बस्ती। ब्राहृमण महासभा के कई लोगों के द्वारा यह दावा किया जा रहा है, कि जिस दिन महामंत्री शंभूनाथ मिश्र ने बिल बाउचर के साथ हिसाब दिया, उसी दिन से यह फंस जाएगें, और इनकी उल्टी गिनती शुरु हो जाएगी। इनका बचाव करने वाले और यह खुद अच्छी तरह जानते हैं, कि हिसाब किताब सही नहीं है। भले ही चाहंे यह और इनके समर्थक कितना भी कहें, कि एक-एक रुपये के आय और व्यय का हिसाब-किताब है। लेकिन जब 50 पदाधिकारियों एवं सदस्यों के सामने पहली अगस्त 26 को हिसाब रखेगें तो हो सकता है, कि 20 जुलाई वाली मारपीट की पुनरावृत्ति हो जाए। वैसे भी ब्राहृमण महासभा की पारदर्षिता, ईमानदारी और विष्वनीयता समाप्ति के कगार पर है। जो कुछ बचा है, वह षायद पहली अगस्त को कहीं समाप्त न हो जाए। जिस महासभा के महामंत्री पर चंदा चोरी जैसा आरोप लग रहा हो, वह महासभा अपना अस्तित्व कैसे बचा पाएगी, यह बहुत बड़ा सवाल बना हुआ है, अब तो लोग जयपुर से लाए गए चार बड़े-बड़े पथर की चोरी होने की बाते भी ग्रुप में उठने लगी, और इसका ईषारा भी महामंत्री की ओर किया जा रहा है। सवाल उठ रहा है, कि जब मंदिर से कीमती पत्थर गायब हो गया तो क्यों नहीं अभी तक उसकी छानबीन की गई? क्यों नहीं एफआईआर दर्ज करवाया गया? पत्थर चोरी होने का मतलब श्रद्वालुओं को ठगना जैसा माना जा रहा है। अब सवाल उठ रहा है, कि जब मंदिर में सबकुछ ठीकठाक नहीं चल रहा था, तो इसके जिम्मेदार इतने सालों तक चुप क्यों रहें? क्यों मीडिया में खबर आने के बाद सक्रियता बढ़ी? जिस ब्राहृमण महासभा की बेैठक में मारपीट जैसी घटना हो, उस महासभा पर समाज क्यों और कैसे विष्वास करें? और क्यों मंदिर निर्माण को पूरा करने के लिए चंदा दे? जिस तरह राम मंदिर में चढ़ावा की चोरी का मामला सामने आया और उसके बाद चढ़ावा का जो ग्राफ गिरा, उसी तरह ब्राहृमण महासभा में भी चंदा देने वालों का ग्राफ गिरने की संभावना जताई जा रही है। अगर चंदा नहीं मिलेगा तो मंदिर का निर्माण नहीं होगा, पहले ही मंदिर पूरा होने का सपना देखते-देखते लगभग 50 लोग स्व. हो चुके है। इन सबके बावजूद भी अगर जिम्मेदारों में गैरत बची है, तो वह आगे आएं और जो भी कठोर कार्रवाई हो सके करें, मंदिर के अस्तित्व को बचाना है, तो उन दोषियों के खिलाफ कार्रवाई और उन्हें बेनकाब करना होेगा, जिन्होंने मंदिर को प्राइवेट कंपनी की तरह चलाया। समाज को यह जानने का हक हैं, कि जिनके आय का कोई खास स्रोत न हो और अगर वह 16-17 लाख की गाड़ी में चलता हो, और जो आलीषान मकान का मालिक हो, और जिसके बच्चे उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, तो वह कहां से कर रहे हैं? यह मामला अब किसी का निजी नहीं रह गया, पूरे समाज का हो गया।
