बस्ती। मंत्रीजी आइए और बस्ती में देखिए कि कैसे साहब लोग खाद की कालाबाजारी करने वाले आधा दर्जन से अधिक होल सेलर्स के हाथ बिक जा रहे है। जब विकास वाले साहब का ईमान 50 हजार के सोफे पर बिक जा रहा है, तो जिला कृषि अधिकारी का ईमान कितने में बिकता होगा, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता। सवाल उठ रहा है, कि जब सोफा पर साहबों का ईमान बिक रहा है, तो किससे कार्रवाई की उम्मीद किसान और सवाल उठाने वाले नेता करें। यह भी सही है, कि अगर दिषा की बैठक में एमएलसी प्रतिनिधि खाद की कालाबाजारी करने वाले होलसेलर्स के खिलाफ कार्रवाई करने की बात कही, तो उसके दूसरे दिन सभी होलसेलर्स से सोफा खरीदन के लिए यह कर चार-चार हजार चंदा लिया कि अगर कार्रवाई से बचना है, तो साहब के आवास पर 50 हजार का सोफा भेजवाना होगा। चंदा जमा भी हुआ और साहब के आवास पर सोफा भी पहुंचा, जैसे ही साहब के घर सोफा पहुंचा, साहब ने कार्रवाई को रोक दिया। सोफा जिला कृषि अधिकारी के जरिए साहब के आवास पर पहुंचा। सवाल उठ रहा है, कि जब साहब लोगों का ईमान एक सोफा पर बिकेगा तो कैसे कालाबाजारियों के खिलाफ साहब कार्रवाई करेगें। यही कारण है, कि बैठकों में नेता, बाहर किसान और मीडिया चिल्लाते रहते हैं, कि जब होलसेलर्स 400 रुपया बोरी रिटेलर्स को देगा तो कैसे 266 में यूरिया बिकेगा। एक रिटेलर्स चिल्ला रहा है, कि रामचंद्र गुप्त के मालिक दिनेश ने उससे दो सौ बोरी के लिए 79 हजार लिया, लेकिन अभी तक खाद नहीं दिया। जो खाद रिटेलर्स को 50 हजार में मिलना चाहिए, उसे रामचंद्र गुप्त जैसे लोग 79 हजार में बेच रहे है। यानि 145 रुपया एक बोरी में मुनाफा ले रहे है। अब अंदाजा लगाइए कि जब रिटेलर्स को 400 रुपया में मिल रहा है, तो रिटेलर्स कैसे किसानों को 266 में देगा, जिसकी खरीद ही चार सौ रुपया बोरी पड़ रही हो, वह कैसे 266 में बेचेगा, जाहिर सी बात है, कि रिटेलर्स 500 से कम में नहीं बेचेगा। इसी 145 रुपये में मंत्री से लेकर जिला कृषि अधिकारी तक हिस्सा जाता है। अब आप लोग यह भी समझ गए होगें, कि मंत्री और जिले के साहबों को क्यों जिला कृषि अधिकारी इतना प्यारा और दुलारा लगते है। जाहिर सी बात हैं, कि जो भी अधिकारी/कर्मचारी हिस्सा देगा, वही सबसे अधिक दुलारा होगा। बाबूओं को तो मंत्रीजी ने इस लिए लपेट दिया, कि उनसे कुछ मिलने वाला नहीं, जिससे मिलना होता हैं, उसको छूते तक नहीं, भले ही चाहें वह लूट रहा हो। यह जिले के किसानों और आम लोगों का दुर्भाग्य हैं, कि उसे सोफा पर बिकने वाले अधिकारी ही मिल रहे है। बैठक में सवाल करे हरीष सिंह और दीवानचंद्र चौधरी जैसे नेता, और सवाल पर मलाई काटे अधिकारी। जिस अधिकारी को जिले की जनता ईमानदार समझती है, वही सोफा पर बिकने वाला निकलता। अधिकारियों ने अपना स्तर नेताओं से भी नीचे गिरा दिया। आते हैं, ईमानदारी का चोला पहनकर और जाते हैं, बेईमानी का लबादा लादकर। रिपोर्टर ने जिला कृषि अधिकारी कार्यालय का पड़ताल किया तो पता चला कि एक भी साहब और बाबू कार्यालय में नहीं हैं, सबकी कुर्सी खाली रही, यहां तक कि चपरासी भी गायब रहें। बताया गया कि सभी लोग वसूली में गए है। यह उस जिले के विभाग का हाल हैं, जिस जिले के प्रभारी मंत्री कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही है। माफी मांगने वाले अब विधायकजी के समझ में आ गया होगा, कि उन्होंने किसानों से माफी मांगकर गलती किया, माफी मांगने का असर अगर दूसरे सीजन में पड़ता तो किसान विधायकजी की जयजयकार करते। जब तक जिला कृषि अधिकारी और विकास वाले साहब रहेगें, तब तक किसानों को यूंही खाद के लिए परेशान होना पड़ेगा।