बस्ती। चौकिंए मत। आज हम आप लोगों को उस फारमूले के बारे में बताने जा रहा है, जिसे अपनाकर स्वास्थ्य विभाग और शासन के न जाने कितने भ्रष्ट एसआईसी, सीएमओ, सीएमएस, ठेकेदार और जेम पोर्ट के लिपिक/फार्मासिस्ट रातों रात करोड़पति बन गए। इस फारमूले का नाम हैं, ‘एक’ करोड़ लाइए, ‘दस’ करोड़ ले लाइए, और ‘छह’ करोड़ ‘कमाइए’। यानि अगर किसी को दस करोड़ का बजट लेना है, तो उसे सबसे पहले शासन में दस फीसद कमीशन के रुप में एक करोड़ जमा करना होगा। जाहिर सी बात हैं, इतनी बड़ी रकम तो एसआईसी, सीएमओ, सीएमएस, या फिर जेम पोर्ट के लिपिक/फार्मासिस्ट तो देगा नहीं, बचा कौन ठेकेदार। यही वह ठेकेदार होता है, जो एक करोड़ लगाकर छह करोड़ का बंदरबांट करता है। दस करोड़ के काम में से ठेकेदार को एसआईसी, सीएमओ, सीएमएस, ठेकेदार और जेम पोर्ट के लिपिक/फार्मासिस्ट को मिलाकर 20 फीसद कमीषन के रुप में दो करोड़ देना होता है। देखा जाए असली बजट सात करोड़ बचा, इनमें से तीन करोड़ से अधिक ठेकेदार मार लेता है। यह समझने वाली बात हैं, कि जब कमीशन और ठेकेदार लाभांश के रुप में दस में से छह करोड़ चला गया तो दस करोड़ का काम कैसे चार करोड़ में होगा?

बचे चार करोड़ में अस्पतालों का उच्चीकरण भी होगा, और उपकरणों की आपूर्ति भी होगी, उच्चीकरण और सामानों की गुणवत्ता कैसी होगी? इसे बताने की आवष्यकता नहीं, क्यों कि अगर किसी को भी गुणवत्ता से मतलब होता तो दस करोड़ में से छह करोड़ कमीशन में न चला जाता। कमीशन मिलने के बाद षासन का कोई भी अधिकारी बजट जारी करने से पहले यह नहीं देखता कि जिन अस्पतालों के उच्चीकरण के नाम पर दो-तीन साल पहले करोड़ों का बजट दिया गया, उस अस्पताल को क्यों फिर बजट दिया जा रहा है? अगर बजट जारी ही करना है, तो पांच साल बाद करते, क्यों दो-तीन साल के भीतर बजट दे रहें हैं? इसका सीधा सा मतलब कमीशन दीजिए और बजट ले जाइए। अस्पतालों के उच्चीकरण के नाम पर पुनः पांच साल बाद बजट जारी करने का प्राविधान हैं, लेकिन यहां पर तो दो-तीन साल में बजट जारी कर दिया। बार-बार कहा जा रहा है, कि अगर किसी अस्पताल के उच्चीकरण और उपकरणों की खरीद फरोख्त के नाम पर दो-तीन साल पहले बजट जारी किया गया, तो पुनः पांच साल बाद ही उस अस्पताल के लिए उच्चीकरण के नाम पर बजट जारी किया जा सकता है। लेकिन जब षासन और सीएमएस को 10 और 20 मिलाकर कुल 30 फीसद का कमीषन मिल जाता है, तो उनके सामने कोई भी नियम और कानून नहीं दिखाई देता, उन्हें सिर्फ गांधी ही दिखाई देता है। हर्रैया के 100 बेड वाले अस्पताल के सीएमएस सुषमा जायसवाल और जिला महिला अस्पताल के सीएमएस अनिल कुमार, जेम पोर्टल लिपिक/फार्मासिस्ट और ठेकेदार षुभम अग्रवाल ने मिलकर उच्चीकरण और सामानों की खरीद फरोख्त के नाम पर लगभग नौ करोड़ का बंदरंबाट करने की साजिष रची। इन लोगों ने सबसे पहले उच्चीकरण और सामानों की खरीद फरोख्त करने का प्रस्ताव यह जानते हुए जानबूझकर भेजा कि प्रस्ताव नियमानुसार मंजूर नहीं हो सकता, लेकिन ठेकेदार ने कहा कि आप दोनों प्रस्ताव भेजिए, मंजूर करवाना और बजट लाना मेरा काम है। चूंकि दोनों सीएमएस को एक करोड़ 80 लाख का कमीशन दिखाई दे रहा था, इस लिए अंांख होते हुए भी अंधा बनकर प्रस्ताव भेज दिया, बाकी काम ठेकेदार शुभम अग्रवाल ने पूरा कर दिया। अब दोनों सीएमएस को एक करोड़ 80 लाख के कमीषन से हाथ तो थोना पड़ा, साथ ही दोनों के निलंबन की तलवार अलग से लटक रही है। रही बात ठेकेदार षुभम अग्रवाल की तो इनका एक करोड़ कमीशन का डूबा ही साथ ही इनकी फर्म ब्लैक लिस्टेड अलग से होगी। इस पूरे गोलमाल के एपिसोड में दो चीज सामने आया, पहला दोनों सीएमएस ने बजट जारी होने से पहले कैसे टेंडर निकाला और उसे फाइनल कर दिया? और कैसे दो-तीन साल के भीतर ही उच्चीकरण का प्रस्ताव दिया? खास बात यह है, कि नौ करोड़ का टेंडर किस तिथि और किस अखबार में निकला और कब अनुबंध हुआ, इसकी जानकारी सिर्फ दोनों सीएमएस, जेम पार्टल लिपिक और ठेकेदार को ही है।