बस्ती। बस्ती में अगर चीफ फार्मासिस्ट अजय मिश्र राज कर रहे हैं, तो सीतापुर में चीफ फार्मासिस्ट जगजीत सिंह लूट रहे है। दोनों बस्ती के निवासी हैं, और दोनों एक ही जिले में यारे नियम कानून को तोड़कर सालों से एक ही जिले में जमे हुए, कोई जीजा राज्यपाल के दम पर कोई नेताओं के बल पर जो चाहते हैं, कर ले रहे हैं, इनके रास्ते में सीएमओ तक नहीं आते, क्यों कि अगर आए तो उन्हें जिला छोड़ना पड़ेगा, बस्ती वाले अधिक सीतापुर वाले फार्मासिस्ट ने तहलका मचा रखा। प्रदेश का यह पहला ऐसा फार्मासिस्ट होगा, जिसने पूरे स्टोर को आग के हवाले कर दिया था, ताकि जांच की कार्रवाई से बचा जा सका, हुआ भी वही, जब सारे अभिलेख जलकर राख हो गए तो जांच कैसी और कार्रवाई कैसी? इस तरह के लोग नौकरी नहीं बल्कि गुंडई करते हैं, और जो चाहते हैं, वही होता, किस ठेकेदार को आपूर्ति, विधुत और सिविल का ठेका मिलना हैं, यह न तो सीएमओ और न कमेटी तय करती है, यह दोनों तय करते है। तभी तो एक ही दिन में टेंडर का प्रकाशन होता है, एक ही दिन में टेंडर खुलता और उसी दिन टेंडर भी फाइनल होता हैं, कहीं आप लोगों ऐसी दादागिरी देखी है। अब आप लोग इस बात से अंदाजा लगा सकते हैं, कि सिद्वार्थनगर में तहलका मचाने वाले डीएम गणपतिजी का भी चीफ फार्मासिस्ट का कोई खौफ नहीं। बस्ती वाले चीफ फार्मासिस्ट से हजार गुना ताकतवर और पैसा सीतापुर वाले चीफ फार्मासिस्ट कमा रहे हैं, दोनों चीफ फार्मासिस्ट की षिकायतें और जांच होती रहती है, लेकिन कार्रवाई नहीं होती, दोनों को मैनेज करने में महारथ हासिल है। इसी लिए यह दोनों सीएमओ और प्रशासनिक अधिकारियों के दुलारे और प्यारे होते है। जाहिर सी बात हैं, कि अगर कोई चीफ फर्मासिस्ट अधिकारियों का इतना दुलारा और प्यारा होता है, तो वह आग मूतेगा ही।
आप लोग बस्ती वाले चीफ फार्मास्स्टि के बहुत कारनामें सुने और देखे होगें, लेकिन आज हम आपको गनेषपुर निवासी और सीतापुर के चीफ फार्मासिस्ट जगजीत सिंह के बारे में बताते, इनके टाइटिल पर मत जाइए, यहां के ठेकेदारों का कहना है, कि इन्होंने पूरे सीएमओ कार्यालय को कैप्चर कर लिया हैं, ठेका उसी को मिलता है, जिसे यह चाहते थे, ठेका कमेटी और सीएमओ नहीं बल्कि चीफ साहब तय करते है। बस इन्हें इनकी कीमत मिलनी चाहिए। अगर इन्होंने ठान लिया कि ठेका सोहन सिंह को देना है, तो साहन सिंह को ही मिलेगा, और सबसे कम दर पर मिलेगा। ठेका मिलने के बाद सामानों की आपूर्ति हुई कि नहीं इसकी चिंता सोहन सिंह को नहीं करनी पड़ती। अब इनकी यारी भी देख लीजिए। 21 मई 26 को सेनेटाइजर खरीद के लिए 9.50 लाख का टेंडर निकला, उसी दिन टेंडर खुल गया और उसी दिन फाइनल भी हो गया, यानि 24 घंटा भी इनके चहेते ठेकेदार को ठेका मिलने में समय नहीं लगा होगा। फिर इसी 21 मई 26 को 9.70 लाख के सेनेटाइजर खरीद का टेंडर प्रकाशन हुआ, उसी दिन टेंडर खुला और उसी दिन फाइनल भी हो गया। फिर 21 अगस्त 26 को मैटरेस खरीद के लिए टेंडर का प्रकाशन हुआ, उसी दिन खुला और उसी दिन फाइनल हो गया। 10 मिनट में सबकुछ फाइनल हो जाता, प्रचेज कमेटी की आवष्यकता और न सीएमओ का इंतजार। कमीशन दीजिए ठेका ले जाइए, रही बात सामानों की आपूर्ति का तो इसके लिए चीफ फार्मासिस्ट/सीएमएसडी प्रभारी हैं, न। हालांकि इसकी शिकायत बदायूं के राहुल यादव और सीतापुर के समीर खान ने प्रमुख सचिव सहित डीएम से की है। हालांकि इस तरह की षिकायतें न जाने कितनी हुई, लेकिन शिकायतों का क्या हुआ, इसका पता शिकायतकर्त्ताओं को नहीं चलता।
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