बस्ती। दामोदर गैस एजेंसी के अवैध निर्माण के मामले में बीडीए के प्रभारी एक्सईएन हरिओम गुप्त ने तत्कालीन जेई अनिल कुमार त्यागी को न सिर्फ दोशी बना दिया, बल्कि जेई के खिलाफ करने की रिपोर्ट भी लगा दी। जब कि इस मामले में शासन ने जेई को पूरी तरह निर्दोष मानते हुए उन्हें क्लीन चिट दे चुकी है। इसी मामले में तत्कालीन मेट अनुराग मिश्र को दोशी मानते हुए बर्खास्त कर दिया, जब कि दोश न तो जेई का और न मेट का। दोश तो बीडीए के सचिव का। शासन ने जेई की रिपोर्ट पर कार्रवाई न करने और नोटिस को दबा देने वाले तत्कालीन बीडीए के सचिव कमलेशचंद्र को दोषी माना, और कहा कि अगर कोई अधिकारी जेई रिपोर्ट के बाद भी कार्रवाई नहीं करता और अवैध भवन निर्माण हो जाता है, तो दोषी जेई नहीं बल्कि बीडीए के सचिव होते हैं, और कार्रवाई भी सचिव के खिलाफ ही होनी चाहिए। तत्कालीन जेई को दोशी मानने और उनके खिलाफ कार्रवाई होने की जानकारी अनुराग मिश्र की ओर से की गई आनलाइन आईजीआरएस शिकायत के तहत बीडीए के उपाध्यक्ष को भेजी गई रिपोर्ट से हुई। इस रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है, कि जेई शेलेश सहाय की आख्यानुसार ग्राम दामोदर गैस गोदाम के अवैध निर्माण के संबध में उ.प्र. नगर नियोजन एवं विकास अधिनियम 1973 की सुसंगत धाराओं में वाद दाखिल करते हुए दोशी अभियंता यानि जेई अनिल त्यागी और मेट अनुराग मिश्र के विरुद्व कार्रवाई की गई थी। ऐसे में शिकायतकर्त्ता की शिकायत आधारहीन एवं निक्षेपित किए जाने योग्य है। यह रिपोर्ट 26 मई 26 को पत्र संख्या 486 के तहत भेजी गई। अब शासन के उस जांच रिपोर्ट पर भी नजर डालिए, तो इस मामले में की गई। कहा गया कि अपचारी जेई अनिल त्यागी को संबधित जोन का प्रभार छह फरवरी 23 को मिला, और इन्होंने अवैध निर्माण की जानकारी होते ही तत्काल अवैध निर्माण को रोकवाते हुए 25 फरवरी 23 को चालानी कार्रवाई प्रस्तुत किया, खासबात यह है, कि 13 मार्च 23 को अवैध निर्माण कार्य पूरा हुआ और उसी दिन नोटिस भेजा जाता है। इस तरह बीडीए के तत्कालीन सचिव ने जेई की कार्रवाई करने के 14 दिन बाद नोटिस भेजा गया, ताकि अवैध निर्माण पूरा हो सके। इस मामले में बड़ी डील होने की बातें सामने आ रही है, डील किसी ने किया मलाई किसी ने काटा और चार्जशीट निर्दोष जेई को थमा दिया, और मेट को बर्खास्त कर दिया। जांच रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया कि जेई की रिपोर्ट पर तत्कालीन सचिव को त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए थी, ताकि अवैध निर्माण को रोका जा सके, जो नहीं किया गया। ़जांच रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है, कि अगर क्षेत्र में कोई अवैध निर्माण होना पाया जाता है, और अगर जेई रिपोर्ट नहीं करता, तो कार्रवाई जेई के खिलाफ होनी चाहिए, लेकिन आज जेई रिपोर्ट कर देता है, तो और संबधित बीडीए के सचिव कार्रवाई नहीं करते तो उस सचिव के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, जिन्होंने जेई की रिपोर्ट के रिपोर्ट के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं की गई। इस लिए इस मामले अपचारी जेई को निर्दोष माना जाता है। चूंकि जेई त्यागी, बीडीए के छोटे से लेकर बड़े तक के भ्रष्टाचारियों के रास्ते का रोड़ा बन चुके थे, इस लिए भ्रष्टाचारियों ने इन्हें फंसाने की साजिश रची ताकि यह निलंबित हो सके।
