बस्ती। बार-बार सवाल उठ रहा है, कि जिस बीडीए के अध्यक्ष कमिष्नर हो, उपाध्यक्ष डीएम हो और सचिव एडीएम हों, उसमें कैसे भ्रष्टाचार घुस सकता है। अगर यह तीनों टाप क्लास के अधिकारी बीडीए को भ्रष्टाचारमुक्त नही बना सकते और भ्रष्टाचारियों से आजादी नहीं दिला सकते तो फिर कौन दिलाएगा? क्या बीडीए के तीनों भाजपा के सदस्य दिलाएगें, जिनपर खुद भ्रष्टाचारियों का साथ देने और भ्रष्टाचार के मामले में आंख बंद कर लेने का आरोप लग रहा हो। बीडीए को नेता नहीं बचा सकते, सदस्य नहीं बचा सकते तो बचाएगा कौन? तो क्या एक्सईएन, एई, जेई, मेट और बाबू बचाएगें? जिन्होंने बीडीए को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ा। जिन बीडीए के तीनों सदस्यों पर सबसे अधिक भरोसा था, वही सबसे अधिक कमजोर कड़ी निकले। अगर यह लोग चाहे होते तो किसी की हिम्मत नहीं होती कि एक रुपये की हेराफेरी कर पाते। एक तरह से बीडीए के भ्रष्टाचार में इन तीनों की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुप से सहमति रही होगी। वरना, बीडीए, यूंही बर्बाद नहीं होता। बीडीओ को जब मेट और आउट सोर्सिगं वाले बाबू चलाएगें, तो भ्रष्टाचार बढ़ेगा ही। अधिकारी अगर, एक्सइएन के रहते हैं, आउटसोर्सिगं वाले बाबू को हमराज बनाएगें तो बीडीए बर्बाद होगा ही। आज बीडीए की हालत यह है, कि एक्सईएन को साइड में कर दिया गया, और बाबू बृजेंद्र चौधरी से सारा काम लिया जा रहा है। बाबू क्यों अधिकारियों के इतने प्रिय होते हैं, इसे बताने और समझाने की कोई आवष्यकता नही। आज की तारीख में बाबू एक्सईएन और एक्सईएन बाबू बने हुए है। वैसे भी इस कार्यालय में सबसे अधिक मजबूत कड़ी बाबू और मेट ही होती है। हालत यह है, कि पत्रकार की खबर पर जहां कार्रवाई होना चाहिए, वहां मेट 70 हजार लकरे आया। बीडीए में मानचित्र स्वीकृति करने का सौदा करने वाले एक आर्किटेक्ट की खूब चर्चा है। यह महाशय सुबह होते ही बीडीए कार्यालय आ जाते हैं, और जो एक बिस्वा में मकान बनाने के लिए मानचित्र स्वीकृति कराना चाहता हैं, उससे 50 हजार में सौदा करते हैं, लूटपाट की गैंग में आर्किटेक्ट भी शामिल है। जबकि बीडीए में आर्किटेक्ट का बैठना मना है। ठेका किसे मिलना है, इसकी रुप रेखा एकाउटेंड के कमरे में बनती है। इस मीटिगं में पीडब्लूडी के जेई रोहित पटेल, बाबू बृजेंद्र चौधरी और ठेकेदारों की टीम रहती है। इस मीटिगं में एक्सईएन को शामिल नहीं किया जाता। इन्हें पूरी तरह किनारे कर दिया गया। सचिव साहब का फरमान है, कि अधिक से अधिक शुल्क जमा हो, लेकिन कार्रवाई न हो। अब सचिव साहब को कौन समझाने जाए, कि बिना कार्रवाई के कैसे कोई शुल्क देगा। बीडीए को पिछले लगभग आठ साल से लूटा जा रहा है, कभी निर्माण के नाम पर तो कभी मानचित्र स्वीकृति के नाम पर तो कभी अवैध निर्माण के नाम पर तो कभी सील करने और सील खोलने के नाम पर तो कभी शपथ-पत्र के नाम पर लूट हो रही है। बीडीए के एक लोगों का कहना है, कि तब तक अवैध कमाई का पैसा उपर जाना बंद नहीं होगा, तब तक बीडीए कभी भ्रष्टाचारमुक्त हो ही नहीं सकता। दावे के साथ कहते हैं, अगर, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सचिव चाह जाए तो क्या कोई गलत कर पाएगा। कहते हैं, सील भी अधिकारियों के कहने पर होता है, और सील तोड़ा भी अधिकारियों के कहने पर होता, लेकिन कोई लिखित में नहीं देता, सब जबानी आदेष पर होता है।