बस्ती। मंदिर बनाने के लिए चंदा लेने मंदिर तो नहीं बना पाए, आलीषान मकान अवष्य बनवा लिया। अब तो यह कहा जाने लगा कि जितना चंदा/दान आया, उतने में तो भव्य मंदिर का निर्माण हो जाता, चंदा आने के बाद भी अगर मंदिर का निर्माण पूर्ण नहीं होता तो निर्माण समिति के साथ-साथ महामंत्री और कोषाध्यक्ष जिम्मेदार है। सवाल किया जा रहा है, कि आखिर इतना पैसा कहां गया, क्या मकान बन गया? अगर सालों बाद भी मंदिर का निर्माण अपूर्ण रह जाता है, तो सवाल तो उठेगा ही। सवालों का जबाव देने से अब नहीं बच सकते, हिसाब-किताब तो देना ही होगा। नहीं दिया तो माना जाएगा, कि पैसे का दुरुपयोग हुआ, यह बात पहले ही ई. राधेष्याम पांडेय कह चुके है। अब तो लोग ब्लैंक चेक जरिए धन के दुरुपयोग होने के भी आरोप लगने लगे, और पूछा जा रहा हैं, कि मूल रसीद पर अध्यक्ष का मोबाइल नंबर गलती से गलत छप गया, या फिर या भी कोई साजिश है। अगर गलती से छप गया तो अभी तक क्यों नहीं ठीक किया गया। जिस तरह आए दिन कोई न कोई नई चीजें सामने आ रही है, उससे लगता है, कि ब्राहृमण महासभा में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। इतने सालों से हेराफेरी और चंदा चोरी के आरोप लगते रहें, लेकिन आरापों की न तो जांच हुई, और न दोषियों के खिलाफ कोई कार्रवाई ही हुई। अगर यही कार्रवाई और जांच पहले हो जाती तो ब्राहृमण महासभा की इतनी बदनामी और छीछालेथर न होती। अगर 23 अगस्त को होने वाली कार्यकारिणी की बैठक में कोई निर्णय नहीं हुआ, तो हंगामा होने भी इंकार नहीं किया जा सकता, क्यों कि जिस तरह पदाधिकारियों और आजीवन सदस्यता वालों के बीच चंदा चोरी को लेकर आक्रोश व्याप्त हैं, उसे शायद अध्यक्ष भी न रोक पाएं।
दैनिक तेजयुग न्यूज़
डा. आशीष त्रिपाठी लिखते हैं, कि मंदिर निर्माण जैसे पवित्र कार्य के लिए उन्होंने 21 हजार का चेक इस लिए महामंत्री को नहीं दिया था, वह पैसा ब्राहृमण महासभा के खाते में न डालकर किसी निखिल कुमार/अवधेष कुमार के खाते में डाल देगें, और उसका दुरुपयोग कर देगें। लिखा कि जब हमने महामंत्री से पूछा कि चेक किसके नाम कटेगा तो उन्होंने कहा कि नाम मैं भर लूंगा। अब आप लोग लरा अंदाजा लगाइए, कि यह हेराफेरी लगभग सात पहले की गई, उसके पहले और उसके बाद कितनी हेराफेरी की गई होगी, इसे देखने वाला कोई नहीं। इतना ही नहीं लगभग दो-तीन साल पहले महामंत्री को इसी तरह का चेक ओझा डायग्नोसिस्ट सेंटर के डा. सत्येंद्र ओझा और आर्थोपेडिक सर्जन डा. सौरभ द्विवेदी ने मेरे कहने पर दिया था, उस खाते का पैसा किसके खाते में गया, इसका पता आज तक नहीं चला। लिखा कि जब हमने दोनों डाक्टरों से पूछा तो बताया कि महामंत्री ने कहा कि हस्ताक्षर और एमाउंट भर दीजिए, किस खाते में जाना हैं, वह हम भर लेगें। इसी तरह की घटना डा. आलोक पांडेय के साथ भी महामंत्री ने किया। लिखा कि मेरे द्वारा उसी समय इसकी जानकारी व्हाटअप ग्रुप में डाल दिया था, लेकिन चार साल हो गए, न तो उसकी जांच हुई और न यह पता चला कि पैसा किसके खाते में गया। अब आप लोगों को यह भी समझ में आ गया होगा, कि जानकारी देने के बाद भी क्यों नहीं आज तक जांच और कार्रवाई हुई? अब आप लोगों को लग गया होगा, कि महामंत्री के गलत कार्यो को किसने बढ़ावा दिया। इतने सालों बाद मंदिर का निर्माण क्यों अधूरा इसका कोई जबाव नहीं दे रहा। बिना सिर पैर का हिसाब दे दिया जाता, फिर भी महामंत्री और कोषाध्यक्ष को बर्खास्त नहीं किया जाता। सवाल उठाया गया, कि चेक पर ब्राहृमण महासभा का नाम लिखवाए बिना हर जगह से महामंत्री क्यों चेक ले रहे हैं? और क्यों उस चेक को दूसरे के नाम के खाते में डाल रहे है। विजय बिहारी तिवारी ने महामंत्री को लिखा कि आपके द्वारा व्हाटसअप ग्रुप पर कैष बुक की छाया उपलब्धि कराई गई, उसमें व्हाइटनर लगाकर लीपापोती की गई, इसका कोई मतलब नहीं। ब्राहृमण महासभा के खाते का बैंक स्टेटमेंट भेजे। गोलमाल है, भाई सब गोलमाल है।
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