बस्ती। असम के प्रभारी एवं पूर्व सांसद हरीश द्विवेदी के उस पोस्ट की खूब चर्चा हो रही है, जिसमंे इन्होंने जंतर-मंतर पर हो रहे छात्रों के आंदोलन में घायल पुलिस कर्मी का फोटो पोस्ट करते हुए लिखा कि पुलिस जवानों पर सीजेपी के लोगों ने जानलेवा हमला कर दिया, कहा कि लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन हिंसा और सुरक्षा बलों पर हमला स्वीकर नहीं। इसे लेकर खूब कमेंट हुए। प्रवीन सिंह कहते हैं, कि जवानों पर पत्थर चलाना अपराध है, लेकिन बच्चों का सिर फोड़ना, महिलाओं पर लाठियां चलाना और लड़कियों के कपड़े फाड़ना अपराध नहीं हैं क्या? उसे व्यवस्था का नाम देना लोकतंत्र का सबसे बड़ा मजाक, लोकतंत्र में जनता सवाल पूछे तो लाठी, और सत्ता सवालों से बचे तो उसे षासन कहा जाए, जब सत्ता आलोचना को दुष्मनी मानने लगे और असहमति का जबाव डंडे से देने लगे, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे निरंकुषता की ओर बढ़ने लगता, एक चुनाव और...। रजनीश पांडेय कहते हैं, कि 20 दिन से कहां थे। अशोक यादव लिखते हैं, कि जब यह जवान लाडियां चला रहे थे तो कहां थे सर। शक्ति शुक्ल ने कहा कि माननीय महोदय आज दिखा आपको, कल का कोई वीडियो आपको नहीं दिखा था, क्या, गुजरातियों की चाटुकारिता बंद करो, देश के भविष्य के साथ खड़े हों,। पढ़ो और बोलो में कहा गया कि और तुम अपने प्रोफाइल में मेंबर आफ पार्लियामेंट क्यों लिखा, भूत उतरा नहीं क्या सांसदी का। सत्य पांडेय कहते हैं, कि तुम सब चोर हो। अंबुज सिंह कहते हैं, कि इस आंदोलन का मैं शुरु से विरोध कर रहा हूं, अमित शाह को आंदोलनकारियों से सख्ती से निपटना चाहिए।  करमवीर चौधरी ने लिखा कि जवान कौन सा वहां मिठाई लेकर गए थे, जैसी करनी वैसी भरनी, अपने आका का हुक्म मानने गए थे, और आका तो व्यस्त हैं, मस्त हैं, आदानी और अंबानी की गुलामी करने में। जितेंद्र चौधरी ने लिखा कि अच्छा काम तो किया, पहले पुलिस वाले डंडा लाडियां चलाई। विक्रम यादव लिखते हैं, कि नेताजी पार्टी की गुलामी छोड़ों, देखो देश के युवा, अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। लोग कहते हैं, कि हरीशजी को कम से कम उस 16 साल की लड़की के मरने पर तो निंदा करना देना चाहिए, जिसे पूरा देश श्रद्धांजलि दे रहा है। यह छात्रा पुलिस की बर्बरता की षिकार हुई।

कहा जा रहा है, कि जंतर-मंतर के आंदोलन में जब बच्चे पीटे जा रहे थे, लड़कियों के कपड़े फाड़े जा रहे हैं, उनके प्राइवेट पार्ट पर हमला हो रहा था, तब हरीशजी क्यों नहीं जागे, लेकिन जैसे गुस्साई भीड़ ने पुलिस कमियों को पीटा वैसे ही इनकी नींद खुल गई, सवाल उठ रहा है, कि इस आंदोलन को हिंसक बनाया किसने? सरकार या विपक्ष ने। लोकतंत्र में अपनी बात कहने की सबको आजादी है। हरीशजी आप भी छात्र जीवन से नेता रहे, न जाने इस तरह के कितने आंदोलन में भाग लिया होगा, क्या आप ने कभी पुलिस वालों को लड़कियों के कपड़े फाडते देखा या फिर उनके प्राइवेट पार्ट पर हमला करते देखा, जिसके चलते एक सोलह साल की लड़की मर गई? क्या यह सब देखकर आप का मन नहीं रोता, अगर यह लड़कियां आपके परिवार या फिर नातेरिष्तेदार की होती तब भी आप चुप रहते हैं, और इसके लिए पुलिस को नहीं बल्कि आंदोलनकारियों को जिम्मेदार ठहराते? हरीशजी कैसे इसे आप जायज ठहरा सकते? भूलिए मत एक नेता के साथ आप एक पिता भी है। ऐसा कुछ भी मत करिए, जिसे आप को और आपके बच्चों कसे पीड़ा हो। लोग पूछ रहे हैं, कि जिले का नेता इतना असंवेदनशील कैसे हो सकता है? अगर आप न भी कमेंट करते तो भी आपके लिए के लिए अच्छा होता। दुनिया में कौन ऐसा व्यक्ति होगा, जो लड़की की मौत का समर्थन करेगा। आप भी न जाने कितने कैंडल मार्च निकाले होगें। एक बात और भी ध्यान रखिए आपके इस बयान से आप को बहुत नुकसान पहुंचा है। मोदी, शाह और योगी आप को नहीं जीताएगें, आपको जिले की जनता जीताएगी, जिसमें नौजवानों का बहुत अहम रोल होगा। इस आंदोलन से पहले नीट का पेपर आउट होने से 22 छात्र/छात्राएं अपनी जान दे चुकी है, इसे मिलाकर कुल 23 बच्चे अपनी जान दे चुके हैं, उसके बाद भी आप लोग नहीं जाग रहे है। विपक्ष अगर सत्ता की निंदा करे तो भाजपा उसे देश द्रोही कहती है, लेकिन अगर सत्ता पक्ष लाडियां भांजे, लड़कियों के कपड़े फाड़े अपमानित करे, तो हरीषजी इसे आप क्या कहेगें?  सबसे बड़ा सवाल यह है, कि आराजकता फैलाने का जिम्मेदार कौन? हरीषजी बताइए, आखिर कानून व्यवस्था को पहले किसने ध्वस्त किया, छात्रों ने या पुलिस ने। बस्ती की जनता आपकी टिपणी से आहत है। अगर आप मरी हुई बच्चों के प्रति संवेदना नहीं व्यक्त कर सकते तो कम से कम उसके परिवार की जख्मों को तो मत कुरेदिए। इस देश की जनता पुलिस का भी सम्मान करती और सुरक्षाबलों का भी। लेकिन पुलिस की कार्रवाई को स्वीकार नहीं करती। हरीशजी जनता पूछ रही है, कि अगर बच्चे देशद्रोह हैं तो आपकी सरकार क्या है?