‘नेता’ वही ‘जिसके’ पास ‘फारचूनर’ और ‘डिफंेडर’ का ‘काफिला’ हो!

बस्ती। अगर किसी कार्यक्रमों में भीड़ जुटानी हो या फिर नेताओं का जोरदार स्वागत करना हो तो वह पूर्व सांसद हरीश द्विवेदी से सीख सकता है। भले ही यह किसी संवैधानिक पद पर रहें या न रहें, लेकिन भीड़ जुटाने और स्वागत कराने में आज भी इनका कोई सानी नही। देश के बड़े-बड़े नेता इनके सफल कार्यक्रम और भीड़ जुटाने मंत्र ले जा चुके है। अमित शाह तक इनके कायल है। एक दिन पहले इन्होंने पूर्व की भांति अपनी ताकत का एहसास नवागत भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी के गोरखपुर प्रथम आगमन पर करा चुकें है। इनके अगुवाई में लक्जरी वाहनों का जो काफिला स्वागत में गया, उसे देख अन्य जिलों के नेता दंग रह गए। यह इस बात का सबूत हैं, कि आज भी इनमें उतना ही दम खम हैं, जितना सांसद रहते हुए था। यह सही है, कि भीड़ जुटाने में यह सफल रहे, लेकिन यह भी सही है, कि जितने लोग भीड़ का हिस्सा बने उनमें अगर 50 फीसद भी दिल से चाह लिए होते तो हरीश द्विवेदी पूर्व सांसद न कहलाते। इस सच से भी इंकार नहीं किया जा सकता है, कि अधिकांश लोग हरीश प्रेमी के रुप में नहीं बल्कि अपनी लालच में कड़ाके की ठंड में गोरखपुर गए थे। कहने को भले ही भीड़ में जाने वाले न जाने कितने फारचूनर और डिफेंडर के मालिक ही क्यों न रहें हो, लेकिन इनमें बहुत कम ऐसे होगें जो भाजपा को दस वोट भी अपने दम पर दिला सके, घर और गांव का वोट दिला दे, वही बड़ी बात। अगर किसी नेता की पहचान वाहनों से होने लगे तो जिले में न जाने कितने नेता होगें जो अकेले वाहनों का काफिला लें ला सकते है। इनमें मोदू चौधरी का नाम पहले स्थान पर आता है, क्यों कि जब भी कभी इस तरह का कार्यक्रम हुआ, इन्हीं के नाम का सबसे अधिक वाहन दिखाई दिया। इन्हें भी संजय चौधरी के साथ 27 के लिए भाजपा के टिकट का दावेदार माना जा रहा है। जितने लोग वाहनों का काफिला लेकर गए उनमें कोई विधायक तो कोई जिला पंचायत अध्यक्ष तो कोई क्षेत्र पंचायत अध्यक्ष की दौड़ में शामिल होने वाले चेहरा रहें, यह हरीश द्विवेदी के लिए नहीं गए, बल्कि अपने लालच में गए। इन्हें आल भी पूरा विष्वास हैं, कि पूर्व की भांति इस बार भी उन्हंे पूर्व सांसद के सहयोग से मलाई खाने का मौका मिलेगा। इस बार जो लोग खुद या परिवार के लोगों को मलाई खाने/खिलाने का सपना देख रहे हैं, उनका सपना अवष्य पूरा होता, अगर यह लोग पूर्व सांसद को हरवाने में मदद न किए होते। मीडिया बार-बार कहती आ रही है, कि किसी भी नेता या व्यक्ति को हरीश जी को बेवकूफ समझने की भूल नहीं करनी चाहिए।  क्यों कि हार के बाद इन्हें अच्छी तरह एहसास हो गया कि कौन पराया और कौन सच्चा हमदर्द है। पीठ में छुरा भोकनें वालों की इनके पास एक लंबी फेहरिष्त है, और यह गोपनीय  फेहष्ति पंचायत और विधानसभा चुनाव में सामने आएगा। वाहनों के काफिला के सहारे टिकट तो हासिल किया जा सकता है, लेकिन वह चुनाव नहीं जीता जा सकता, जो सीधे होता है। भारी दामों में टिकट खरीद कर जिला पंचायत अध्यक्ष और क्षेत्र पंचायत अध्यक्ष तो बना जा सकता, लेकिन सांसद और विधायक नहीं। देखा जाए वर्तमान समय में भाजपा का एक भी ऐसा नेता नहीं जो अपनी छवि और काम के बल पर विधायक बन सकें। जो भी बनेगा, वह पार्टी के जनाधार पर बनेगा। यह एक ऐसा सच हैं, जिसे सभी स्वीकार कर रहे है। आज का हालात ऐसा है, कि जिसके पास जिनती बड़ी गाड़ी वह उतना बड़ा नेता। गाड़ियां तो बहुत से लोगों के पास मगर वोटर्स किसके पास है? यह टिकट देने वाली पार्टियों को विचार करना है। बिडंबना यह है, कि आज का नेता गाड़ी के बहाने ताकत दिखाना चाहता है। गाड़ी तो ठेकेदारों के पास भी सबसे अधिक हैं, तो क्या वह नेता हो गए? प्रमुखी हासिल करने  का प्रयास तो कर रहे हैं, लेकिन क्या वह हासिल कर पाएगें?