बस्ती। पिछले कई महीनों से ब्राहृमण महासभा के जिम्मेदार यह कह रहे थे, कि अगर आडिट जांच हो गई, तो चंदा चोरों और उन्हें बचाने वालों का चेहरा समाज के सामने अगर नहीं आया तो धरना प्रदर्शन किया जाएगा। जो लोग यह कह रहे थे, आडिट रिपोर्ट के बाद कुछ लोग कहीं मुंह दिखाने के लायक नहीं रहेंगे, वे लोग क्यों नहीं सामने आते? अब तो आडिट जांच भी हो गई, लेकिन अभी तक चंदा चोरों और उन्हें बचाने वालों का चेहरा समाज के सामने नहीं आया, क्यों नहीं आया यह बहुत बड़ा सवाल हैं? उससे बड़ा सवाल यह उठ रहा है, कि आखिर अध्यक्षजी क्यों नहीं कार्यकारिणी और विप्र के सामने आडिट रिपोर्ट को सार्वजनिक करते? जो लोग यह ढ़ीगें हांक रहे थे, कि ईट से ईट से बजा दूगा, ब्राहृमण महासभा के सामने चंदा चोरों के खिलाफ धरना प्रदर्शन करुंगा, वे लोग कहां गए? क्या इन लोगों को सांप सूंघ गया, या फिर इन लोगों ने चंदा चोरों और उन्हें बचाने वालों के साथ कोई डील कर लिया। अगर यह लोग आवाज उठाते रहते तो डील करने की बातें नहीं उठती। जो लोग यह लिख रहे थे, कि पारदर्शिता छिपाने में नहीं बल्कि उसे सार्वजनिक करने में हैं, वे लोग अब कहां गए, जो लोग महामंत्री और कोषाध्यक्ष को दिन रात चंदा चोर कहकर अपमानित और गाली दे रहे थे, वे लोग कहां चले गए, पता ही नहीं चल रहा है। ब्राहृमण समाज के ठेकेदार कहे जाने वाले लोग क्यूं खामोश हैं? जो लोग आडिट जांच से पहले यह कह रहे थे, कि किसी का कुछ नहीं होगा, सब मिले हुए हैं, उनकी बातें आज सच साबित हो रही है, चंदा चोरी का उजागर कर हीरो बनने वाले विजय बिहारी तिवारी ने यह कहा था, कि जब तक चंदा चोरों को सजा नहीं दिला देता, तब तक न तो मैं चैन से बैठूंगा और न चोरों को बैठने दूंगा, कहां गए लंबी-लंबी बात कहने वाले हीरो? क्यों खामोश है? सच तो यह है, कि मंदिर निर्माण के नाम पर लोगों को ठगा गया, आज वे लोग उन लोगों को इसके लिए गुनहगार मान रहे हैं, जिनके कहने पर जिन लोगों ने लाखों रुपया का चंदा दिया। सवाल उठ रहा है, कि इस मामले में राष्टीय कार्यकारिणी के सदस्य क्यों खामोश और क्या कर रहें हैं? अगर इन्हें खामोश ही रहना था, तो क्यों पूरे ब्राहृमण समाज को कटघरे में खड़ा किया? सच पूछिए तो चंदा चोरी और आडिट रिपोर्ट को सार्वजनिक न करने के लिए पूरी तरह कार्यकारिणी के लोग जिम्मेदार है। ये वे लोग हैं, जिन्होंने बयानों के जरिए माहौल खराब किया, यही वे लोग हैं, जिन्होंने मीडिया पर बाहृमण महासभा के भ्रष्टाचार लिखने के लिए दबाव बनाया, कहते थे, कि मीडिया के चलते ही उन्हें चंदा चोरों से लड़ने की एनर्जी मिलती है। जिस तरह इन लोगों ने गैर जिम्मेदाराना रर्वैया अख्तियार किया, उसके लिए ब्राहृमण समाज माफ नहीं करेगा। सवाल उठ रहा है, कि क्या कार्यकारिणी के लोग इतना कमजोर हो गए हैं, कि चंदा चोरों और उन्हें बचाने वालों से डर गए, अगर डरना ही था, तो लड़ाई ही क्यों छेड़ी? क्यों जंग का बिगुल बजाया? चंदा चोरों और उन्हें बचाने वालों से अगर इतना ही डर था, या पद जाने का खतरा था, तो क्यों ब्राहृमण महासभा को बदनाम किया? रही बात नैतिकता की तो सारी नैतिकता चंदों चोरों और उन्हें बचाने वालों के सामने धरी की धरी रह गई, ऐसे लोग कहीं मुंह दिखाने के लायक नहीं रह गए। अगर किसी का खून हुआ है, तो वह नैतिकता का ही हुआ। सवाल उठ रहा है, कि आखिर इससे ब्राहृमण समाज को क्या मिला? क्यों कि जो लोग ब्राहृमण महासभा के अस्तित्व को बचाने के लिए लड़ रहे थे, आज वे खामोष हैं, क्यों खामोश है,? यह तो वही लोग जाने, लेकिन इन लोगों ने समाज में जो संदेष दिया है, उसके बाद कोई भी व्यक्ति इन लोगों पर विष्वास नहीं करेगा, खासतौर से उन लोगों पर तो कत्तई नहीं जिन्होंने लड़ाई तो चंदा चोरों के खिलाफ लड़ने की कसमें खाई, लेकिन जब उन्हें नंगा करने का समय आया तो किनारा कस लिया। जो लोग चंदा चोरों के खिलाफ विधिक कार्रवाई करने और सदस्यता समाप्त करने के लिए पोस्ट किया करते हुए यह लिखते थे, कि अगर अध्यक्षजी एक लाइन यह कह दें, कि 20 साल की आडिट रिपोर्ट सही हैं, तो बात यही खत्म हो जाएगी, अन्यथा मंदिर निर्माण के नाम पर बैठकों में केवल चंदा बटोरने की बात कर उनसे श्रद्धा का भाव लगाकर दानदाताओं से चंदा लेकर ठगने का काम ब्राहृमण महासभा के कुछ पदाधिकारियों के द्वारा सालों से किया जा रहा है, और हिसाब भी नहीं बताया जाता। अभी तक अध्यक्षजी ने एक लाइन तक नहीं कहा, और न रिपोर्ट को ही सार्वजनिक किया, सवाल उठ रहा है, कि जो अध्यक्ष एक लाइन नहीं बोल सकता है, उससे रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की कैसे उम्मीद की जा सकती है? इसी लिए कहा जा रहा है, कि अध्यक्ष और महामंत्री सहित उन सभी लोगों को अब तक शर्म से डूब मरना चाहिए था, जिन्होंने ब्राहृमण महासभा को इस स्थित में लाकर खड़ा किया। title in english