‘पुलिस’ आई, ‘लेन-देन’ करके चली ‘गई’
बनकटी/बस्ती। मुंडेरवा पुलिस की चर्चा जितनी भी की जाए कम होगी। यह वहीं थाने की पुलिस हैं, जिससे घायल परिवार का मुकदमा तब लिखा जब सूद पर छह हजार लाकर नहीं दे दिया। पता नहीं क्यों मंुडेरवा की पुलिस पीड़ितों की तभी सुनती है, जब वह चढ़ावा चढ़ाते है। अंधेर नगरी चौपट राजा वाली कहावत मुंडेरवा की पुलिस, शासन-प्रशासन सिद्ध कर रहा है। मुन्डेरवा थाना क्षेत्र के कुरियार गांव के पौराणिक कुटी पर धड़ल्ले से हरे आमों के पेड़ की कटाई हो रही है। महाराज जी वृद्ध हो चुके हैं और कहीं अन्यत्र जगह कुटी पर रहते हैं। उनके स्थान पर कुटी पर कर्मचारी रहता है जो लगभग लाखों रुपए का बेसकीमती पेडों को बेचकर पर्यावरण का दुश्मन बन चुका है। जिसमें गांव के प्रधान की संलिप्तता को नकारा नहीं जा सकता। मजे की बात तो यह है की मौके पर मुंडेरवा की पुलिस आई, और लेन-देन करके चली गई। पेड़ कट रहा था लेकिन जान-समझ कर वापस चली गई। पुनः जब वन विभाग के उडाका दल, वन दरोगा व वनमाली से बात किया गया तो किसी ने फोन रिसीव नहीं किया। रेंजर अजय प्रताप सिंह से बात करने का प्रयास किया गया तो इनका नम्बर बिजी बताया, वनमाली श्रीकान्त मौके पर पहुंच कर कारवाई करवाने की बात कही है। क्षेत्र के लोगों का कहना है, कि सांय होते ही हरे पेड़ो की कटान शुरु हो जाती है। कोई सुनने वाला नहीं हैं, पुलिस से कहो तो वह आती जरुर, मगर कार्रवाई करने के बजाए लेन-देन करके चली जाती है, जैसे पुलिस जाती फिर से कटान शुरु हो जाता है। कहती है, कि व विभाग के जिम्मेदारों को जब भी फोन करो उनका मोबाइल बिजी मिलता है। वन विभाग वाले कार्रवाई तो करते हैं, लेकिन तब तक देर हो जाती है। पर्यावरण के दुष्मन तब तक इतना नुकसान कर चुके होते हैं, कि उसकी भरपाई नहीं हो सकती। वनमाली श्रीकांत ने बताया कि हरे पेड़ काटने वालों पर दस हजार का जुर्माना लगाया गया, कल इसकी रसीद दिखा दूंगा। पुलिस वालो ने भी कार्रवाई की लेकिन अपने के लिए। गांव वाले कहते हैं, कि जुर्माना लगाने या फिर नकदी जेब में रख लेने से पर्यावरण को सुरक्षित नहीं किया जा सकता है।
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