बस्ती। पूरा प्रशासन और विभाग मिलकर किसानों को वाजिब दाम पर खाद उपलब्ध नहीं करा पा रहा है। जब एक बोरी पर सौ रुपया चाहिए, तो रिेटेलर्स कहां से निर्धारित दाम पर किसानों को खाद देगा। किसानों की ओर से प्रशासन और जिला कृषि अधिकारी को चैलेंज किया जा रहा है, कि खाद के थोक विक्रेता बालाजी एजेंसी, रामचंद्र गुप्त, सत्यनरायन एंड संस, शाक्बंरी टेडिगं कंपनी, आयूश टेडर्स, सिंह हर्रैया और गुप्ता बभनान के खिलाफ कार्रवाई करके दिखाइए, तो माना जाएगा कि आप लोग किसानों के हितैशी है। चूंकि जिला कृषि विभाग को हर सीजन में लगभग दो से ढ़ाई करोड़ का कमीशन मिलता है, इस लिए कार्रवाई नहीं करते। अधिकारी उन रिटेलर्स के खिलाफ कार्रवाई करते हैं, जिनका शोषण होल सेलर्स करता है। रिेटेलर्स का कहना है, कि जब होल सेलर्स ही उन्हें महंगा खाद देता है, तो हम लोग किसानों को कहां से सस्ता देगें। आधा दर्जन होल सेलर्स से लगभग एक हजार रिटेलर्स परेशान है। रिटेलर्स की परेशानी महीना लेने के बाद भी नहीं सुन रहे है। इस लिए नहीं सुन रहे हैं, क्यों कि होलसेलर्स से उन्हें मोटा लिफाफा मिलता है। यही वह मोटा लिफाफा है, जो जिले भर की खाद वितरण व्यवस्था को ध्वस्त कर रखा है। कहा जाता है, कि जब तक खाद का आवंटन सही नहीं होगा, तब तक खाद की न तो कालाबाजारी और न ओवर रेटिगं ही रुक पाएगी। खाद की चाबी जब तक आधा दर्जन होल सेलर्स के पास रहेगी, तब तक किसान परेशान होता रहेगा। जिला कृषि अधिकारी कार्यालय जिले का एक मात्र ऐसा विभाग होगा, जहां पर बजट तो शून्य है, लेकिन अवैध कमाई करोड़ों में है। इस कार्यालय में वित्तीय घोटाला बहुत कम होता है, खाद घोटाला अधिक होता है। तभी तो इस कार्यालय के साहब से लेकर बाबू और चपरासी से लेकर चालक तक की अपनी हैसियत है। इस कार्यालय का बाबू कभी रोता हुआ नहीं मिलेगा। साहब की तो बात ही छोड़िए। जिले में खाद को लेकर दो ही साहब हैं, एक एआर और दूसरा जिला कृषि अधिकारी, देखा जाए तो इन दोनों विभाग के अधिकारी बजट के लिए परेशान नहीं रहते, इनकी परेशानी, धान, गेंहू और खाद में अधिक से अधिक माल कमाने की रहती है। दोनों अधिकारियों के बारे में पूरा प्रदेश जानता है, फिर भी इनका कुछ नहीं होता। इसके लिए दोनों विभागों के मंत्रियों को ही किसान जिम्मेदार मान रहे है। कहते हैं, कि अगर मंत्री ईमानदार होता तो क्यों एक बोरी खाद के लिए परेशान होना पड़ता।
हम बात कर रहे थे, खाद के होल सेलर्स के खेल की। थोक वाले जब रिटेलर्स को खाद भेजते हैं, तो कागज में एमआरपी के नीचे की बिलिगं करते है। जो रिटेलर्स निर्धारित मूल्य से अधिक पैसा एडवासं में जमा करता है, उसे यह कागजों में निर्धारित दर से कम मूल्य पर बिल बनाते है। 266 के कीमत वाली खाद को यह 280 रुपये के दर से पैसा जमा करवा लेते है। एक बोरी में इन्हें 14 रुपया का लाभ बिना कुछ किए मिल जाता है। साथ ही यह टेैकिगं भी करते हैं, उसमें भी मुनाफा कमाते है। एक बोरी पर लगभग 30 रुपया का लाभ इन्हें मिलता है। देखा जाए तो अंत में रिटेलर्स ही मारा जाता है। होल सेलर्स अलग से मारता हैं, साहब और बाबू अलग से मारते हैं, छापेमारी के नाम पर अलग से मार खानी पड़ती है। आप लोग आज तक एक भी होल सेलर्स के यहां छापेमारी की कार्रवाई होते नहीं सुना होगा, सुना होगा तो रिटेलर्स के यहां। क्यों कि इनका अधिकारियों का सरंक्षण रहता है। होल सेलर्स कागज में इस लिए पकड़ में नहीं आते हैं, क्यों कि कम रेट की बिलिगं करते है। रिटेलर्स चिल्लाता रहता है, कि साहब हमसे अधिक दाम लिया जाता है, लेकिन साहब पर कोई फर्क नहीं पड़ता। क्यों कि साहब को प्रति बैग पांच रुपया मिल जाता है। इस तरह एक सीजन में साहब के पास बिना कार्यालय से हिले दो से ढ़ाई करोड़ पहुंच जाता है। इस ढ़ाई करोड़ में जेडीए, डीडी और कार्यालय के बाबू शामिल रहते हैं। अगर प्रशासन को ओवर रेटिगं की जांच करानी है, तो प्रत्येक ब्लाकों के 20-20 किसानों से पूछ लें, सारी सच्चाई सामने आ जाएगी। कुल मिलाकर अंत में किसान ही मारा जाता है। चूंकि खाद के आवंटन में पारदर्षिता का अभाव है। यहां पर तो होल सेलर्स खाद के आने की जानकारी तक नहीं देते, इसी लिए जो भी 100 रुपया बोरी दे दिया उसका खाद उसके इच्छानुसार मिल गया। सच तो यह है, कि किसी को भी किसानों के दर्द की कोई परवाह नहीं है।
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