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‘एक’ भी ‘बीडीए’ के सदस्य ने ‘जेई’ का ‘सपोर्ट’ नहीं ‘किया’
बीडीए को भ्रष्ट बनाने में भवन स्वामियों का ही नहीं बल्कि नेताओं, अधिकारियों और बीडीए के तीनों सदस्यों का बड़ा योगदान है। अगर यह लोग वाकई बीडीए को भ्रष्टाचार मुक्त बनाना चाहते तो तत्कालीन जेई अनिल त्यागी का सपोर्ट करते। अधिकारियों और नेताओं का सपोर्ट न करना तो समझ में आता है, अधिकारी इस लिए सपोर्ट नहीं करता, क्यों कि वह हिस्सेदार होता है, नेता इस लिए विरोध नहीें करते, क्यों कि उनके आदमी बीडीए में मलाई काट रहे है। रही बात बीडीए के तीनों सदस्यों की तो सही मायनों में तीनों ने अपनी जिम्मेदारी को ईमानदारी से निभाया ही नहीं, इन्हें इस बात का एहसास ही नहीं हो रहा है, कि इनकी चुप्पी के कारण भवन स्वामियों का शोषण हो रहा है, और बीडीए के लोग मलाई काट रहे है। वाकई अगर यह लोग चाह जाते तो बीडीए से भ्रष्टाचार का नामो निशान मिटा सकते थे, जिस तरह सदन में विपक्ष, सत्ता पक्ष के गलत कार्यो पर हमला बोलता है, अगर यह लोग भी बैठक में बीडीए के गलत कार्यो पर हमला बोले होते तो आज जनता इनकी जयजयकार करती। सबसे महत्वपूर्ण सवाल एन कमिष्नर, डीएम और एडीएम पर उठ रहा है, जिनके रहते बीडीए में भ्रष्टाचार फलफूल रहा है। यह सही है, कि जेई को अपनी ईमानदारी की बहुत बड़ी कीमत बस्ती में चुकानी पड़ी, जहां बस्ती से बीडीए के लोग मालामाल होकर गए, वहीं ईमानदार जेई को मार तक खानी पड़ी, बाहर भवन स्वामियों से पिटवाया और भीतर खुद पीटे। जेई को बस्ती से भगाने के लिए जितना भी भ्रष्टाचारियों से हो सकता था, किया। इस जेई की ईमानदारी का आंकलन इस बात से किया जा सकता है, कि यह सात साल तक सस्पेंड रहे, लेकिन साढ़े सात हजार रुपया बहाल होने का घूस नहीं दिया। अगर ऐसे ईमानदार जेई को बस्ती से रोक कर जाना पड़े तो जिले भर के नेताओं को कहीं चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए।
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‘कब’ होगी ‘बीडीए’ के ‘सचिव’ के खिलाफ ‘कार्रवाई’
शासन की जांच रिपोर्ट के बाद बीडीए के तत्कालीन सचिव कमलेश चंद्र के खिलाफ दामोदर गैस एजेंसी के अवैध निर्माण को लेकर कार्रवाई होनी थी, लेकिन अभी तक नहीं हुई, सवाल उठ रहा है, कि आखिर कब होगी कार्रवाई? होगी भी कि नहीं? अगर इनके चार्जशीट पर जेई अनिल त्यागी जांच में दोशी पाए गए होते तो कब का नप गए होते, चूंकि मामला एडीएम/सचिव का है, इस लिए कार्रवाई के मामले में देरी हो रही है। देखा जाए तो इस मामले में तत्कालीन प्रभारी एक्सईएन संदीप कुमार और एई अरुण के खिलाफ बीडीए के सचिव के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। कहा भी जाता है, कि जिस सचिव, एक्सईएन और एई के खिलाफ कार्रवाई होनी शुरु हो गई, उस दिन बीडीए काफी हद तक दुरुस्त हो सकता है। बीडीए के एक भ्रष्ट एक्सईएन ने पत्रकार के दोस्त से कहा कि अगर आप अपने मित्र को बीडीए के खिलाफ खबर लिखना बंद करवा देगें तो हम आप का काम कर देगें। चूंकि सवाल मित्र के परिवार और काम का था, इस लिए पत्रकार को झुकना पड़ा। बाद में पता चला कि एक्सईएन दस लाख लेकर काम किया। ऐसे भी बीडीए के अधिकारी है। बहरहाल, बीडीए को नरक में झोकने का काम मीडिया ने भी किया।
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