‘लेखपाल’ अब ‘फीता’ नहीं ‘मशीन’ लेकर ‘जाएगें’!
बस्ती। योगीजी ने एक ऐसा एतिहासिक निर्णय लिया है, जिसका इंतजार कई दषकों से काष्तकार और भू स्वामी कर रहे थे। इस एतिहासिक निर्णय से लेखपालों की मनमानी और उनके द्वारा जमीनों की पैमाईश में की जा रही धांधली तो समाप्त होगी ही, अलबत्ता जिस पैमाईश के लिए काष्तकार तहसीलों और लेखपालों का महीनों चक्कर लगाते थे, अब पांच मिनट से भी कम समय लगेगा। रोवर नामक मषीन से पैमाईश होने से लेखपाल किसी के पक्ष में कम और अधिक जमीन की पैमाईश नहीं कर पाएगें, एक इंच जमीन ईधर का उधर लेखपाल नहीं कर पाएगें। कहने का मतलब योगीजी ने लेखपालों की एक तरह से अवैध कमाई को तो बंद किया ही साथ उन दंबग काष्तकारों की दंगई को भी समाप्त किया, जो लेखपालों को अपने फेवर में करके दूसरे की जमीन हड़प लेते थे। इस नई तकनीक से कानूगो और लेखपालों का खेल समाप्त होगा। जीपीएस आधारित रोवर मशीन से प्रदेश की सभी तहसीलों में पैमाईश कराई जाएगी। इसके लिए हर तहसील में विशेष टीम का गठन होगा। सभी तहसीलों में इस प्रणाली के उपयोग के लिए लगभग 350 रोवर मशीन खरीदे जाएगें। रोवर सेटेलाइट के जरिए सर्वे आफ इंडिया के डाटा के माध्यम से किसी भी भूमि की पैमाईश करने के साथ सटीक मानचित्र भी तैयार होगा। रोवर से पैमाईश करने के लिए गांव सीमा स्तम्भ की भी आवष्यकता नहीं पड़ेगी। रोवर के जरिए बिना फिक्स प्वांइट के किसी भी जमीन की पैमाईश की जा सकेगी। जमीन की पैमाईश पांच सेमी तक की दूरी से करना संभव होगा। पायलेट प्रोजेक्ट के साथ इसका कई गावों में सफल परीक्षण भी हो चुका है। हर तहसील में एक एनटी, दो कानूनगो व दो लेखपाल की टीम बनेगी। राजस्व परिषद रोवर के उपयोग के लिए एसओपी बना रहा है। इसके जरिए किसी भूमि का क्षेत्रफल निकालने में त्रुटि की गुंजाईश भी नहीं रहेगी। एक रोवर मशीन की लागत छह से सात लाख पड़ रही है। रोवर के जरिए पैमाईश में पांच से 10 मिनट का समय लगेगा। इसके उपयोग से भूमि पैमाईश के मामलों का तेजी से निस्तारण भी होगा। कहा जाता हैं, कि राजस्व के विवादों में भूमि पैमाईश के मामलों में लेखपाल और कानूनगो की भूमिका पर सवाल उठते रहें है। वैसे इस योजना पर पिछले कई सालों से काम चल रहा था, लेकिन इसे अंतिम रुप नहीं दिया जा रहा था, योगीजी ने इस योजना को अंतिम रुप से देते रोवर मशीन खरीदने की हरी झंडी भी दे दी है। इस प्रणाली की उपयोगिता का अंदाजा उस समय किसी काष्तकार को लगेगा, जब उसे यह महसूस होगा कि जो पैमाईश वह महीनों में नहीं करवा पाया, वह पांच-दस मिनट में हो गया। यही वह पैमाईश हैं, जब नहीं होता था, तो मजबूरी में लेखपाल को उनकी मनचाही डिमांड को पूरा करना पड़ता था, उसके बाद भी काष्तकार को यह हमेशा शंका बनी रहती थी, कि कहीं लेखपाल विरोधियों से मिलकर उसकी कीमती जमीन को इधर-उधर न कर दें। इधर-उधर करने से ही अनेक मुकदमें लंबित है। अगर प्रभाव में आकर किसी लेखपाल ने एक इंच भी जमीन गलत पैमाईश कर दिया तो उसे ठीक कराने के लिए नाकों चना चबाना पड़ता था। वैसे भी लेखपाल और कानूनगो का झुकाव हमेशा उस लोगों की ओर रहा, जिन्होंने सबसे अधिक चढ़ावा चढ़ाया, और अधिक चढ़ावा तो गरीब काष्तकार चढ़ा नहीं सकता, इस लिए नुकसान भी सबसे अधिक गरीब काष्तकार ही लेखपाल और कानूनगो करते है। काष्तकार की हैसियत देखकर लेखपाल की फीता चलता है।
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