नगर पंचायतों पर पीडब्लूडी के जेईयों ने किया कब्जा

-सारे नियम कानून तो ताक पर रखकर नगर पंचायतों में पीडब्लूडी के जेई को तैनात कर दिया

-जब शासनादेश के तहत अगर एक भी जेई नगरपालिका या नगर पंचायत में कार्यरत हैं, तो उसे ही सारे नगर पंचायतों का प्रभार दिया जाए

-लेकिन यहां पर तो जिस भी जेई को असली/नकली चेयरमैन ने पंसद कर दिया, उसे तैनात कर दिया गया

-पहले ईओ के अतिरिक्त प्रभार के मामले में डीएम, एडीएम और एलबीसी के द्वारा शासनादेश का उल्लघंन किया गया, और अब नगर पंचायतो में अन्य विभागों के जेई को नामित करने के मामले में किया गया

-प्रशासन के सामने सबसे बड़ी समस्या अन्य विभागों के जेई के दायित्वों का निर्धारण को लेकर, अगर कोई कार्रवाई करनी भी होगी तो प्रषासन कैसे करेगा? क्यों कि नियुक्ति प्राधिकारी तो पीडब्लूडी और आरईडी होते

-बार-बार शासनादेशो का उल्लघंन करने को लेकर पूरा प्रशासन और एलबीसी सवालों के घेरे में

बस्ती। डीएम और एडीएम पर आरोप लग रहे हैं, कि जब इन लोगों को अधिकार ही नहीं हैं, तो क्यों यह लोग बार-बार अधिकार से बाहर जाकर ईओ को अतिरिक्त प्रभार दे रहे हैं, और कभी शासनादेश का उल्लघंन कर नगर पंचायतों में अन्य विभागों के जेई की तैनाती कर दे रहे है। जब कि स्पष्ट आदेश और निर्देश हैं, कि अगर नगर पालिका या किसी भी नगर पंचायत में विभाग का कोई जेई कार्यरत् हैं, तो उसे रिक्त सभी नगर पंचायतों का प्रभार दिया जाए। हैरान करने वाली बात यह है, कि जिले के सभी 10 नगर पंचायतों में पीडब्लूडी के जेई की तैनाती की गई, जबकि नगर पालिका में पहले से ही विभाग के जेई अप्रित कुमार निगम कार्यरत् है। इसी तरह जेई जल होने के बावजूद पेयजल, सफाई और मार्ग प्रकाश का अतिरिक्त प्रभार जल निगम के दागी जेई को दिया गया। इसी तरह पीडब्लूडी के जितने भी जेई नगर पंचायतों में तैनात हैं, उन सभी पर भ्रष्टाचार और अनियमितता के आरोप लग चुके है। खास बात यह है, कि ऐसे विभाग के जेई को प्रभार दे दिया गया, जिसके पास विभाग के कार्यो का दबाव रहता है। लेकिन चेयरमैन ने जिसे चाहा उसे जेई बना दिया, इन लोगों के लिए बाहर के जेई इस लिएआसान होते हैं, क्यों कि इन्हें फर्जी एमबी बनाने में महारथ हासिल रहता है। सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण बात यह है, कि अन्य विभागों के जेई को प्रभार देने के बाद अगर उनका पर कोई अनियमितता का आरोप लगा तो उनके दायित्वों का निर्धारण कैसे होगा? क्यों कि नियुक्ति प्राधिकारी न तो डीएम होते हैं, और न एडीएम? इसतरह का एक मामला बीडीए ाि सामने आ चुका है। यहां पर पीडब्लूडी के जेई का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें उन्हें रिपोर्ट लगाने के एवज में 50 हजार रुपया लेते दिखाया गया, जब कार्रवाई और दायित्व निर्णारण करने की बारी आई तो पता चला कि उनके नियुक्ति प्राधिकारी कोई और है। इतने बड़े खुलासेे के बाद पीडब्लूडी के जेई के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई, बस उन्हें उनके मूल विभाग में वापस कर दिया गया। ऐसा भी नहीं कि शासनादेशों की जानकारी डीएम और एडीएम को न रहती हो, मान लीजिए कि अगर इन्हें नहीं रहती तो एलबीसी को तो रहती ही होगी, तो फिर एलबीसी क्यों नहीं डीएम और एडीएम के सामने पत्रावली प्रस्तुत करने से पहले वह शासनादेश रखते जिसमें डीएम को अधिकार ही नहीं। इसका मतलब यह हुआ कि सभी लोग इस खेल में मिले हुए हैं, और सबकुछ जानते हुए भी शासनादेश के विरुद्व डीएम और एडीएम से आदेश करवा लेते है। इसी लिए कहा जाता है, कि सब लक्ष्मीपति का खेल है। पीडब्लूडी के जेई कभी नगर पंचायतों के निर्माण कार्यो की गुणवत्ता को न तो देखने जाते और न यह देखने जाते कि निर्माण कार्य स्टीमेट के अनुसार हो रहा है, या नहीं? इन्हें तो सिर्फ अपने बखरे से मतलब रहता हैं, और चेयरमैन लोग भी यही चाहते है।

25 जनवरी 2011 को प्रमुख सचिव आलोक रंजन की ओर से एक आदेश जारी हुआ, जिसमें 26 मार्च 2008 के आदेश को निरस्त करते हुए कहा गया कि जिन जनपदों में पालिका केंद्रसयित सेवा के अवर अभियंता/सहायक अभियंता तैनात हैं, वहां के रिक्त निकट के निकायों के निर्माण कार्यो के पर्यवेक्षण एवं क्रियान्वयन के लिए इन्हें ही अधिकृत किया जाए। 2008 के आदेश में कहा गया था, आवष्यकतानुसार अन्य विभागों के जेई को भी इस कार्य के लिए नगर निकायों में अधिकृत किया जाता है। इस आदेश को समाप्त कर दिया गया। वर्तमान में नगर पालिका में जेई अर्प्रित कुमार निगम और एई जयराम तैनात है। पगर पालिका में जेई उपलब्ध होने के बावजूद डीएम, एडीएम और एलबीसी बाबू और चेयरमैनों ने मिलकर बनकटी एवं गायघाट में पीडब्लूडी के जेई अभिषेक सिंह, गनेशपुर में सर्वेश वर्मा, मुंडेरवा, नगर एवं कप्तानगंज में दिनेश तिवारी, अमर सिंह चौधरी को भानपुर एवं रुधौली और विनोद कुमार को हर्रैया और बभनान नगर पंचायत में नियम विरुद्व तैनात किया गया।