बस्ती। अगर भाजपा के नेताओं का सरंक्षण नहीं मिलता तो आज बनकटी का खोरिया ग्राम पंचायत प्रदेश का सबसे अधिक भ्रष्टाचार वाला ग्राम पंचायत न बनता। ठीक उसी तरह का भ्रष्टाचार विक्रमजोत ब्लॉक के ग्राम पंचायत ईमिलिया में देखने को मिल रहा है। अगर खोरिया प्रदेश का तो ईमिलिया ब्लॉक का सबसे भ्रष्ट पंचायत होगा। वैसे भी इस ग्राम पंचायत में अब तक का सबसे बड़ा फर्जीवाड़ा मतदाता सूची में उजागर हो चुका है। इस ब्लाक के ग्राम पंचायत ईमिलिया, रिक्खीपुर और कौलपुर जैसे नामी ग्राम पंचायतों में बड़े पैमाने पर फर्जी मतदाता होने की शिकायत कई बार एसडीएम हर्रैया और डीएम से हुई, लेकिन हर बार पैसे और राजनैतिक दबाव के चलते मामले की लीपापोती कर दी गई, एक तरह से देखा जाए तो इन तीनों ग्राम पंचायतों में फर्जी मतदाताओं का भरमार है। कौलपुर वाला रिक्खीपुर में तो रिक्खीपुर वाला ईमिलिया में मतदाता बने है। जाहिर सी बात यह फर्जीवाड़ा बिना एसडीएम, बीडीओ, सुपरवाइर और बीएलओ के नहीं हो सकता। अगर किसी को अमरजीत जैसा बीएलओ और प्रतीक शुक्ल जैसा सुपरवाइजर मिल जाए तो जीतना आसान हो जाता है। खासबात यह है, कि अगर इन तीनों ग्राम पंचायतों में बिना फर्जी वोटरों के चुनाव हो जाए तो न तो कोई होटल वाला और न कोई ढ़ाबा वाला ही जीत पाएगा। यही लोग जीतकर बाद में अपने-अपने ग्राम पंचायतों में ऐसा भ्रष्टाचार का तांडव मचाते हैं, कि गांव वाले देखते ही रह जाते है। गांव वाले तो ईमानदार को प्रधान बनाना चाहते हैं, और वोट भी ईमानदार प्रत्याशी को देते हैं, लेकिन उनकी सारी ईमानदारी फर्जी वोट के सामने धरी की धरी रह जाती है। ऐसे में गांव वालों के सामने ईमानदार और गांव का विकास करनले वाला प्रधान को चुनना मुस्किल हो जाता है, और यह तब तक होता रहेगा, जब तक अमरजीत जैसा बीएलओ  और प्रतीक शुक्ल जैसे सुपरवाइजर रहेगें। देखा जाए तो इनकी भी कोई गलती नहीं हैं, इनपर नेताओं का इतना दबाव और प्रभाव रहता है, कि न चाहते हुए भी यह अपना काम ईमानदारी से नहीं कर सकते है। इस लिए कहा भी जाता है, कि जब तक नेता नहीं ईमानदार होगें तब तक चुनाव ईमानदारी से नहीं हो सकता, और न कोई ईमानदार प्रधान ही जीत सकता। नेताओं ने अपने लाभ के लिए पूरी चुनावी व्यवस्था को ही दूषित कर दिया, और जिसका खामियाजा गांव वालों को भुगतना पड़ता है। जो चुनाव बेईमानी के आधार पर जीता जाता है, वह ग्राम पंचायत कभी माडल नहीं बन सकता, और न कभी गांव का समुचित विकास ही हो सकता हैं, जैसा कि ईमिलिया ग्राम पंचायत में देखने को मिल रहा है।

‘ईमिलिया’ में हुआ ‘एक करोड़’ का ‘शौचालय’ घोटाला

विक्रमजोत ब्लॉक के चर्चित ग्राम पंचायत ईमिलिया अगर बीते कार्यकाल में शपथ-पत्र के साथ में गांव के ही राम आशीष सिंह पुत्र योगेंद्र सिंह और 14वां वित्त, 15वां वित्त, राज्य वित्त, पंचम/शष्टम निधि, मनरेगा सहित शौचायल में लगभग तीन करोड़ के महाघोटाला जिसमें सिर्फ शौचालय में एक करोड़ के घोटाले की शिकायत डीएम से की जाती है, तो समझा जा सकता है, कि यह ग्राम पंचायत क्यों नहीं अभी तक माडल बना, जबकि इस ग्राम पंचायत में विकास के नाम पर लगभग तीन करोड़ खर्च हो चुका, सवाल उठ रहा है, कि अगर इतना धन खर्च करने के बाद भी कोई ग्राम पंचायत माडल नहीं बनता तो इसके लिए दोषी किसे माना जाए, अकेले प्रधान को दोषी मानना सही नहीं होगा, असली दोषी तो बीडीओ होते हैं, जो करोड़ों की योजना को स्वीकृति को देदेते हैं, लेकिन यह देखने नहीं जाते, कि सिकी स्वीकृति दे रहे हैं, वह प्रोजेक्ट मौके पर है, कि नहीं है? भुगतान करने से पहले भी यह देखने नहीं जाते तो कि कार्य हुआ कि नहीं? बस आंख बंदकरके भुगतान और स्वीकृति दें देते, बस इन्हें इनका बखरा मिलना चाहिए। रही बात प्रमुखजी की तो आज तक किसी प्रमुख ने यह नहीं कहा कि उनकी लापरवाही से ब्लॉक माडल नहीं बन सका। जबकि असलियत यह है, कि इनकी मर्जी के बिना ब्लॉक में कोई पत्ता तक नहीं हिल सकता। जब यह लोग क्षेत्र पंचायत के करोड़ों की निधि को नहीं सभाल पाते तो ग्राम पंचायतों का क्या संभालेगें? इन लोगों को तो बीडीओ की तरह अपने बखरे से ही मतलब रहता है। यह कहानी सिर्फ एक क्षेत्र पंचायत की नहीं हैं, बल्कि पूरे जिले के क्षेत्र पंचायत की है। अगर रामनगर को छोड़ दिया जाए तो अन्य किसी ने भी अपने क्षेत्र पंचायत के रिपोर्ट कार्ड को जनता के सामने नहीं रखा, जो प्रमुख रिपोर्ट कार्ड तक नहीं प्रस्तुत कर सकता है, उस प्रमुख से ब्लॉक को माडल बनाने की उम्मीद करना बेमानी जैसा होता है। जिस ईमिलिया ग्राम पंचायत की जांच इस लिए नहीं होती, क्यों कि सचिव अभिलेख ही नहीं देता, जाहिर सी बात हैं, अभिलेख वही सचिव नही देता जिसने प्रधान के साथ मिलकर सरकारी धन का दुरुपयोग किया हो। लगभग सभी ग्राम पंचायतों में जमकर घोटाला हुआ, लेकिन आज तक एक भी प्रमुख ने न तो जांच करवाने के लिए लिखा और न सचिव के खिलाफ कोई र्कारवाई करने की संस्तुति ही दी। 800 षौचालय में से 300 शौचालयों के लाभार्थियों का पता नहीं चला। खासबात यह हैं, कि लापता लोगों के नाम पर प्रति शौचालय 12 हजार के दर से धन भी आहरित हो गया। एक तरह से ग्राम पंचायत में शौचालय को एक कारोबार के रुप में सचिव और प्रधान ने लिया। जो प्रधान और सचिव शौचालय का पैसा डकार सकता है, उससे गांव वाले और क्या उम्मीद करें?