बस्ती। वैसे तो आप लोगों को रह-रहकर कुछ न कुछ नई जानकारी देने का प्रयास करता रहता हूं, भले ही चाहें उसका खामियाजा ही क्यों न भुगतना पड़े? लेकिन जानकारी देने से बाज नहीं आ रहा हूं। आज आप लोगों को ऐसी जानकारी देनेे जा रहा हूं। जिसे पढ़कर आप लोग भी चौंक जाएगें, और सोचने पर मजबूर हो जाएगें, कि जिसे आप लोगों ने विधायक/सांसद बनाया, वह इस स्तर पर पहुंच जाता है, कि जीएसटी में भी कमीषन मांगने लगता। अभी तक आप लोगों ने कमीशनबाज नेताओं के बारे में बहुत कुछ सुना और देखा होगा, कमीशनबाज से आषय उस भवन और सड़क एवं पुलिया के निर्माण से हैं, जो या तो उदघाटन होते टूट जाती है, या फिर पुलिया का छत लगता नहीं, कि भरभराकर गिर जाता है। निधियों को बेचे जाने के बारे में आप लोग इतना सुन चुके होगें कि कान पक गया होगा। लेकिन क्या आप लोगों को यह मालूम हैं, कि आप का चुना हुआ जनप्रतिनिधि इतना लालची होता जा है, कि वह जीएसटी में भी कमीशन मांगने लगा। अब जरा सोचिए कि जो जीएसटी सरकार को जाती है, उस जीएसटी में कैसे ठेकेदार/कार्यदाई संस्था कमीशन देगें, लेकिन ठहरे विधायक, अगर इन्होंने जीएसटी में कमीषन मांग लिया तो देना ही पड़ेगा, क्यों कि यह इसे जन्म सिद्ध अधिकार मानते है। भले ही चाहें पुलिया गिर जाए या फिर सड़क टूट जाए। विधायकजी के सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। जब कोई ठेकेदार/कार्यदाई संस्था यह कहती है, कि विधायकजी जीएसटी में कैसे आप को कमीशन देगें, बाकी तो दे ही रहे है। तब विधायकजी समझाते हैं, देखो कि भाई जीएसटी का पैसा विधायक निधि से कटता हैं, और विधायक निधि किसकी है। अगर विधायक निधि विधायक की है, तो पूरा कमीशन भी विधायक का ही हुआ। इस लिए जीएसटी में भी कमीशन हर हाल में मिलना चाहिए। कहने का मतलब अगर साल भर में पांच करोड़ के विधायक निधि से काम हुआ, और ठेकेदार का जो भुगतान हुआ, वह 18 फीसदी जीएसटी काटकर हुआ, इसमें 16 फीसद ठेकेदार और दो फीसद विभाग का कटता है। विधायक निधि से सरकार को जो एक साल में जीएसटी जमा हुआ वह 90 लाख हुआ, अगर पूरे पांच साल का जोड़ लिया जाए तो 25 करोड़ में चार करोड़ जीएसटी के रुप में जमा हुआ। लेकिन विधायकजी का कहना होता है, कि भाई हमको तो अपने पूरे निधि का कमीशन चाहिए। अगर विधायकजी को जीएसटी का आधा यानि नौ फीसद ही कमीशन मिल गया तो 50 लाख से अधिक हो गया। विधायकजी कहते हैं, कि जीएसटी क्या होता हैं, हमको नहीं मालूम, हमको तो सिर्फ इतना मालूम हैं, कि सरकार ने पांच साल में 25 करोड़ दिया, तो कमीशन भी 25 करोड़ का चाहिए। इसमें जीएसटी कहां बीच में आ गया। ठेकेदार कितना भी देहाती भाषा में विधायकजी को समझाता हैं, लेकिन विधायकजी कमीशन के आगे ठेकेदार की सुनने को तैयार नहीं होते। जीएसटी में कमीशन लेने का आइडिया उन विधायकों को नहीं होगा, जो एलएलबी या पोस्टगेजुएट होते है। यह आईडिया उन जनप्रतिनिधि का होता है, जो ठीक से हस्ताक्षर तक नहीं कर पाते। अब जरा सोचिए कौन चालाक हुआ, पढ़ा लिखा विधायक या ठीक से हस्ताक्षर न करने वाला। विधायकजी को नहीं मालूम कि जिस ठेकेदार से वह जीएसटी में कमीषन मांग रहे है, वही उनके हार का कारण बनेगा। क्यों कि ठेकेदारों को भी ऐसा विधायक नहीं चाहिए जो 50 फीसद कमीशन भी लेता हो और जीएसटी में भी कमीशन मांगता हो। इसह कमीशनबाजी के चलते आम जनता एक अच्छी सड़क पर चलने का सपना देख रही है। जिले में अगर ‘पवन वर्मा’ जैसे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले हर गांव में एक-दो हो जाएं तो विधायकों का पाजामा डीला कर दें। यह लोग जब सफेद कुर्ता और पैजामा पहनकर लक्जरी वाहनों से चलते हैं, तो लगता है, कि इनसे बड़ा ईमानदार और कोई धरती पर नहीं होगा, लेकिन असल में यह जनता की नजर में चोर ही होते हैं, जो जनता के विकास के नाम पर आए धन की चोरी करते है। ऐसे चोरों को इस बात की भी शर्म नहीं आती कि जनता उनके बारे में क्या सोच रही है? ऐसी लोगों की सोच कमीशन तक ही रह जाती है।
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