बस्ती। कहना गलत नहीं होगा कि पीडब्लूडी में तीन ऐसे मृतक आश्रित वाले टेंडर बाबू हैं, जिनमें एक का नाम प्रभातकुमार उर्फ पटटू पुत्र स्व. मिठठू, दूसरे का नाम संतोश कुमार पुत्र जसकरन और तीसरे का नाम बृजेष कुमार श्रीवास्तव पुत्र स्वं. रक्षानंदन लाल श्रीवास्तव है। इनमें पटटू और संतोष कुमार के पिता विभाग में क्लीनर थे, और बृजेश कुमार के पिता जेई रहे। यह तीनों 15 साल से अधिक एक ही स्थान पर नौकरी कर अकूत दौलत एकत्रित किया। इन तीनों के क्रियाकलापों की नजर न जाने क्यों संजय सिंह पगार जैसे नेताओं की नहीं पड़ रही? संजय पगार जैसे अन्य नेताओं की छत्रछाया में इन तीनों मृतक आश्रित टेंडर बाबूओं ने भ्रष्टाचार का ऐसा रिकार्ड बनाया, जिसे स्वर्ग में देख इनके पिता अपने तीनों बच्चों से दुखी होकर कह रहे होंगें कि इससे अच्छा तीनों मर जाते, कम से कम पिता का नाम तो बदनाम न होता। जो बेटा अपने पिता का नाम न रोशन कर सके, उसे मर जाना ही बेहतर होता हैं, जैसा कि तीनों टेंडर बाबूओं के पिता चाह रहे होगें। कोई भी बाप अपने बेटे की तो तरक्की चाहता है, लेकिन वैसा भ्रष्टाचारी पुत्र नहीं चाहता, जैसा कि पटटू, संतोष कुमार और बृजेष श्रीवास्तव हैं। क्या कोई मां-बाप कभी यह चाहेगें कि उसका बेटा भ्रष्टाचारी बने और जेल जाए। चूंकि मृतक आश्रित वालों को इस बात का एहसास नहीं होता कि नौकरी कैसे मिलती है, और कैसे की जाती है? इन्हें तो ऐसा लगता है, कि मानो सरकार ने उन्हें नौकरी पर रखकर एहसान किया हो। ऐसे लारेगों का मानना होता है, कि सरकार ने इन्हें इसी लिए रखा है, ताकि सरकारी धन को लूट सकें। यकीन मानिए, तीनों भ्रष्टाचारी पुत्रों को देख उनके पिता खुष नहीे बल्कि अफसोस कर रहे होगें, और कह रहे होगें, कि ऐसा नालायक और भ्रष्टाचारी बेटा किसी को भी न दें।

कहने को भले ही यह तीनों मृतक आश्रित हैं, लेकिन इन्हें जरा भी अपने दायित्वों का एहसास नहीं है। यह तीनों उस विभाग को बेच रहे हैं, जिसके चलते इन तीनों को मान, सम्मान और दौलत मिला। यह तीनों, नेताओं के गुलाम होकर रह गएं हैं, नेताओं की इच्छा पर यह सांस लेते है। एक तरह से तीनों ने पैसों के लिए नेताओं के सामने अपने आप को गिरवी रख दिया। इन तीनों का अपना कोई वजूद नहीं रहा। इनके लिए सबकुछ पैसा ही है। पैसे के लिए यह तीनों कुछ भी करने को तैयार रहते है। इस तरह के लोगों को अपनी गलती का तब एहसास होता है, जब यह जेल जाते है। नेता इन्हें अपने मकसद के लिए इस्तेमाल करते हैं, जिस दिन नेताओं का मकसद प्रेमचंद्र जैसे लोगों से पूरा नहीं होता, उस दिन यह नेताओं के लिए दुष्मन बन जाते है। अगर तीनों टेंडर बाबूओं को नेताओं का टेस्ट लेना है, तो एक दिन उनका अनैतिक काम करने से मना कर दीजिए, फिर देखिए, यह आप की जांच भी करवाएगें और कार्रवाई भी करवाएगें। नेताओं का यही सच होता है। यह सच एक रिपोर्टर की हैसियत से पिछले 35 सालों से देखता आ रहा हूं। नेता अपना नुकसान बर्दास्त ही नहीं कर सकते है। इन्हें तो यहां तक बर्दास्त नहीं होता कि कोई उन्हे न तक कहे। नेताओं में नैतिकता नाम की कोई चीज नहीं होती। अगर नैतिकता होती तो नेता नहीं बनते। नेता किसी के भी हितैषी नहीं होते है। उन्हीं के होते हैं, जो इन्हें लाभ पहुंचाता है। नुकसान पहुंचाने वाले को यह सबसे बड़ा अपना दुष्मन मानते है। नेताओं से बचकर रहिए, और जितना हो सके, इनसे दूर रहिए। अपनी मेहनत और ईमानदारी के बल पर ठीक उसी तरह नौकरी कीजिए जिस तरह आप के पिता ने किया। आइडिएल बनाना हो तो पिता को बनाइए, नेताओं को नहीं।

अधीक्षण अभियंता कार्यालय में अगर पटटू ने अपने भाई को नियम विरुद्व ठेकेदार बनाकर उसे अपनी तरह भ्रष्टाचारी बनाया तो निर्माण खंड एक में बृजेष कुमार श्रीवास्तव ने अपनी पत्नी प्रियंका श्रीवास्तव को ठेकेदार बनाकर वही किया जो पटटू ने किया। इनकी पत्नी का भी पंजीकरण अधीक्षण अभियंता कार्यालय में पटटू के भाई के साथ है। रही बात संतोश कुमार की तो इन्होंने भी खूब माल कमाया, लेकिन इन्होंने अपने परिवार के किसी सदस्य को ठेकेदार नहीं बनाया, इन्होंने ऐसा करके समझदारी दिखाया। लेकिन इन्हें एक विधायक का लटक माना जाता है। यह विधायक के अनुमति के बिना बाथरुम में भी नहीं जाते। यह विधायकजी का ख्याल रखते हैं, और विधायकजी इनका ख्याल रखते है। भले ही इस ख्याल रखने के चक्कर में विभाग की ऐसी वैसी हो जाए। यह भी लगभग 12 साल से एक ही स्थान पर न जाने कैसे टिके हुए है। जिस दिन विधायकजी चाह जाएगें, उस दिन इनका बोरिया बिस्तर बंध जाएगा। अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है, कि आखिर अधिकारी कैसे उन टेंडर बाबूओं के भाई और पत्नी के नाम ठेकेदारी का पंजीकरण कर दिया जो नियम विरुद्व है। इसका मतलब अधिकारी भी वही चाहते हैं, जो उनका टेंडर बाबू चाहता। यहां पर भी दोनों एक दूयरे का ख्याल रखते है।