बस्ती। सवाल उठ रहा हैं, कि माननीयगण ऐसा काम ही क्यों करते हैं, जिसके लिए उन्हें सार्वजनिक रुप से बार-बार माफी मांगनी पड़े, ऐसे में अगर कोई माननीय बार-बार गलती करते हैं, और बार-बार माफी मांगते हैं, तो जनता एक दिन उन्हें माफी मांगने वाला माननीय कहना शुरु कर देगी। पहले के लोग कहते भी थे, कि अगर गलती बार-बार की जाती है, तो उसे गलती नहीं बल्कि चालाकी कहा जाता हैं। गलती को एक बार माफ की जा सकती, बार-बार नहीं। जिले में एक ऐसे माननीय हैं, जो बार-बार गलती करते हैं, और बार-बार माफी भी मांगते है। जो नेता गलती करके बार-बार माफी मांगता वह माफी के योग्य नहीं होता। किसी के भी माफी मांग लेने से उसके गुनाह कम नहीं हो जाते। जब गलती बार-बार दोहराई जाती है, और माफी मांगी जाती है, तो जनता उसे चालाकी का नाम देती है। पहले इन्होंने सार्वजनिक रुप से मीडिया के सामने किसानों से खाद न मिलने के लिए डीएम कार्यालय पर माफी मांगा, और कहा कि अब किसानों को खाद की कोई दिक्कत नहीं होगी, उसके बाद भी किसान खाद के लिए परेशान रहा। इस बार इन्होंने न माफी मांगा और न कोई बयान ही जारी किया। किसानों को लगा था, कि विधायकजी इस बार भी माफी मांगेंगे, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। सवाल उठ रहा है, कि अगर माफी मांग लेने से किसानों को खाद मिलने लगे, और अव्यवस्थित व्यवस्था सुदृढ़ होने लगें तो हर नेता माफी मांगने लगे। माननीयगण को अच्छी तरह मालूम हैं, कि जिस खाद की कालाबाजारी में मंत्री, जिला कृषि अधिकारी, एआर, पीसीएफ के डीएस, प्राइवेट विक्रेता और समितियों के सचिव जैसे भ्रष्टाचारी शामिल हांे, और जिन लोगों का किचेन खाद की कालाबाजारी से चलता हो, तो उस कालाबाजारी को एक विधायक कैसे रोक सकता? और केैसे किसानों को निर्धारित दर पर और समय से खाद उपलब्ध कराने का दावा कर सकता है। यहीं पर माननीयों से गलती हो जाती है, यह जानते हुए कि योगीजी भी चाह जाए तो खाद की कालाबाजारी नहीं रुक सकती, उसके बाद भी माननीयगण किसानों से माफी भी मांग लेते हैं, और खाद उपलब्ध कराने का भरोसा भी दे देते हैं। माफी मांगने के बजाए माननीयगण अगर खाद की कालाबाजारी करने वाले अधिकारियों के खिलाफ जांच और तबादले के लिए लिखे हैं, तो किसानों का कुछ भला भी हो जाता, लेकिन लिखने को कौन कहे, मामले को सदन में भी नहीं उठाते, सदन में इस लिए नहीं उठाते क्यों कि माननीयों का अनेक गलत/सही काम वही मंत्री करते हैं, जो भ्रष्टाचार में लिप्त रहते है। यह लोग उसी मामले को सदन में उठाते हैं, जिनमें इनका निजी हित छिपा रहता है। वरना, किसान रोता रहता, चिल्लाता रहता, लेकिन एक भी विधायक न तो धरने पर बैठतेे और न सदन में ही आवाज उठाते। यह लोग धरने पर बैठने और सदन में उठाने से अच्छा माफी मांग लेने को आसान समझते है। इन्होंने दूसरी गलती के लिए तब माफी मांगी, जब इनका एक विषेष वर्ग के खिलाफ आपत्तिजनक टिपणी करने वाला आडियो वायरल हुआ। दो दिन पहले इन्होंने फिर मीडिया के सामने सार्वजनिक रुप से भाजपा जिलाध्यक्ष सहित अन्य से इस लिए माफी मांगी क्योंकि इनके करीबी माने वाले भरत सिंह ने जिलाध्यक्ष के खिलाफ अशोभनीय और आपत्तिजनक सोशल मीडिया में कमेंट कर दिया। विधायकजी जनता जानना चाहती है, कि आखिर कब तक आप और आपके करीबी गलतियां करते रहेगें और कब तक आप माफी मांगते रहेंगें? क्या यह गलती करने और माफी मांगने का सिलसिला कभी बंद होगा, या यूंही चलता रहेगा? कहा भी जाता है, कि अगर कोई नेता बार-बार गलती करता हैं, ओैर बार-बार माफी मांगता है, तो या तो वह जनता को मुर्ख समझते या फिर खुद मूर्ख होतें है। वैसे गलती करके माफी मांग लेने जैसा चरित्र सभी नेताओं में नहीं होता, इसे एक अच्छे नेता की पहचान भी मानी जाती है। वरना, ऐसे भी ठगबाज नेता हैं, जिन्होंने न सिर्फ पूरे जिले को ठगा बल्कि नेताओं को भी ठगा, ऐसे नेता को गलती तक एहसास नहीं माफी मांगना तो बहुत दूर की बात है।