आय-व्यय की जांच की मांग करने और ब्राहृमण महासभा को कंलकित होने से बचाने का प्रयास करने और मुखर होकर सबसे अधिक आवाज उठाने वाले ई. राधेष्याम पांडेय का कहते है, कि यह संगठन समस्त ब्राहृमण समाज की संस्था है। इसका सचंालन किसी एक व्यक्ति, एक पदाधिकारी या किसी एक परिवार के प्रभाव से नहीं, बल्कि संगठन के संविधान, सामूहिक उत्तरदायित्व एवं लोकतांत्रिक व्यवस्था से चलता है। अगर संगठन में किसी भी तरह विवाद उत्पन्न होता है, या फिर कोई गंभीर आरोप लगता है, तो इससे कार्यकर्त्ताओं का मनोबल गिरता, और समाज में संगठन की छवि कमजोर होती है। कहा कि वर्तमान में यह अनुभव किया जा रहा है, कि आय-व्यय, निर्माण कार्य एवं अन्य महत्वपूर्ण विषयों की जिम्मेदारी कुछ सीमित पदाधिकारियों तक केंद्रित रही है। जिसके चलते विवाद और अविष्वास का संकट खड़ा हो गया है। ओंकार कहते हैं, कि जयपुर से आया पत्थर मंदिर निर्माण के लिए महासभा के प्रांगण में रखा था, और वहीं से चोरी हो गया, महामंत्री षंभूनाथ मिश्र और इन्हीं की मंशा और प्रस्ताव पर इन्हीं के साले सत्ते शुक्लजी को वरिष्ठ उपाध्यक्ष बनाया गया, और उसके बाद त्वरित जीजा और साले की जोड़ी मंदिर निर्माण समिति के प्रभारी बन गए, पत्थर चोरी जीजा और साले दोनों के संज्ञान में है, लेकिन आज तक यह जोड़ी चुप्पी साध रखी है। पता करने तक प्रयास नहीं किया। राष्टीय अध्यक्ष ने भी कई बार पूछा लेकिन जीजा और साले ने कोई रुचि नहीं दिखाई। अगर किसी स्वाभिमानी व्यक्ति और वो भी ब्राहृमण पर आरोप लगता तो वह सबसे पहले पद से इस्तीफा दे देता, लेकिन इन सबको करने के लिए व्यक्ति के अंदर गैरत और नीयत साफ होनी चाहिए। ऐसे लोगों को थेथरई, बेशर्मी या निर्लज्जता भी कहा जाता है। ऐसे लोगों को रामनाम जपना, पराया माल अपना भी कहा जाता है। गोपाल त्रिपाठी का कमेंट पढ़ने लायक है, कहते हैं, कि समझ में नहीं आता कि और तमाम जातियों के भी मंदिर संघ आदि और चीजें बनी हुई, किंतु किसी को भनक तक नहीं लग पाती कि व्यवस्था कैसे चल रही है? कहते हैं, कि यह बाहृमण लोग जब तक थू-थू नहीं करवा लेते तब तक कोई कार्य नहीं होता, ‘ब्राहृमण कुकुर हाथी, ये खाय अपन जाती’ को चरित्रार्थ करते है। ब्राहृमण महासभा में हो रही कथित गड़बड़ी की निरंतर आवाज उठाने प्रषांत पांडेय कहते हैं, मंदिर परिसर से पत्थर चोरी हो जाता है, और लोग कहते हैं, कि चुप रहो। कहते हैं, कि लीपापोती वाला डामा बंद होना चाहिए, पिछले पांच साल से किसके अंदर क्या विचारधारा है, कितने-2 आरोप लगाए गए, पूर्व में किसके किसके उपर आरोप लगा, सबकुछ जानता हूं। रही बात ब्राहृमण समाज और प्रबुद्ववर्ग की तो यह मंदिर समाज के लिए ही है, अगर इस मंदिर को ठगा गया तो इसका मतलब समाज के हर व्यक्ति को ठगा गया। जिसके लिए मौन रहना उचित नहीं है, जिसको मौन रहना हैं, वह मौनी बाबा बना रहे।
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