, जितना अध्यक्ष पर आरोप लगाना था, लगा दिया, अब न कुछ कहने को बचा है, और न सुनने को, लोगों के धैर्य का बंाध अब टूटने वाला है। अगर यह बांध टूट गया तो कुछ भी नहीं बचेगा, वैसे ही सारी मर्यादाएं लांघी जा चुकी है। ऐसे-ऐसे शब्दों का एक दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल किया गया, जिसे देख लगता ही नहीं यह लोग सबसे अधिक सभ्य कहे जाने समाज के लोग भी है। जो पदाधिकारी अपने आप को सबसे अधिक ईमानदार बनते थे, उन्हें भी सबके सामने नंगा होना पड़ा। इस वाक युद्व में सबसे अधिक नुकसान ब्राहृमण महासभा और ब्राहृमण समाज का ही हुआ। जो लोग हिसाब-किताब न मिलने पर धरने पर बेैठने की बातें कह रहे थे, उनका जोष अब नरम हो गया, जो लोग ईट से ईट बजाने की बाते कह रहे थे, वे लोग भी कमजोर पड़ते जा रहे हैं, लोगों के सुर बदलते जा रहे हैं। अगर कोई नहीं बदला तो वह महामंत्री और कोशाध्यक्ष है। इन दोनों पर कोई फर्क नहीं पड़ा, यही दोनों कह रहे थे, कि एक-एक पाई का हिसाब रखा हैं, जब चाहूं तब दे सकता हूं, सवाल उठ रहा है, कि अगर पाई-पाई का हिसाब तैयार हैं, तो क्यों नहीं अभी तक सामने लाया गया। फिर कहा जा रहा है, जो व्यक्ति 22-24 सालों में हिसाब नहीं दे सका, वह अब क्या देगा, अब तो हिसाब देना संभव ही नही। जिसे अपने किए पर षर्मिदा होकर माफी मांगना चाहिए, वह सीना तानकर चल रहा है, और जिसे नहीं होना चाहिए, वे शर्मिदां हो रहे है। क्या यही ब्राहृमण महासभा के लोगों का सच है।

तभी तो ओंकार लिखते हैं, कि अगर पारदर्षिता और ईमानदारी से ब्राहृमण महासभा का उत्थन ही करना होता तो इन्हें वास्तविकता के साथ बिल, बाउचर, रसीद और बैंक खातों को अच्छी तरह से संतुलित करते। जब भ्रष्टाचार ही करना तो सबकुछ गोलमोल तरीके से भ्रमित करके करते, कहते रहे हैं, ए टू जेड सब सही हैं, एक मिनट में उपस्थित कर दूंगा। आय-व्यय का ब्यौरा जब जनमानस ने प्रखर होकर मांगा तो शून्य रहा, और शिखर ढह गया। अब क्या मूंछ बची है, पूछ तो कट गई। स्पष्ट कहते हैं, कि देखिएगा एक दिन आडिट टीम भी यही कहेगी, कि आई एम सारी सबकुछ गड़बड़ है। कहते हैं, कि चंदें की हर बूंद का हिसाब, अब सवाल बनकर खड़ा हैं, 24 सालों का मौन आज, लेखे जोखे से लड़ रहा है। धन संस्था का हो तो उसका पारदर्षी पहरा भी हो, विष्वास वहीं जीवित रहता है, जहां हिसाब ठहरा हो। अंबिका पांडेय लिखते हैं, कि चंदा लेते रहे, हिसाब न देते रहे, धन लेते रहे, जबाव न देते रहे, अब पाई-पाई का लेखा-जोखा सामने आएगा, जो सच छिपाते रहे, वही सच बताएगें। डा. आशीश नरायन पांडेय लिखते हैं, कि ब्राहृमण महासभा को लूटने वाले इस गलतफहमी और खुशफहमी में थे, कि हम लोग चंदे के नाम पर रुपया बटारेगें और हिसाब कभी कोई मांगेगा ही नहीं। अगर किसी ने मांग भी लिया तो उसे शून्य से शिखर तक पहुंचाने की कहानी सुनाकर, बहला फुसला देते थे।