राजेश शुक्ल/बस्ती

मोदी सरकार द्वारा विशेष रूप से यूजीसी नियमों में किए गए संशोधनों पर सामान्य वर्ग आहत है।जो सर्व विदित है। यूजीसी अधिनियमों में किसी के अधिकार ही खत्म कर देना समानता की कैसी परिभाषा है।आरोप है सरकार जोड़ने की बात करती है, लेकिन वास्तव में भेदभाव और तोड़ने का काम किया जा रहा है।नए यूजीसी अधिनियम के नियमों में गलत आरोप लगाने के बावजूद किसी पर कोई कार्रवाई न होना शैक्षिक संस्थानों के लिए उचित नहीं है। एससी/एसटी अधिनियम के ऐसे कई मामलों का उदाहरण है जहां न्यायालयों में गलत आधारों की पुष्टि हुई है।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नियमों में संशोधन को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। इन संशोधनों के माध्यम से एक विशेष वर्ग को निशाना बनाया जा रहा है।
 जब यूजीसी अधिनियम 2012 पहले से लागू था, तो नियमों में ऐसे बदलाव करना अनुचित है जो सर्व समाज के बीच खाई पैदा करें। किसी के अधिकारों को ही समाप्त कर देना समानता की परिभाषा के विपरीत है। एक तरफ सरकार सर्व समाज को जोड़ने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर उसके ये कदम भेदभाव और विभाजन को बढ़ावा दे रहे हैं।

शिक्षा और सामाजिक क्षेत्रों में किसी भी व्यक्ति के साथ भेदभाव अस्वीकार्य है।  इन संशोधनों के माध्यम से एक विशेष वर्ग को निशाना बनाया जा रहा है, जिससे समाज में भेदभाव बढ़ सकता है। यह कदम समानता के सिद्धांतों के खिलाफ है।

आलोचकों का यह भी कहना है कि सरकार एक ओर समाज को जोड़ने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर ऐसे नियम ला रही है जो भेदभाव को बढ़ावा देते हैं और समाज को बांटने का काम करते हैं।

यूजीसी नियमों में संशोधन को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। आलोचकों का आरोप है कि इन संशोधनों के माध्यम से एक विशेष वर्ग को निशाना बनाया जा रहा है, जिससे समाज में भेदभाव बढ़ सकता है।यह कदम समानता के सिद्धांतों के खिलाफ है। 
यूजीसी नियमों में प्रस्तावित संशोधन समाज में विभाजन पैदा करने का काम कर रहे हैं।
किसी भी समाज के साथ भेदभाव अनुचित है, लेकिन किसी के अधिकारों को ही समाप्त कर देना समानता की गलत परिभाषा है।
मौजूदा सरकार के 'समाज को जोड़ने' के दावों पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।  सरकार के कार्य जोड़ने के बजाय भेदभाव और तोड़ने का काम कर रहे हैं।
 शिक्षा जगत हो, सामाजिक क्षेत्र हो, विद्यार्थी हों या आम नागरिक, किसी के भी साथ भेदभाव होना गलत है।