जो फर्जीवाड़ा हेल्थ डायरेक्टर डा. रतन पाल सिंह सुमन ने किया, वही फर्जीवाड़ा सीएमओ कार्यालय में तैनात बाबू प्रेमबहादुर सिंह ने किया

-डा. रतन पाल ने दो करोड़ लेकर अधिकार से बाहर जाकर सात अरब के चददर की धुलाई का आर्डर श्री इंटरप्राइजेज के भगवान यादव को दिया, और प्रेमबहादुर सिंह ने बिना टेंडर निकाले सीधे कानपुर के ब्लैक लिस्टेड फर्म अवनि परिधि को मैनपावर आपूर्ति के लिए दस लाख लेकर आर्डर कर दिया

-डीजी हेल्थ ने इस फर्जीवाड़ा को देखते हुए सारे अभिलेख तलब किए, और सीएमओ से माह अक्टूबर का वेतन रोकने का आदेष दिया, इससे पहले तत्कालीन सीएमओ दो और वर्तमान सीएमओ चार नोटिस थमा चुके, लेकिन निलंबित नहीं कर रहें

बस्ती। सीएमओ कार्यालय के प्रेमबहादुर सिंह की प्रेम गाथा जारी है। जब से गोरखपुर से प्रमोद कुमार मिश्र तबादला होकर सीएमओ कार्यालय आए हैं, तब से प्रेमबहादुर सिंह की न सिर्फ दुकान बंद हो गई, बल्कि एक के एक बाद एक खुलासा भी हो रहा है। किसी न किसी मामले में यह फंसते जा रहे है। एमएलसी प्रतिनिधि हरीश सिंह के शिकायत पर जांच कर रहे विजिलेंस एसपी के मांगने के बावजूद इन्होंने आज तक पत्रावली उपलब्ध नहीं कराया, और अब तो पत्रावली के गायब होने या गायब कर देने की बातें सामने आ रही है। ब्लैक लिस्टेड अवनि परिधि को जिस तरह प्रेमबहादुर सिंह ने सारे नियम कानून को किनारे करते हुए 79 चतुर्थ श्रेणी कमियों के आउटसोर्सिगं के जरिए भर्ती करने का सीधे आर्डर दे दिया, आज वह इनके लिए गले की हडडी बनती जा रही है। भुगतान करने के लिए पत्रावली को जब प्रमोद कुमार मिश्र ने प्रेमबहादुर सिंह से मांगा तो बताया गया कि पत्रावली ही गायब हो गई। जिसके चलते एक साल से कर्मियों को मानदेय नहीं मिल रहा, मामला जब कमिश्नर के पास पहुंचा तो वहां भी बताया गया कि प्रेमबहादुर सिंह की ओर से पत्रावली को ही गायब कर दिया गया। फिर यह मामला डीजी हेल्थ के पास पहुंचा तो उन्होंने कहा कि जब तक स्पष्टीकरण नहीं दे दिया जाता, तबतक मानदेय का पैसा नहीं जाएगा, और इस लापरवाही के लिए डीजी हेल्थ ने सीएमओ को प्रेमबहादुर सिंह का माह अक्टूबर का वेतन बाधित करने का निर्देष दिया। यह ठीक उसी तरह फर्जीवाड़ा किया गया, जिस तरह हेल्थ डायरेक्टर डा. रतन पाल सिंह सुमन ने दो करोड़ लेकर अधिकार से बाहर जाकर सात अरब के चददर की धुलाई का आर्डर श्री इंटरप्राइजेज के भगवान यादव को दिया, प्रेमबहादुर सिंह ने भी वही काम किया जो काम हेल्थ डायरेक्टर ने किया, अंतर सिर्फ कमीशन के धन को लेकर रहा, डा. रतन पाल सिंह ने दो करोड़ लिया तो प्रेमबहादुर सिंह ने दस लाख लिया। देखा जाए तो दोनों ने पैसे के लिए अपने-अपने ईमान और धर्म को बेचा। नुकसान सरकार का हुआ। दस लाख के कमीशन के एवज में सरकार का हर साल लगभग 75 लाख का नुकसान हो रहा है, नुकसान इस लिए हो रहा है, क्यों कि नियम विरुद्व मैनवावर की आपूर्ति का आर्डर जारी किया, अब जरा अंदाजा लगाइए कि इस आर्डर की जानकारी वर्तमान और तत्कालीन सीएमओ तक को नहीं और न उनकी संज्ञान में ही लाया गया, अगर संज्ञान में लाते तो सीएमओ को भी अपने हिस्सा में से कमीषन देना पड़ता, कमीषन न देना पड़े इस लिए सीएमओ तक को बाईपास किया गया, हैरान करने वाली बात यह है, कि दोनों सीएमओ के नोटिस का जबाव तक प्रेमबहादुर सिंह ने नहीं दिया, और न ही दोनों सीएमओ ने इसके लिए बाबू के खिलाफ कोई कार्रवाई ही किया, निलंबित तक नहीं किया, जबकि मामला पूरी तरह सरकारी धन के गबन का है, और इसके लिए दोनों सीएमओ में से किसी एक को बाबू और अवनि परिधि के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाना चाहिए था। सवाल उठ रहा है, कि जब सभी चोर है, तो कैसे कोई एक चोर दूसरे चोर के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराएगा, सीएमओ को इस बात का डर है, कि अगर मुकदमा दर्ज करवा दिया, या निलंबित कर दिया तो कहीं प्रेमबहादुर सिंह उनके ही काली करतूतों पर कुठाराघात न करने लगे। वैसे ही साहबों की जान बाबूओं में रहती। प्रेमबहादुर सिंह और अवनि परिधि ने मिलकर सरकार को चूना लगाने की जो साजिश रची, उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। अवधि परिधि और बाबू को डर था, कि अगर टेंडर करवाया तो चार या पांच फीसद का ही लाभ ठेकेदार को मिलेगा, क्यों कि तब कंपटीषन होता। इसी लिए 20 फीसद का लाभ कमाने के लिए बाबू ने सरकार और सीएमओ दोनों को धोखा दिया। दस लाख कमीषन के चक्कर बाबू ने ठेकेदार को लगभग 70 लाख का फायदा पहुंचा दिया। तीन बार भुगतान हुआ, जिसमें बाबू को लगभग 12 लाख मिला होगा, हर भुगतान पर पांच फीसद कमीशन देना पड़ता। इस तरह कमीशन के रुप में कुल 12 लाख और दस लाख फर्जी अनुबंध करने सहित कुल 22 लाख प्रेबहादुर सिंह के जेब में गया। रही बात सीएमओ की तो वह इस मामले में घंटा हिलाते रहे। कहा जाता है, कि अगर तत्कालीन सीएमओ डा. आरएस दूबे 40 लाख के गबन के आरोप में प्रेमबहादुर सिंह के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवा देते तो आज प्रेमबहादुर सिंह जेल की हवा खा चुके होते, और यह तभी होता जब सीएमओ ईमानदार होते। एक बेईमान और भ्रष्ट सीएमओ से सिॅर्फ बेईमानी की ही उम्मीद की जा सकती है।