बस्ती। भाजपा के ही अनेक लोगों का कहना और मानना है, कि क्यों नहीं जिला पंचायत, नगर पालिका और नगर पंचायतों के भ्रष्टाचार रुक रहे हैं, जब कि अन्य विभागों में भ्रष्टाचार उतना नहीं हैं, जितना उक्त पंचायतों में। यह भी कहते हैं, कि योगीजी ने तो अन्य विभागों के भ्रष्टाचार पर काफी हद तक अंकुष लगा दिया, लेकिन क्यों नहीं वह उक्त तीनों पर लगाम कस पा रहे है। सवाल का जबाव भी वह लोग देते हैं, कहते हैं, कि जब साहब और उनके आदमी ठेकेदार बन जाएगें, तो भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगा कैसे? क्यों कि जिसे भ्रष्टाचार को रोकना हैं, वही भ्रष्टाचार का ठेकेदार बना हुआ है। जाहिर सी बात हैं, जिन मामलों में खुद साहब और उनके आदमी ठेकेदारी करते हैं, उन मामलों में सवाल जबाव करें कौन? एक ठेकेदार का कहना है, कि वह शासन से ले-देकर लगभग दो करोड़ का बजट लाया, तो साहब ने कहा कि जितना खर्चा तुम्हारा बजट लाने में लगा हैं, उतना और एक दो लाख मेहनत का और ले लो, क्यों कि इस बजट का इस्तेमाल हम करेगें। अब ठेकेदार की क्या मजाल कि वह साहब को इंकार कर दें। बताया कि साहब और उनके ठेकेदार ने मिलकर उसके द्वारा लाए गए बजट में से लगभग 50-60 लाख कमाया। कई कार्यो पर तो बिना कार्य कराए ही भुगतान हो गया। अगर ठेकेदार की बात सही है, तो यह लोकतंत्र के लिए बहुत ही घातक है। क्यों कि अगर माली ही बाग को बर्बाद कर देगा तो बाग की रक्षा कैसे होगी? यह भी कहते हैं, कि अब तो साहब लोग अपने साथ अपना ठेकेदार लेकर आते है। साहब और ठेकेदार दोनों मिलकर नगर पंचायतों को लूटते है। लूट का आलम यह है, कि जब बस्ती से एक साहब तबादला होकर गए तो जाते-जाते कह गए, कि बस्ती से उन्होंने और उनके आदमियों ने जितना पैसा कमाया/बनाया, उतना पूरी नौकरी में नहीं कमाया। यह भी कहा कि अगर उन्हें मालूम होता कि बस्ती की जमीन इतनी उपजाउ हैं, तो पहले ही तबादला करवाकर आ जातें, इन साहब की इच्छा फिर बस्ती आने की है। ताकि जो बचाखुचा उसे भी समेट लें। पहले तो साहब जनपद से जाना नहीं चाहते हैं, और अंतिम समय तक साहब ने तबादला रोकवाने का प्रयास किया, लेकिन उनकी योगीजी के फरमान के आगे एक न चली। क्यों कि साहब और उनके ठेकेदार ने नेताजी की कमाई पर डांका डाल रहे थे। नेताजी को यह कैसे बर्दास्त नहीं कि उनकी कमाई पर कोई साहब डांका डाले। इस लिए वह सीधे योगीजी के पास चले गए, और कहा कि अगर आप चाहते हैं, कि नगर पंचायत ईमानदारी से चल सके तो सबसे पहले इन साहब को जनपद से हटाइए।
ऐसा भी नहीं कि सारे नगर पंचायतों का प्रशासन एक जैसा हो, इनमें एक दो ऐसे संचालक भी है, जो दाल में नमक के बराबर खाना चाहते है। अन्य की अपेक्षा अधिक ईमानदारी दिखाना चाहते हैं, लेकिन वह नहीं दिखा पाते, क्यों कि साहब के बिना वह नगर पंचायत का संचालन नहीं कर पाएगें। ऐसे लोगों का मन नहीं करता कि वह लाइट में 50 फीसद कमीशन लें, चूंकि सभी नगर पंचायतों में 50 फीसद कमीशन लेने की परम्परा चल पड़ी है, इस लिए अगर कोई संचालक ईमानदारी दिखाना भी चाहें तो कैसे दिखाए, क्यों कि जितना अधिक कमीशन होगा उतना अधिक साहब का लाभ होगा। इसी लिए आप लोग नगर पंचायतों में जितना विकास लाइट में देखा होगा, उतना अन्य में नहीं। आप लोगों ने लगभग सभी विभागों के खिलाफ जांच और कार्रवाई होते देखा और सुना भी होगा, लेकिन कभी भी नगर पंचायतों के खिलाफ कोई कार्रवाई होते न तो सुना होगा और न देखा ही होेगा। ऐसा भी नहीं शिकायतें नहीं होती, होती हैं, लेकिन कार्रवाई नहीं होती, क्यों नहीं होती? इस लिए नहीं होती, क्योंकि जिसके खिलाफ कार्रवाई होनी होती है, वह साहब का ठेकेदार होता है, जिसके साथ साहब की हिस्सेदारी रहती है। यह जनपद और जनपद वासियों के लिए दुभार्ग्य की बात हैं, उसे साहब नहीं बल्कि साहब के रुप में ठेकेदार मिल रहे है।
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